दर्द का रिश्ता

पारो  वर्षा   में भागी जा रही थी। उसकी बेटी बुख़ारी में तप रही थी। वह अपनी बेटी  मुन्नी के  लिए दवाइयों का इंतज़ाम करने जा रही थी। उस छोटे से घर में वह अपनी बेटी के साथ एक साल से रह रही थी। कोई नहीं जानता था कि पारो कहां से आई है? वह मेहनत मजदूरी करके अपनी बेटी को पाल रही थी। उसकी बेटी आज 2 साल की हो चुकी थी। उसकी बेटी बोल नहीं सकती थी। उस दिन पारो को कुछ मजदूरी नहीं मिली। वह भूखी ही फूटपाथ पर भागी  जा रही थी। अपनी बेटी को सोता  ही छोड़ गई। दवाई लाना बहुत ही ज़रुरी था। सारी रात उसे गोद में ले कर उसकी ठंडी पट्टी करती रही। रास्ते में उसे एक रर्ईस औरत मिली। वो शक्ल सूरत से  किसी धनी परिवार की लग रही थी। उसके पास सामान से भर दो तीन  सूट-केस थे। वह औरत पारो को कहनें लगी कृपया  सामान उठाने में मेरी मदद करो। महिला का सामान उठाते हुए पारो बोली,बहन तुम को कहां जाना है?। उस महिला की सामान उठवानें में मदद की। वह बोली मुझे बस अड्डे छोड़ कर चले जाना। बस स्टॉप आने ही वाला था।  उस महिला नें  पारो को  500 रुपये को नोट पकड़ा कर कहा धन्यवाद।

पारो 500रुपये  का नोट थमाए फूली नहीं समा रही थी।  आज तो मैं अपनी बेटी को पेट भर के दूध पिलाऊंगी। घर को ढेर सारा सामान ले जा सकती हूं। उसने जल्दी-जल्दी बाजार से सामान लिया और  कैमिस्ट  की दुकान से दवाइयाँ ली।  वह जल्दी  जल्दी कदम  बढ़ाते हुए घर पहुंच गई। अपनी बेटी को प्यार करके बोली देख आज से तू भरपेट खाना खाएगी। उसने दवाई  मुन्नी को खिला दी थी।  थोड़ी देर बाद उसका बुखार देखा। वह उतर चुका था। नन्ही मुन्नी  एक बार फिर  दूध पी कर सो गई थी। वह अपने मन में बोली बेटी तेरे अच्छे दिन आने वाले हैं।  उसने बिस्तर पर जैसे ही सारा सामान रखा अचानक उसकी नजर उस महिला के पर्स पर पड़ी। वह जल्दी में उस महिला का नर्स लेकर आ गई थी। वह सोचने लगी कि वह औरत  उसे चोर समझ रही होगी। उसने पर्स खोला उसमें ढेर सारे  रुपये पड़े थे। उसने उस औरत का  पर्स खोला उसमें एक कार्ड पर उस औरत के घर का पता भी लिखा था। वह सीधे सीधे पुलिस थाने में जाकर बोली इस्पेक्टर साहब अभी एक मालकिन का समान  उठा कर रेलवे स्टेशन पर मैं छोड़ने गई थी। उन्होंने मुझे ₹500 दिए। वह जल्दबाजी में अपना पर्स यहीं भूल गई।  उस पर्स में ₹50, 000 थे। उस नें अपना नाम अनुराधा बताया था।  पुलिस इन्स्पेक्टर  के पास थानें जाकर बोली बाबू साहब उससे पहले कि वह औरत मुझे चोर समझे   आप इस  लिखे पते पर यह रुपया पहुंचा देना। मैं तो ठहरी गरीब मजदूर। उसको शाबाशी देते हुए पुलिस इन्सपैक्टर नें  कहा  शाबाश तुम्हारे जैसे सच्चे इंसान इस दुनिया में बहुत ही कम देखने को मिलते हैं। पुलिस ने उसकी फोटो खींच कर अपने पास  रख दी थी।  

पारो रुपए लौटा कर वापिस आ रही थी तो बड़ी बहूत  तेज वर्षा होने लगी। तूफान भी आ गया था। वह दौड़ कर अपनी खोली में पहुँचना चाहती थी। वह अपनी बेटी को खोली में अकेली छोड़कर आ गई थी।  भागते वक्त एक रईस आदमी की गाड़ी के नीचे आ गई। उस रईस आदमी ने इधर-उधर देखा कोई उसे देख तो नहीं रहा है। उसने जल्दी से पारो को गाड़ी में  उठा कर डाला उसे अस्पताल ले गया। उसका इलाज करवाया। उसके सिर पर गहरी चोट आई थी। उस रईस आदमी ने अस्पताल के लोगों से मिलकर  कहा कि इस औरत को जब होश आएगा मुझे खबर कर देना। पारो को जैसे ही  होश आया डॉक्टरों नें सेठ बनवारी को  फोन करके सूचना दे दी। डॉक्टरों ने कहा कि सिर पर चोट लगने के कारण इसकी याददाश्त चली गई है। धीरे धीरे याद करने पर इस की याददाश्त वापस आ जाएगी इसको 10 दिन बाद फिर दिखा जाना। उसने पारो को गाड़ी में  बिठाया और उसे एक सुनसान स्थान पर छोड़ दिया। वह एक दिन यूं ही वृक्ष के नीचे पड़ी रही। सुबह सुबह  जब उसे होश आया तो उसे  अपने घर की याद आने लगी। वह पुकारने लगी  मुन्नी मुन्नी लेकिन उस की जुबान नहीं निकली। उसे अपना घर याद था। वह अपनी खोली में आई। उसकी बेटी अभी  भी बेहोश थी। उसने जल्दी से अपनी बेटी को उठाने की कोशिश की। उसकी सांसे  तेज तेज चल रही थी। वह डर के मारे बेहोश हो गई थी। अपनी मां को देखकर अपनी मां से चिपट गई। उसकी मां ने बिस्कुट घर पर रखे थे। उसने उसे वह खाने के लिए दिए। वह उसकी बार बार ठंडे पानी की पट्टी करती रही। उस दिन के बाद पारु गूंगी हो गई थी।

पारो अपनी खोली से मांगने निकल जाती शाम तक जो मिलता  अपना और अपनी बेटी का पेट भरती थी।  दिन बीत रहे थे। उसकी बेटी 4 साल की हो गई थी। वह घर के बाहर ही खेला करती थी। उसके घर के पास ही एक बच्चा खेला करता था उसका नाम था अक्षत। वह छोटे से कस्बे में रहता था। पास के कस्बे में एक गवर्नमेंट स्कूल था। उसमें  वह पढने जाता था।  मुन्नी उसको हर दिन बन संवर कर स्कूल जाते देखा करती।  उसका भी मन करता कि वह भी अक्षत को पूछेगी कि वह सुबह सुबह हर रोज कहां जाता है? एक दिन वह जब स्कूल जा रहा था उसके पीछे पीछे चलते हुए स्कूल पहुंच गई। उसे समझ नहीं आया यहां इतने सारे बच्चे क्या करने आते. होंगे। यहां पर तो बहुत सारे अपने जैसे बच्चे हैं। ये मजे से मस्ती करते फिरते होगें।

अक्षत सेठ जी के बडे भाई का बेटा था। पर वहां अपने चाचा चाची  को ही अपनें माता पिता समझता था।

वह भी अक्षत से बहुत ही प्यार करते थे। वह उसे खेलने जाने से कभी भी नहीं रोकते थे।  उन्हें पता था कि अगर जिद करेगा तो वह कहीं अपनें असली माता पिता के पास न लौट जाए  इसलिए वह उसे खेलनें के लिए मना नहीं करते थे। कि बच्चों के मानसिक विकास के लिए खेलना बहुत ही जरूरी होता है। वह उस पर कभी खेलने पढ़ने के लिए दबाव नहीं डालते थे। वह जब भी खेलने जाता तो वह  मुन्नी के साथ ही खेलता था। मुन्नी उसे बहुत ही अच्छी लगती थी।  वह उसके इशारो वाली भाषा समझने लगा था। वह अपनी मां से कहता था कि पड़ोस में मेरी एक दोस्त है वही मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। मुझे सब दोस्तों में वह बहुत ही पसंद है। सब के सब तो कुछ ना कुछ ना कर मांग मांग कर मेरा दिमाग खा जाते हैं वहीं एक सबसे भिन्न है जो मुझसे कुछ नहीं मांगती। मुझे सारी बातें इशारों इशारों में समझाती है। उसकी मां उसे कहती क्या तुम्हारी दोस्त गूंगी है? वह बोला हां ऐसा ही समझो। मां बोली बेटा तू उसकी बात कैसे समझ पाता है। वह बोली मुन्नी सारी बातें मुझे इशारों से  समझाती है। उसकी हर बात आसानी से  मैं समझ सकता हूं। उसकी मां बोली बेटा तुमने उससे नहीं पूछा कि तुम कहां रहती  हो? वह बोला कि हमारे पड़ोस में ही रहती है। उसकी मां एक छोटी सी झोंपड़ी में रहती है। उसका अपनी मां के सिवा कोई भी नहीं है।

वह अपनी मां के लिए खाने पीने का प्रबंध करती है। उसकी मां बोली बेटा ऐसे लोगों से दूर ही रहना।  ऐसे लोग नाटक करना भी जानतें हैं। पर वह हर रोज  मुन्नी के साथ खेलने जाता था।  एक दिन मुन्नी नें उस से पूछा तुम हर सुबह सुबह कंहा जाते हो? वह उसे  बताता कि मैं स्कूल पढ़ाई करने जाता हूं। उसे स्कूल में कुछ भी समझ नहीं आता है। पढ़ाई बहुत ही बुरी चीज होती है। इशारे से  मुन्नी बोली इतनी बुरी चीज होती है तू वहां पर क्यों जाता है? वह बोला मां कहती है रुपया कमाने के लिए और अच्छा इन्सान  बनने के लिए पढना बहुत ही जरूरी होता है। दूसरे दिन राम नहीं आया वह उस पर गुस्सा हुई। वह बोला कि मैं बीमार हो गया था। उसने इशारे से शरीर को छू कर बताया उसे बुखार हो गया था। वह डॉक्टर के पास गया था। मुन्नी बोली कि मेरी मां भी  बीमार है। मुझे बताओ कि वह डॉक्टर कहां मिलेंगे? राम उसे डॉक्टर के पास ले गया। उसने इशारे से डाक्टर को सब कुछ समझा दिया। वह भी अपनी मां को डिस्पेंसरी ले कर  गई। डॉक्टर ने उसकी मां को दवाइयाँ दे दी। उसकी मां ठीक हो गई थी। वह  राम को बोली कि मैं भी तुम्हारे स्कूल में  पढने जाना चाहती हूं। राम बोला तुझे स्कूल में कोई नहीं मानेगा। वह बोली मैंने तुम्हारी अध्यापिका को पढ़ाते देख लिया था। वह बाहर बैठकर पढ़ाती है। वहॉ  पेड़ के नीचे कक्षा लेती है। मैं पेड़ पर बैठकर सारा पाठ ध्यान से  सुनूंगी। तुम क्या पढ़ते हो? रामू बोला मैडम जो पढ़ाती है वह मुझे समझ ही नहीं आता है। मैं हर रोज पेड़ पर बैठ कर पाठ समझ कर तुम्हे पाठ पढा दिया करूंगी। और तुम्हें  इशारों में सब कुछ समझा दिया करूंगी।  हर रोज प्रार्थना शुरू होने से पहले उस पेड़ पर बैठ जाया करुंगी।  पेड़ पर बैठ कर सब सुना करूंगी और और तुम्हें सब सिखा दिया करूंगी। उसने इशारे से राम को समझाया। वह रोज सुबह प्रार्थना शुरू होने से पहले पेड़ पर बैठ जाती और जब छुट्टी होती घर को राम के साथ वापस आती। वहां पर पेड़ से तब तक नहीं उतरती थी जब तक स्कूल बंद नहीं हो जाता था। छुट्टी होने के पश्चात राम उसका इंतजार किया करता था।

एक दिन मैडम कक्षा में बच्चों को पढ़ा रही थी कि बेटा  छोटे  बच्चे से ही  बड़े चोर बनते हैं उन्हें अच्छे संस्कार नहीं मिलते तो वह चोरी करना सीखते हैं। कल मैंने देखा कि एक छोटा सा बच्चा एक बड़े नवयुवक की जेब से रुपए निकाल कर भाग गया। मुझे उस बच्चे के लिए बहुत ही दुःख हुआ। उसे चोरी करते उसकी मां ने नहीं रोका। एक दिन वह बहुत ही बड़ा चोर बन जाएगा। यह सब बातें वह दिशा सुन रही थी। घर आ कर वह भी सोचने लगी कि वह भी तो कई बार कितने लोगों के रुपए चुरा चुकी  है? उन लोगों का चेहरा मुझे याद है। उन लोगों के सारे के सारे वापस कर दूंगी तब तक मैं भाग मांग कर ही पेट भर लूंगी। दूसरे दिन रामू ने उसे चुपचाप देखा तो वह बोला कि तुम्हें क्या हुआ है? वह कुछ नहीं बोली। उसने इशारे से सब कुछ समझाया। राम को इशारे से एक दिन बोली कि मेरी भी मेरा भी स्कूल में पढ़ने को मन करता है। मेरी मां पहले बोलती थी।मुझे से बात भी करती थी।  ना जाने मेरी मां को क्या हुआ कि उसने बोला ही बंद कर दिया? यह मेरी तरह ही बन गई है। वह तो अब बाहर भी नहीं निकलती है। मैं अपनी मां के लिए क्या कर सकती हूं?  राम उसकी बातें सुनकर बोला देखो एक दिन मैं बहुत बड़ा डाक्टर बनूंगा और तेरी मां का इलाज कराऊंगा। वह जो कुछ सुनती उसे समझ आ जाता। राम को होम वर्क करवा देती। बदले में  वह अपनी गुल्लक के रुपये निकाल कर उसे दे  देता। उस से वह राशन का प्रबंध करती। एक दिन उसे वही  मेमसाहब मिली जिसकी जेब से उसने रुपए चुराए थे। उसने देखा कि उस लड़की के पीछे  गुन्डे पड़े थे। वह उसका  पर्स गुंडे झपट कर  ले गए। और उनसे पर्स छीनकर उन मेमसाहब  को थमा दिया।  शाबाश बेटा। उसने  मुन्नी को ₹50 दिए। वह  यह सोचनें  लगी  कि उसने उन गुंडों को पहले भी कहीं देखा है। उसे याद आया कि उसने भी तो एक दिन उन गुंडों का पर्स चोरी किया था। वह इन गुन्डों का पर्स वापिस कर देगी।

उसने सोचा कि मैं  भी स्कूल जाना चाहती हूं। स्कूल में अच्छी बातें सिखाई जाती है। मुझे मैडम की बातें अच्छी लगती हैं। मैडम नें उन्हें बताया  कि उन बच्चों की ज़ुबान सदा के लिए चली जाती है जो चोरी करते हैं। मेरी मां की भी आवाज नहीं है। हां हां  मां नें भी शायद मुझे खिलाने के लिए चोरी की होगी। इसी तरह मेरी आवाज़ भी चली गई है। एक दिन जब वह  घर जा रही थी तो उसे वही गुंडे दिखाई दिए उन्हें देखकर  गुन्डों ने भी उसे पहचान लिया। वह  लड़की कहां  जाती है? उस दिन वह उस के पीछे पीछे चलनें लगे। तुमने हमसे  उस दिन हमारा पर्स  उड़ाया था। परंतु तुम भाग गई थी। वह इशारे से उन गुंडों को  बोली कि मेरे साथ चलो।  वह  गुन्डे उसके पीछे चलनें लगे।  वह एक खोली में घुस गई। उसे खोली में घुसता देख कर वह भी खोली में अन्दर आ गए। मुन्नी नें उन को  पर्स दे कर कहा कि यह लो अपना पर्स।  अपनी मां की ओर इशारा किया  बोली वह भी मेरी तरह मुंह से नहीं बोलती  है। उस दिन के बाद वह उस लड़की पर दया करके कभी  कभी उसे कुछ  न कुछ दे दिया करते थे। पुलिस के डर के मारे उसके घर में भी छुप जाते थे।

मुन्नी को तो पता भी नहीं होता था कि वह उसके घर में क्यों छिपते हैं? मैडम बच्चों को हर दिन नया-नया ज्ञान सिखाती  थी। राम की अर्धवार्षिक परीक्षा आने वाली थी।  बच्चों को  स्कूल में जगह कम होने से बाहर ही बिठाना पड़ता था। वह राम को पेड़ पर बैठ कर ही इशारे से  सारे सारे के सारे  सवाल करवा  देती थी। मैडम  राम के सारे सवाल  सही देख कर बोली तुम बताओ कहां से नकल करके आए हो? तुम तो कभी याद  कर के नहीं  आते हो। वह कुछ नहीं बोला।

एक दिन बड़े जोर की वर्षा हो रही थी।  मुन्नी पेड़ पर बैठी बैठीें बिल्कुल भीग गई थी। एक घंटे तक वर्षा  में भीगती रही। पेड़ पर बैठे-बैठे उसे बहोत सर्दी लग गई थी।  उस दिन मैडम नें सारे बच्चों को   अंदर ही बिठाया। शाम को जब राम पेड़ के पास आया तो मुन्नी को पेड़ पर ही नींद आ गई थी। उसे बुखार भी आ गया था। दूसरे दिन भी मुन्नी स्कूल नहीं आ सकी। मैडम ने राम को  पूछा आज क्या बात है? तुम कुछ नहीं पढ़ रहे हो। आज तो तुम्हारा कोई सवाल ठीक नहीं है। तुम्हारा ध्यान कहां है? आज वह क्या उत्तर देता? उसको समझाने वाली मुन्नी आज स्कूल नहीं आई थी। उसको बुखार आ गया था। राम ने  स्कूल से वापिस आकर उसे दवाई दी। उसका बुखार उतर गया था। राम अच्छे अंक लेकर पास हो गया था। राम अपने मन में सोचने लगा  कि वह भी तो गलत कर रहा है। पास होने के लिए मुन्नी का सहारा ले रहा है। नहीं नहीं, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। मुझे भी डॉक्टर बनना है। मैं अपनी पढ़ाई की तरफ ध्यान दूंगा। काश मुन्नी एक सामान्य लड़की की तरह होती। वह मुझसे अपने मन की बातें कहती। वह मुझसे मुंह से बोल कर अपनें मन की सारे बातें करती। उसकी हर एक बात को वह समझाता था।

एक दिन स्कूल में मैडम ने सभी बच्चों को अपनें पास  बुलाया और कहा कि हमारे आस पड़ोस में कोई भी ऐसा बच्चा हो जो स्कूल ना जा रहा हो। उसे स्कूल लेकर आना। राम खुश होकर बोला हां हां मुन्नी को मैं स्कूल लेकर आऊंगा। मैडम बोली मुन्नी। हैं वह मुन्नी कौन है? तुम्हारे माता-पिता ने तो कहा था कि हमारे कोई बच्चा नहीं है। राम के ईलावा फिर यह मुन्नी कहां से आई?  राम बोला वह बहुत होशियार है। वही  हर काम में मेरी मदद करती है। वह मुंह से नहीं बोल सकती है। वह मेरे पडौस में ही एक छोटी सी खोली में रहती है। मैडम बोली दिव्यांग बच्चों को हमारे स्कूल में नहीं पढ़ाया जाता। मैडम की बातें सुनकर वह चुप हो गया।

एक  दिन उसी तरह मुन्नी पेड़ पर बैठी थी उसने दो तीन नकाबपोश को स्कूल के ऑफिस में घुसते देखा। उसे समझ आ गया था कि वे कोई चोर लगते हैं। उसने देखा कि वह नकाबपोश  स्कूल के अंदर आ  कर उस पेड़ के पास खड़े हो गए थे। उन्होंने सारे ऑफिस का जायजा लिया। उस दिन मैडम ने कक्षा बाहर नहीं लगाई थी। मुन्नी को राम अपनें स्कूल की सारी बाते बता दिया करता था। राम नें उसे एक दिने बताया कि 4 तारीख को स्कूल की सारी फीस  इकट्ठी होती है और दूसरे दिन सारा कैश बैंक में जमा करवाया जाता है। उन गुंडों ने बाहर आकर एक दूसरे को यह बातें बताई। एक दूसरे के पीछे छिप गए और आपस में बातें करनें  लगे। मैडम ने अभी अभी ₹20000 गल्ले में डाले हैं। और हेड मास्टर जी को 50,000 रुपये की  ग्रान्ट  ऑफिस का काम करवाने के लिए आई  है।  मैंने चुपके से बक्से में डालते हुए और उन्हें रुपए गिनते हुए देख लिया था। हम कल 5:00 बजे आएँगे और उस पेड़ के पास   छिप जाएंगे। कल यहां से सारा कैश लेकर फरार हो जाएंगे। वह बोले यार अब  नकाब तो उठा दे।  उन्होंने जैसे ही नकाब उठाया मुन्नी उन्हें देखकर हैरान हो गई। वह तो वही खूंखार लोग हैं जिनका पर्स लेकर  वह भागी थी और उसने वह वालैट लौटा दिया था। अब मुझे समझ में आया कि वह छिपने के लिए मेरे घर में क्यों आते हैं? क्योंकि उस खोली  में तो कोई भी उन्हें देख नहीं पायेगा।कल भी चोरी करने के बाद वह हमारी खोली में शरण करने के लिए आएंगे। वह गुन्डों जब उसकी आंखों से ओझल हो गए वह तुरंत पेड़ से उतरी और अंदर ऑफिस में चली गई। राम की अध्यापिका का हाथ पकड़कर  इशारे से बोली। वह बहुत ही  डरी डरी नजर आ रही थी। मैडम सोचेनें लगी  कि कहीं वह गूंगी बच्ची तो नहीं जिसके बारे में रामू बता रहा था। रामू को बुलाने के लिए मैडम ने एक लड़के को  कक्षा में भेजा। राम मुन्नी को मैडम के सामने देखकर चौंक पड़ा।  मैडम को बोला यही मुन्नी है। मुन्नी ने उसे  इशारे से सारी बात समझाई। मैडम और मुख्याध्यापक  मुन्नी  और रामू को इशारे से बात करते हुए देख रहे थे। मैडम यह कह रही है कि इसने अभी कुछ गुंडों को यहां देखा है। वह ऑफिस से कैश लेकर भागने की साजिश कर रहे हैं। मुन्नी ने हाथ के इशारे से बताया कि वे चार गुंडे कल आने वाले हैं। उन्हें पता है कि कल सारे के सारे बच्चे सांस्कृतिक कार्यक्रम में व्यस्त होंगे। उन्होंने हेड मास्टर जी को एक दिन बात करते सुन लिया था। ऑफिस की ओर तो किसी का ध्यान नहीं जाएगा। यह सब बातें मुन्नी ने सुनी थी।

मुन्नी की पीठ थपथपाते हुए हैड मास्टर साहब बोले तुम कितनी होशियार बच्ची हो। राम बोला मैडम इसका भी पढ़ाई का मन होता था इसलिए वह   हर रोज  पेड़ पर बैठकर आपके पढाए  पाठ को ध्यान से सुनती थी। पहले वह भी चोरी करती थी जिस दिन आपने बताया था कि इंसान को चोरी नहीं करनी चाहिए उस दिन से इसने चोरी किया सारा  रुपया उन सब को वापस कर दिया  जिनकी जेब से उसने पैसे चुराए थे। मैडम कहने लगी कि अगर कल इसकी बात सच्ची होगी तो हम इसकी सहायता  अवश्य करेंगे। इसकी पढ़ाई का ख़र्चा भी हम उठाएंगे। दूसरे दिन स्कूल के हेड-मास्टर ने सभी बच्चों को संस्कृति कार्यक्रम के लिए बुलाया सभी बच्चे अध्यापक एक कमरे में रिहर्सल के लिए इकट्ठे हो गए थे। चोरों को सजा दिलाने के लिए मुख्य अध्यापक ने पुलिस की कड़ी निगरानी करवा दी थी। पुलिस वाले  सामान्य वेशभूषा में स्कूल के बाहर पहरा दे रहे थे।वह गुंडे  जैसे ही स्कूल के ऑफिस में घुसे उन्होंने सारे का सारा कैश निकाला। पुलिस वालों ने उन्हें दबोच लिया। दोनों गुंडों ने पुलिस वालों पर हथौड़े से प्रहार किया। दोनों पुलिस वाले जख्मी हो गए थे और उन दोनों को चकमा देकर  कैश ले कर फरार हो गए थे पुलिस की पहरेदारी के बावजूद भी वह गुंडे भागने में सफल हो गए थे। मुन्नी दौड़ी दौड़ी जाकर राम को बोली कि मैं इन गुंडों को पहचानती हूं। वह आश्रय लेने के लिए हमारी खोली में गए होंगे। स्कूल वालों ने तब तक और पुलिस वालों को फोन कर दिया था। सचमुच  ही वह गुंडे आश्रय लेने के लिए मुन्नी की खोली में गए थे। पुलिस वालों ने उन्हें पकड़ कर जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। स्कूल में मुन्नी की बहादुरी की प्रशंसा हो रही थी

मुख्याध्यापक जी ने मुन्नी की पढ़ाई के लिए सरकार को लिखा था। राम के  भी परीक्षा में अच्छे अंक आए थे। बच्चों के माता-पिता और बड़े-बड़े सम्मानित लोगों को स्कूल में  बुलाया गया था।  स्कूल में इसलिए बुलाया था ताकि उन्हें ईनाम दिया जा सके। सभी के सभी बच्चे हॉल में उपस्थित थे। रामू मुन्नी का हाथ पकड़े उसे मेज के पास ले जा रहा था। राम के पिता एक जाने माने  रईस  सेठ थे  मुन्नी अपनी मां पारो को भी आ स्कूल लेकर आई थी। मुख्याध्यापक जी ने कहा था कि बेटी तुम अपनी मां को भी साथ लेकर आना। उसकी माँ सारा भाषण  सुन रही थी। राम के पिता सब बच्चों को पुरस्कार दे रहे थे। मुन्नी की मां के सामने राम के पिता का चेहरा आ गया। वह वर्षा में भागी जा रही थी। उसे याद आ गया इस व्यक्ति की गाड़ी के नीचे आकर  वह कूचल गई थी। अस्पताल  से वापस आने पर उस व्यक्ति ने उसे  सूनसान सड़क पर छोड़ दिया था। फंक्शन शुरू  होनें ही वाला था। मुन्नी की मां बेहोश होकर नीचे गिर पड़ी थी। उसको  बेहोश होता देख कर सभी अध्यापक आपस में  कहने  लगे कि इस लड़की के कारण हमें इतनी रकम वापिस मिली है। फंक्शन हम  फिर किसी और दिन कर लेंगे। उन्होंने  मुन्नी की मां को जल्दी से अस्पताल पहुंचाया। मुन्नी को उसकी मां नें अपने पास बुलाया और इशारे से कुछ कहा।

सेठ जी को याद आ गया वह तो वही  औरत है जो उसकी गाड़ी के नीचे आ गई थी। उसने उसे इलाज करवाने के बाद सूनसान सड़क पर छोड़ दिया था।  उस दिन   उस औरत को  हाथ हिलाते देखा था मानो इशारे से वह कुछ कहना चाह रही  हो। उस दिन उसकी बात सेठ जी नें उस की बात  सुनी अनसुनी कर दी थी। शायद भगवान ने उन्हें उसके कर्मों की सजा दी थी। उसके अपनी कोई संतान नहीं थी। उन्होनें अपने भाई के बेटे को अपने पास रखा था। उसकी आंखों के सामने हरदम उस मजबूर का चेहरा आता था। उसने उसका इलाज करवाने के बाद उसको  सूनसान सडक पर छोड़ दिया था। उनके बारे में जानने की कोशिश नहीं की कि वह जिंदा भी है  या मर गई  लेकिन उसको आज अपने सामने देखकर सेठ जी की आँसू आंखों से आंसू बहने  लगे। उन्हें पता चल गया था कि वह  ही उसकी बेटी है जिसकी ओर वह इशारा कर रही थी।  सेठ जी को ईशारे से सब समझा कर बेहोश हो गई।

मुन्नी मौन अवस्था में अपनी मां के को निहारी जा रही थी। सेठ जी बोले कि आज मैं इसकी बेटी की पढ़ाई का खर्चा अपने हाथों लेता हूं। मेरे अपने कोई बेटी नहीं है। मैं इस की पढ़ाई का सारा खर्चा उठाऊंगा।  हो सका तो इसका इलाज भी करवाऊंगा

 डॉक्टर साहब डॉक्टर साहब  इसकी मां  बेहोश हो गई थी। उसे होश आ रहा है। शायद वह कुछ कहना चाहती है। सेठ नें पारो को पहचान लिया। सेठ नें हाथ जोड़ कर पारो से क्षमा मांगी और  कहा कि आज से तुम्हारी बेटी को पढाऊं- लिखाऊंगा और उसकी आवाज़ को लौटानें में इसकी मदद करुंगा।

सेठ जी नें मुन्नी और  उसकी मां को अपने घर में एक छोटा सा घर रहने के लिए दे दिया था। सेठानी से जब मिले तो अनुराधा ने पारो को पहचान लिया। बोली तुम तो एक नेक इन्सान हो। मुझे मेरा पर्स मिल गया था। मैं तुम्हे ईनाम दिलवानें के लिए पुलिसस्टेश्न भी गई लेकिन तुम नहीं मिली। सेठ जी ने सारी कहानी अपनी पत्नी अनुराधा को सुनाई। अनुराधा बोली तुम दोनों सचमुच महान हो। अनुराधा नें राम को आवाज दी देखो मैं आज किसे घर ले कर आई हूं। आज तुम्हारी बहन तुम्हारे घर आई है। रामू हैरान हो कर मुन्नी और उसकी मां को देख रहा था। सब की आँखों मे खुशी के आँसू थे।

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