भिखारी

 

मैं जब भी सुबह सुबह कार्यालय से निकलती तो रेलवे प्लेटफॉर्म पर और बस स्टैंड पर भिखारियों को देखा करती। पटरियों पर एक तरफ सिकुडते हुए छोटे बच्चों को फटे वस्त्रों और नंगे पैरों से इधर उधर भागते हुए देखकर मेरी रूह कांप जाती और सोचती यह बेचारे छोटे-छोटे बच्चे इनका बचपन इस तरह क्यों गुजरा? उन्हें मांगते देखती तो सोचती कि इस भगवान की बनाई हुई दुनिया में आज इनका कोई भी नहीं। इनको तन ढकने के लिए कपड़ा नहीं। रहने के लिए घर नहीं। और खाने के लिए रोटी नहीं। जगह-जगह मांग मांग कर भीख ना मांगे तो कहां जाएं?एक दिन जब मैंने एक भिखारी के साथ छोटे से नौ साल के बच्चे को देखा जो अपनी तोतली जुबान से बोल  गया कि बीबी जी बडे़ जोर की भूख लग रही है खाने के लिए चाहिए। कुछ भी   मुझे दे दो।

 

एक दिन तो मुझे  उस पर दया आ गई मैंने उसे ₹दस का नोट निकाल कर दिया।  जैसे ही मैंने ₹दस का नोट दिया उसके बाबा ने उसके हाथ से वह नोट छिन लिया।  मैंने उसे देखते हुए अंदाजा लगा लिया कि हो ना हो यह इसका पिता या संरक्षक  तो हो ही नहीं सकता। इस तरह काफी दिन गुजर गए।

 

एक दिन अचानक ऑफिस जाते हुए वही बच्चा नजर आया। लंगडाते लंगडाते  वह भीख मांग रहा था। मैंने उस से पूछा कि तुम्हारी टांग को क्या हुआ?तो उसके जवाब देने से पहले ही उसका पिता आकर बोला  बीवी जी  इसका एक्सीडेंट हो गया था। इस कारण इसकी टांगे नहीं चल रही है। मैं जल्दी में थी मैंने उस से कहा कि इतनी ठंड में कांपते हो मैं तुम्हें घर से कंबल ला कर दूंगी। दूसरे दिन मैंने उसे कंबल दिया। कंबल पाकर बाप बेटा दोनों खुश हुए। उन्होंने मुझे धन्यवाद दिया।

एक दिन मुझे सुबह सुबह जल्दी में  कार्यलय पहुंचना था।  देखा बस स्टैंड पर दोनों बाप बेटा सो रहे थे। सारा कंबल आदमी नें अपनें ऊपर लपेटा  हुआ था और बच्चा ठंड से कांप रहा था। मुझे समझते देर नहीं लगी कि इसने इस बच्चे को जरूर कहीं से चुराया है। इसका वह अपना बच्चा नहीं हो सकता। अपनें बच्चे के लिए कोई इतना निर्मम कैसे हो सकता है?। उस दिन   मैं कार्यलय से जल्दी  जल्दी छुट्टी लेकर आ गई थी। मुझे मेरे परिचित रास्ते में मिल गए। उन्होंने एक कॉफी हाउस की ओर इशारा करते हुए कहा। यहां बहुत ही अच्छी कॉफी बनती है चलो एक कप कॉफी हो जाए।

 

अंदर से समोसों की खुशबू आ रही थी। मैं अपने सहकर्मियों के साथ कॉफी का आनंद लेने लगी। मैंने एक लड़के को भागते-भागते देखा वह समोसे   मांग रहा था।  मैंने  घर ले जानें के लिए समोसे खरीदे। मैंने अपने दिमाग पर जोर देते हुए डालते हुए कहा कि शायद मैंने इस लड़के को कहीं देखा है। जब कॉफी पी कर चुकी तो मैंने देखा कि उस लडके कि शक्ल भिखारी के बेटे से शक्ल मिलती थी। मैंने भिखारी के बेटे को तो देखा हुआ था। वह तो एक टांग से लंगड़ा था। मैंनें उस लडके को पहचान लिया था। वह तो लंगडाते हुए नही चल रहा था।

 

मुझे समझते देर नहीं लगी कि उस भिखारी ने मुझे बेवकूफ बनाया था। वह  न जानें दिन में कितने लोगों को ठगता था।  और भीख मांगने का नाटक करता था। किसी भिखारी को भीख देते हुए मुझे ऐसा लगता ही नहीं कि  इन्हें   कुछ दिया जाए। एक दिन उसी बच्चे को फिर मैंने भीख मांगते देखा। वह बुरी तरह बीमार हो चुका था। रात को ठंड में ठिठुरते हुए उसे देखा था। और  एक दिन सचमुच वह बीमार हो गया। भिखारी के पास अपनें बेटे के इलाज के लिए रुपए होते हुए भी वह उन को खर्च करना नंही चाहता था। वह झूठमूठ का नाटक कर लोंगों में दया भाव बटोरना चाहता था ताकि लोग उस पर दया कर उसके बेटे के इलाज के लिए उसे रुपये  इकट्ठे कर के दे दे।

 

भिखारी सब लोगों से पैसे मांगने लगा कि मेरे पास अपने बेटे के इलाज के लिए रुपए नहीं है। शाम तक उसके पास ना जाने कितने रुपए इकठ्ठे हों जाते थे। वह उन रुपयों से अपने बेटे का इलाज नहीं करवाता था। उन से शाम के समय अपनें दोस्त भिखारियों के साथ शराब और नशे में धुत  रहना उसका काम था।

 

एक दिन मैंने उसे अपने उस भिखारी बच्चे की लाश पर जोर जोर से झूठे आंसू बहाते देखा। वह लोगों में बिलख-बिलख कर उनसे उसके कफन के लिए रुपए मांग रहा था। उस बच्चे के कफन के लिए भी उसके पास रुपए नहीं थे। वह भिखारी वहीं प्लेटफार्म के पास एक खोली बनाकर रहता था। उसने अपने बेटे को ठंड के कारण मरने के लिए मजबूर कर दिया। उसका बेटा तो उस दुनिया में नहीं था लोग उसकी लाश को देखकर सब उस भिखारी को रुपए दे रहे थे।

एक दिन सुबह सुबह जब मैंने अखबार में उस भिखारी की पहले पन्ने पर फोटो देखी तो मैं चौक गई। उसकी खोली जिसमें वह रहता था जलकर राख हो चुकी थी। वह भिखारी बच गया था। उसके बारे में जो अखबार में लिखा था उसको सुनकर मेरी आंखें फटी की फटी रह गई। उस भिखारी ने रो-रो कर अखबार वालों को बताया था कि उसके 10, 00,000रुपए उस खोली  की चारपाई में तकिए  के बीच लपेटे हुए थे जलकर राख हो गए। भिखारी की दयनीय अवस्था पर मुझे करुणा नहीं आई। उस भिखारी के प्रति मेरा मन द्रवित नहीं हुआ। जिस भिखारी ने इतना रुपए होते हुए भी अपने बच्चे की जान नहीं बचाई। ऐसी भिखारियों को तो कैद में डाल देना चाहिए जो ना जाने किन किन घरों के बच्चों को अगवा कर उनसे भीख मंगवाते हैं। और उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर कर देते हैं।  

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