झूठा इल्जाम

नंदिता घर आते ही अपने पिता के पास भाभी भागी आई। पापा आज आप मेरी पिटाई तो नहीं करोगे। उसकी मां कमरे में नंदिता के   समीप आई और बोली क्यों रो रही है? वह रोते रोते बोली  स्कूल में आज  दोस्तों नें मेरी पैन्सिल चोरी कर दी। उसके पापा बोले गुम कर दी तो मैं तुम्हें दूसरी पैन्सिल तब तक लाकर नहीं दूंगा जब तक तू अपनी वस्तुओं की इफाजत करना नंही सीखेगी। एक पेंसिल की बात नहीं है। तुम अपनी सभी चीजों को संभाल कर जब तक नहीं रह सकते तब तक बिना पैसिल के ही तुम्हें काम चलाना  पड़ेगा। उसके पिता बोले मैं कब तक तुझे पैसिलें ला कर देता रहूंगा मुझे तेरे दो भाइयों को भी देखना है। वह तुझ से छोटे हैं। तुम ऐसा  करोगी  तो वह भी  ऐसा ही सीखेंगे। हमारे जीवन में छोटी सी छोटी वस्तु का महत्व होना चाहिए। उस छोटी सी नंदिता के मन में यह बात आ गई थी। वह चुपचाप स्कूल चली गई। अपनें पापा  के सामने उसने जुबान खोलना अच्छा नहीं समझा। उसके पिता ने उसे कहा कि इस महीने तो मैं तुझे पैंसिल लाकर नहीं दूंगा। स्कूल में जाते-जाते भी उसे डर लग रहा था। अध्यापिका ने स्कूल में सवाल लिखा दिया तो वह क्या करेगी? उसने अपने दिल को ढाडस बंधाया। वह दूसरे दिन  स्कूल में चली गई। उसके साथ बैठने वाली उसकी सहेलियां  और दोस्त मित्र जब उन सभी के पास पैन्सिल नहीं होती थी तो वह उनको अपनी पेंसिल दे देती थी। वह अपनी पैन्सिल के 5 टुकड़े कर देती थी। उसके खास  दोस्त जब स्कूल में पेंसिल नहीं लाते थे तो वह उन पांचों को  अपनी पैन्सिल दे देती थी। छः महीने तक उसके दोस्त उस पेंसिल को ही प्रयोग में ला रहे थे। वे अपने पैंसिल तो स्कूल में नहीं लाते थी। उसकी और भी  सहेलियां  और कक्षा के दोस्त  थे। वे कक्षा में आपस में  एक दूसरे के साथ अपनी वस्तु साझा नहीं करते थे। उस के खास तो पांच ही दोस्त थे।  तीन लडकियां और दो लडके। वे सभी   उसके आगे पीछे घूमते रहते  थे।

आज  तो मुझे पैन्सिल दे दे नहीं तो मैडम मारेगी। वह बेचारी  सब से पेंसिल मांग रही थी। उसके दोस्तों में से कोई भी उसे पैन्सिल नहीं दे रहा था। वह  अब  अध्यापिका जी से क्या कहेगी? मेरी बात पर  तो कोई विश्वास नहीं करेगा। स्कूल में चित्रा मैडम कक्षा में पहुंच गई थी।  अध्यापिका बोली बच्चो आज तुम्हारा टैस्ट होगा । उसने अपने दोस्तों को कहा मुझे पैसिल दे दो। उसके जो खास दोस्त थे उन सभी के पास पेंसिल थी। लेकिन उन्होंने उसे अपनी पेंसिल नहीं दी। उसके साथ वाले उसके क्लास में पढ़ने वाले  और भी सहपाठी थे। वह अपनी चीजें किसी के साथ भी साझा नहीं करते थे। इसलिए नंदिता को पता था कि वे सभी उसे पैसिल नहीं देंगे लेकिन उसकी सहेलियां तो उसके साथ अच्छी थी। परंतु यह क्या  वे सभी की सभी बदल गई थी। वह उन सब से विनती करने लगी कृपया करके आज मुझे पैसिल दे दो। मेरे पिताजी ने मुझे कहा था कि मैं तुम्हें पेंसिल तब तक नहीं दूंगा जब तक छोटी सी छोटी चीज का तुम महत्व नहीं समझोगी। तुम  को जब   अध्यापिका की  डांट पडेगी तब तुम समझोगी। इतने में क्लास की मैडम उनके कक्षा में  आ   गई थी। उसने अपने मन में सोच लिया था कि आगे से वह अपनी वस्तुएं सम्भाल कर रखेगी। नंदिता  अपनें दोस्तों की ओर इशारा करते हुए बोली कि दोस्त उसे कहते हैं जो मदद पड़ने पर सहायता करें। लेकिन तुम सब के सब स्वार्थी हो। आज मुझे एक बात की सीख  मिली। हमें स्वार्थी मित्रों का साथ नहीं करना चाहिए। वह अपने बैंच से उठी और उस पर बैठनें ही लगी थी तभी अध्यापिका जी  नें उसे दूसरे   बैन्च पर  बैठते हुए देख लिया था। दूसरे  बैन्च  पर बैठकर वह अपनी कॉपी निकाल ही रही थी कि उसे  सीट के पास वहां पर  पैन्सिल का छोटा सा टुकड़ा  नीचे गिरा दिखाई दिया।वह उसे उठानें लगी। मैडम नें उसे कुछ उठाते देख लिया था। उसने देखा वह तो उसकी पेंसिल का ही एक टुकड़ा था। वह बोली मैडम सॉरी।

अध्यापिका ने सारे बच्चों को सवाल  लिखाए। उसने जल्दी से सारे के सारे सवाल  हल कर दिए। आज  वह  साफ साफ बच गई थी। चलो कुछ दिन इस पेंसिल से ही काम चलाएगी।  मैडम चित्रा हर रोज उस पर नजर रखने लगी। यह लड़की क्यों अलग बैठी है? अध्यापिका बोली बेटा आपस में लड़ाई नहीं किया करते। सब बच्चों को आपस में मिल जुल कर रहना चाहिए। हर बात पर झगड़ा करते हो। मैंनें कक्षा में आने से पहले तुम सबको तू तू मैं करते देख लिया था। इसी तरह लड़ते रहोगे और तो और बच्चे भी लड़ाई करना सीखेंगें। तुम बताओ तुम क्यों झगड़ रही थी?   उसकी  सहेलियां बोली  अध्यापिका जी वह अपनी चींजें तो  नहीं लाती हैं यह कभी भी अपनी पेंसिल नहीं लाती है।। हर रोज पेंसिल हम से मांगती है। हम उसे अपनी पेंसिल नहीं देना चाहते। मैडम  नें नंदिता को खड़ा करके  कहा क्या यह बात सच है? वह सोचनें लगी कि यह सभी तो मुझ पर झूठा इल्जाम लगा रही हैं। मैं तो अकेली हूं। अकेली लड़की  इन सभी का मुकाबला नहीं कर सकती। वह अपनी सफाई में कुछ नहीं बोली। उसने चुपचाप रहना ही उचित समझा। उसके दोस्त उसे खड़ा देख कर सोच रहे थे कि यह भी कुछ कहेगी लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। अध्यापिका नें कहा  कल  पैन्सिल  जरूर ले आना।

छोटे लोगों की फितरत तो यही होती है सामने वाले को नीचा दिखाने की। मैं हर हाल में उन जैसा नहीं बनना चाहती। मुझे अपनें दोस्तों से भी नहीं झगड़ा करना है और ना ही  उन्हें नीचा दिखाना है। मैं भी ऐसा ही बन गई तो मुझमें और इन में क्या फर्क रह जाएगा? कभी ना कभी तो इनका घमंड उतरेगा। जब परीक्षा नजदीक आएगी तब सब भीगी बिल्ली बन कर मेरे आगे पीछे घूमेंगे। इस बार तो मैं जितना परिश्रम करती हूं उससे दोगुनी मेहनत करूंगी। यह सब मुझे अकेला समझते हैं। अकेला इंसान भी अपनी मेहनत के बल पर आगे बढ़ सकता है।

अध्यापिका उसे हर रोज छोटी सी पेंसिल से काम करते देखा करती थी। अध्यापिका जब भी पढ़ाती थी  वह हर प्रश्न को याद कर लेती थी। वह बहुत ही नेक और ईमानदार थी। उसने अपने मन में सोचा कि वह मैडम के प्रश्न के उत्तर नहीं दिया करेगी। परीक्षा में वह सबको अच्छे अंक लाकर चौंका देगी। मैडम नें देखा वह बच्ची अपने बस्ते को बहुत ही अच्छे ढंग से रखती थी। डैस्क के नीचे कपड़ा बिछा लेती थीं ताकि उसका बस्ता गंदा न हो। उसके कक्षा के बच्चे आते ही बस्ते को बैंच पर ऐसे पटकते  थे मानों उन्हें  जबरदस्ती स्कूल भेजा गया हो। अध्यापिका जैसे ही कक्षा से बाहर जाती बच्चे धमाचौकड़ी मचाने लगते। मैडम ने कमरे में कैमरा और टेपरिकारडर फिट कर दिया था। वह कक्षा के बच्चों की बातों को सुनने की कोशिश करती थी। वह देखना चाहती थी कि  बच्चे आपस में क्यों लड़ाई करते हैं? क्यों यह छोटी सी बच्ची कक्षा में अकेली बैठती है? मुझे तो यह बच्ची ठीक लगती है। और  अपनी कौपियों   में  जिल्द लगा कर रखती है। एक दिन मैडम ने रिकॉर्ड की गई बच्चों की सारी बातें सुन ली थी। सभी बच्चे आपस में कह रहे थे कि हमने नंदिता के साथ अच्छा नहीं किया। सोनी बोली नंदिता के साथ हमने बहुत ज्यादती की है। वह हर रोज अपनी पैसिल हमें काम करने के लिए दे देती थी। आज जब मैडम ने टेस्ट लेना चाहा तो  उसके पास पैसिल नहीं थी। आज हम सभी पैसिलें लाए थे। हमें भी उसकी मदद करनी चाहिए थी। हम सबने अध्यापिका जी को झूठ बोल दिया। वह बेचारी  तभी अलग जाकर बैठ गई। अध्यापिका ने नंदिता को कहा कि क्या तुम पेंसिल हर रोज नहीं लाती हो?  यह सब बच्चे तुम्हें ठीक ही कह रहे हैं वह अपनी सफाई में क्या कहती? सोनी बोली अध्यापिका जी के आने से पहले उसनें    मुझे बताया था कि मेरे पिताजी ने मुझे कहा कि जब तक एक महीना समाप्त नहीं हो जाता तब तक उसे दूसरी पैन्सिल नहीं मिलेगी। जब  अध्यापिका की मार पड़ेगी तब कहीं जाकर उसे चीजों को अच्छे ढंग से रखने की आदत पड़ेगी। बेचारी नंदीता मुझे तो उसके लिए बड़ा बुरा लग रहा है। मैं तो उससे माफी मांग लूगी। उसके साथ बैठनें वालीे  सहेलियां कहनें लगी उसकी इतनी तामिरदारी क्यों करती हो?वह बोले यह टैस्ट में हमें नकल नहीं करवाती।

अध्यापिका को सारी बात पता चल चुकी थी। वह सभी बच्चों पर नजर रखने लगी। उन्हें पता चल चुका था कि नंदिता एक गरीब घर की लड़की है। दूसरे दिन मैडम कक्षा में आई तो नंदिता को कहा कि यह लो आज मैं तुम्हें  यह पेंसिल देती हूं। उसको संभाल कर रखना। नंदिता पेंसिल पाकर इतनी खुशी हुई। उसका चेहरा  ऎसे खिल उठा मानों बरसों के बाद खुशी उसे हासिल हुई हो। मैडम  हर रोज देखती  थी। मैडम के सारे प्रश्नों के उत्तर दे रही थी। अध्यापकों को समझ में आ गया था बेचारी छोटी सी बच्ची के दिमाग  में पैन्सिल न   ले कर  आने पर यह सवाल उठ रहे थे। एक महीने से छोटे से टुकड़े से काम करते  उसे देखा था।  इसलिए उसनें नंदिता को पैन्सिल ला कर दी थी। दूसरे दिन फिर से  उसे छोटे से टुकड़े से काम करते देखा तो  अध्यापिका को भी गुस्सा आ गया। मैनें कल ही तो तुम्हें पैन्सिल ला कर दी थी। आज यह इतनी छोटी कैसे रह गई। नंदिता कुछ नहीं बोली। कक्षा अध्यापिका नें सोचा कि इस लड़की की आदत ही है  छोटी सी पैन्सिल से लिखनें की।

उसके पापा जब घर आए तो अपनें मन में सोच रहे थे उस छोटी सी बच्ची को न जानें क्या क्या बुरा भला कह गया। आज उसे स्कूल में अवश्य ही डांट पड़ी होगी। मैं तो उसे केवल समझाना चाहता था। हर रोज चीजें चोरी होती जाएंगी तो कैसे चलेगा? उसे समझाना तो जरुरी था। वह पन्द्रह दिन बाद अपनी बेटी को पैन्सिल ले कर आए थे।

नंदिता नें  स्कूल से आते ही  एक चिट्ठी अपनें पापा को देते हुए कहा पापा यह चिठ्ठी मैंनें आप को लिखी है। यह पढ लेना।  उसने लिखा था पापा मैं अपनी चीजों कों यूं ही इधर उधर फैंक देती थी। आप नें मुझे सिखाया था कि छोटी से छोटी चीजों का हमारे जीवन में कितना महत्व होता है चाहे वह  छोटी से छोटी  वस्तु ही क्यों ना हो? आज अध्यापिका जी ने मुझे पूरी पेंसिल दी। मैंने उस पेंसिल के टुकड़े कर दिए ताकि यह पैंसिल  काफी दिन चला सकूं। आप से ही मैंने छोटी से छोटी चीज की अहमियत सीखी है। अध्यापिका मुझ पर गुस्सा भी हुई लेकिन मैंने अध्यापिका के गुस्से की परवाह नहीं।  पापा मैं अपने कक्षा के अपनें दोस्तों को अपनी पेंसिल के टुकड़े काम करने के लिए देती थी।एक दिन उन्होंने  मुझ पर सारा इल्जाम लगा दिया कि मैं ही पेंसिल नहीं लाती हूं। उस दिन आपने  मुझे यह भी कहा था कि जब तक तू किसी चीज की कीमत नहीं समझेगी तब तक तुझे पैसिल लाकर नहीं दूंगा।  इस सीख  को मैनें अपनें दिमाग में बिठा लिया था। मुझे आपकी बात अच्छी लगी। मैडम की नजरों में मैं गलत साबित हुई। मुझे आपकी सीख याद आई आपने मुझे समझया था कि बेटा चाहे तुम्हारे मित्र तुम्हारे  साथ कितना  भी झगड़ा करे तुम्हें उनके विरुद्ध कुछ नहीं कहना। क्योंकि जो लड़ाई झगड़ा करते हैं उनकी सोच उतनी ही छोटी होती है। तुम भी उन जैसा बन गई तो तुम में और उन में क्या फर्क रह जाएगा? इसलिए मैंने अध्यापकों को कुछ नहीं कहा। ऐसा नहीं है कि मैं उनका मुक़ाबला नहीं कर सकती थी। मैं भी अध्यापिका जी को अपनी सफाई दे सकती थी। लेकिन मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा

उसके पिता ने उसके लिखे पत्र को पढ़ा और खुश होकर बोले बेटी आज तुम छोटी सी छोटी वस्तु के महत्व को समझ गई हो। मैं तुम्हारे पत्र के साथ यह एक पेंसिल तुम  को इनाम स्वरूप दे रहा हूं। तुम नें अपने दोस्तों के साथ लड़ाई झगड़ा नहीं किया।  तुम आगे से उन्हें  कोई वस्तु देने से पहले सोच लिया करो। बेटा अगर कोई बच्चा बहुत ही मुश्किल में हो तो उसकी सहायता करना तुम्हारा फर्ज है। उसके पापा ने यह  सब बातें उस   खत में ही लिख कर उसके बैग में  वह खत रख दिया था।

दूसरे दिन  खेल से आतें के बाद  उसे नींद आ गई। उसने  अगले दिन स्कूल जानें के लिए अपना बैग उठाया और स्कूल के लिए निकल पड़ी।

अध्यापिका ने कक्षा में आते ही सब बच्चों को कहा कि खड़े हो जाओ। मैडम को बच्चों की चालाकी   का पता चल गया था वह लड़की बिल्कुल सच्ची थी। मैडम कक्षा में नंदिता की प्रशंसा करने लगी। वह सब बच्चों को कहनें लगी तुम्हें तुम्हें भी नंदिता जैसे बनना चाहिए। उसकी सहेलियों को बड़ा गुस्सा आया। मैडम तो इसी की  ही चहेती है

एक दिन कक्षा में मैडम टैस्ट लेने जा रही थी कि मैडम ने बच्चों को सवाल  लिखवाया। उसकी सहेलियों में से एक भी लड़की पेंसिल नहीं लाई थी। उन्हें तो मांगने की आदत थी नंदिता ने अपने बैग से पेंसिल निकाली और उस पेंसिल से टेस्ट देने की सोची जो  पेंसिल उसके पिता उसे लाए थे। अध्यापिका ने जैसे ही टैेस्ट लिखवा कर दिया तो उन सब लड़कियों ने अध्यापिका को कहा कि  आज उसके पास बड़ी पैन्सिल है। यह तो हमेशा छोटी पेंसिल से ही काम करती है। इसने हमारी पेंसिल ले ली है।  यह लाल रंग की पैन्सिल तो मेरी है। आभा बोली। वह कहना ही चाहती थी कि मेरे पापा तभी अध्यापिका ने उससे पैसिल छीन ली।  उसके शब्द  उसके मुंह में ही रह गए। अध्यापिका नें भी  उसे  हमेंशा छोटी सी पैन्सिल से  काम करते देखा था। अध्यापिका  जी ने उन सबको बेंच पर खड़ा कर दिया। सुबह आते ही  तुम सब बच्चे  झगड़ा करने लगते हो। कक्षा की प्रार्थना की घंटी बजी। सभी बच्चे प्रार्थना के लिए चले गए।  अध्यापिका सोचने लगी कि यह बच्ची चोरी नहीं कर सकती। आज सभी बच्चों की तलाशी लेनी चाहिए। अगर यह चोरी करते होंगे तो उनके  बस्ते  में और भी चोरी किया सामान मिलेगा। सबसे पहले नंदिता की ही बैग देखा  जाए।  अध्यापिका ने सारा  बस्ता छान मारा परंतु उसे कुछ नहीं मिला। बस्ते  कि जेब में एक खत पड़ा  था। उस  में नंदिता ने अपने पापा को खत लिखा था। वह  खत अध्यापिका जी ने पढ़ लिया।  उसके पापा ने नीचे लिखा था कि मैं तुम्हें यह लाल रंग की पैंन्सिल उपहार स्वरूप दे रहा हूं। यह रंग तुम्हें अच्छा लगता है। अध्यापिका जी को सब कुछ पता लग गया था। कि इस बच्ची पर उन्होंने झूठा इल्जाम लगाया है। यह बच्ची तो इतनी मासूम है। उसके पापा  नें उसे ईनाम के रुप में यह पैन्सिल दी थी।

अध्यापिका ने सभी दोस्तों को कहा कि तुम सब को शर्म आनी चाहिए। तुम्हें तो इस से सीख लेनी चाहिए। छोटी सी बच्ची एक छोटी सी वस्तु की कीमत को समझती है। मैंने जब उस दिन उसे पैन्सिल दी थी तो मुझे भी उस पर गुस्सा आया था कि उसने यह पेंसिल छोटी कर दी थी। लेकिन आज उसको देख कर  मुझे भी बहुत सीखनें को मिला। एक छोटी सी बच्ची से भी हम सीख ले सकतें हैं। तुम्हें क्या मुझे भी इस से सीख लेनी चाहिए? हमें हर एक वस्तु की कीमत को समझना चाहिए। चाहे वह एक पेंसिल ही का टुकड़ा क्यों ना हो? सब के सब बच्चे नंदिता को देख रहे थे

मैडम ने दूसरे दिन सभी बच्चों के सामने उसे ईनाम दिया और कहा कि तुम सभी को नंदिता जैसा बनना चाहिए। सभी के सभी बच्चे उसके दोस्त बन गए थे। उन्होंने नंदिता से कहा कि हमें क्षमा कर दो। हमने तुझ पर झूठा इल्जाम लगाया लेकिन तुमने हमारी गलतियों को माफ कर दिया। तुम सच में ही महान हो।

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