दूसरा जन्म

किसी गांव में एक औरत रहती थी।उसका नाम था जमुना। वह बहुत ही नेक इंसान औरत थी। कोई भी उसके घर में आता था उसको भी बिना खिलाए घर से जाने नहीं देती थी। मेहमानों का सत्कार इतने अच्छे ढंग से करती उसे अगर खाने को ना भी मिले तो वह भूखे पेट ही सो जाती थी। मगर अपने घर से किसी को भी भूखे जाने नहीं दिया करती थी।उसनें जीवन के 75 साल पार कर लिए थे। वह दिखने में सुंदर मोटे-मोटे चश्मा वाली  लाठी टेक-टेक कर अपने आसपास के घरों का चक्कर लगा कर आ जाती थी। घर में आकर अपने पोते पोतियो के साथ अपना समय खुशी खुशी बिता रही थी। बूढ़ी हो गई थी उससे काम ठीक ढंग से नहीं होता था। उसके दो बेटे  जो कुछ खाने को दे देते वही खाकर अपना गुजारा करती थी। वहां दान देने में भी असमर्थ थी। कभी-कभी अपने आसपास के घरों का चक्कर लगाती थी। बीमार भी रहने लग गई थी। एक दिन इतनी बीमार पड़ी कि उसने खटिया पकड़ ली। उसके बहू बेटे उसे वैद्य के पास लेकर चले गए। डॉक्टर ने उस की नब्ज को टटोला और कहा कि तुम्हारी माताजी  अब इस दुनिया में नहीं है।

उन्हीं के घर के  उपर की  पहाड़ी पर एक गांव था। उस गांव का नाम भी उनके गांव के नाम जैसा ही था फर्क इतना था कि जमुना का ब्राह्मण परिवार था और पास के गांव का नाम भी वैसा ही था। वह गांव राजपूतों का था। हर आने-जाने वाले पता करते करते उस गांव में आते थे तो कभी भूल कर दूसरे गांव में पहुंच जाते थे। जब ब्राह्मण परिवार का नाम लेते थे तब उस व्यक्ति को लोग सही स्थान पर पहुंचा देते थे।  उनके मानें की खबर सुनकर परिवार के सदस्य रोने लगे।  उन्होंने अपने मन को समझाया चलो कोई बात नहीं मां नें जितनी जिंदगी जी वह खुशी के साथ जी। हमारी तरफ से उनको कोई भी कमी नहीं थी। हम उनका अंतिम संस्कार का कार्य भी अच्छे ढंग से करेंगें। उसकी दो बेटियां थी। वह आपस में कहने लगी कि हम तो यहां आती जाती थी हमारी मां तो बिल्कुल ठीक थी। वह नहीं मर सकती। उसके पिता उन्हें सांत्वना देते हुए कहने लगे कि भगवान को जो मंजूर था वह हो चुका होनी को कोई नहीं टाल सकता। अपनी तरफ से हमने उनकी देखभाल में कोई कमी नहीं की। उन्होंने परिवार में सबको सूचित कर दिया।

सारे के सारे परिवार वाले अंतिम संस्कार पर पहुंच चुके थे। जमुना को अच्छे ढंग से वस्त्र पहनाकर सजाया गया। मांग  में टीका लगाया गया। वह इतनी खूबसूरत नजर आ रही थी लड़कियां अपनी मां को सीने से लगाए रोए जा रही थी। घर में सन्नाटा  था। खामोशी थी। घर के सभी सदस्यों के चेहरे उदास थे। बच्चों को तो  वह बड़े अच्छे ढंग से रखा करती थी। उसका इतना रोआब था कि सभी उसी की आज्ञा का पालन करते थे।। उसकी आज्ञा का उल्लंघन, कोई नहीं करता था। गांव वाली औरतों की तो वह जान थी। जब भी पानी भरने गांव की औरतें  आ जाती जमुना के घर में उस से गप्पे लड़ाने बैठ जाती। सभी को अपना बना लेने की आदत उसमें  थी।  गांव की औरतों को जब कोई मुश्किल आती तो जमुना से सलाह लेना नहीं भूलती थी। अंतिम संस्कार की घड़ी में ना जाने कितने लोग आए थे। घर में कहीं भी जगह नहीं बची थी। सारा घर उदासी में डूबा था। जब अंतिम संस्कार के लिए जमुना को ले जाने लगे तो सभी लोगों की आंखें नम थी।

जमुना की लाश को कंधे पर उठाने लगे तब परिवार के सदस्य जोर से रोने लगे। मृत्यु हो जाने पर जो  शंख बजाया जाता है वह जब बजा रहे थे तभी अचानक जमुना ने  उठाएं की कोशिश की। राम-राम करके मुंह से राम-राम कहा। लोग इधर-उधर देखने लगे। कुछ लोग कहें लगे  कि आवाज तो शैया से आ रही है। लोगों ने देखा कि फिर से राम-राम की आवाज आ रही है।

लोगों ने देखा वह  औरत तो मरी नहीं थी। वह तो जिंदा थी। लोग अचंभित होकर एक दूसरे को देख रहे थे। घर में उसे वापिस  पहुंचाया गया। घर आने पर लोग उसके सारे परिवार के सदस्य हैरान रह गए। लोगों ने उसे  शैया से उठा कर बिस्तर पर रख दिया। वह तो बिल्कुल ठीक हो चुकी थी।

लोगों ने उसे कहा कि माता जी हम आपसे क्षमा मांगते हैं। हम आप को मरा समझकर आप का अंतिम संस्कार करने चले थे। हम से ना जाने इतनी बड़ी भूल कैसे हो गई। जमुना बोली भाइयों तुम सब क्षमा क्यों मांगते हो? मैं तो सचमुच ही मर गई थी। मैं तुमको अपनी कहानी सुनाती हूं। मर जाने के बाद रास्ते में वैतरणी नदी को पार करना पड़ता है। ना जाने कितने बड़े बड़े पहाड़ पार करने पड़ते हैं। यह सब देखकर रोंगटे खड़े हो गए। रास्ते में भटक गई थी। भूखी प्यासी थी तो भूख लग रही थी। तभी सामने से इतने सारे जानवर आकर मुझे खाना खाने को देने लगे। गाय को मैं रोटी खिला या करती थी। गाय नें कहा तुम मुझे  रोटी  खिलाती  थी। पक्षियों ने मुझे सारा रास्ता बताया। मुझे आग के दरिया को भी हंसते-हंसते मैंने प्यार करा दिया। पार ले जाते जाते चार दिन हो चुके थे। यहां केवल एक  पहर ही बीता होगा। जानवरों ने  उस से कहा कि तुमने हमारी सहायता की थी इसलिए हम तुम्हारी सहायता करने के लिए आ गए हैं।   दूत उसे  यमपुरीके राजा यमराज के पास लेकर गए थे। यमदूत ने अपने दूतों को फटकार ते हुए कहा कि तुम  इसे क्यों उठाकर ले आए  हो इसका तो अभी मरना निश्चित नहीं था। वह  उसी गांव की पहाड़ी में जमुनानाम  नाम की  इसी की  हम उम्र  औरत है। लेकिन वह राजपूत परिवार की है। उसका नाम भी जमुना है। उसे लाना था। यह तो ब्राह्मण परिवार की है। गलती से जमुना समझ कर दूसरी औरत को लेकर  आ गए  हो।  दूतों नें यमराज से क्षमा याचना की और कहा कि  हम इस औरत को आदर के साथ ही के गांव  में सही सलामत पहुंचा देंगे। अभी इसका मरने का समय नहीं आया है। अचानक जब जमुना की आंख खुली तो उसे शंखनाद सुनाई दिया। उसनें सोचा  यह मंदिर की घंटी का शब्द है। लोग उसकी बातें सुनकर स्तब्ध रह गए।

लोगों ने  सुना उसी गांव की राजपूत औरत उसी वक्त मर गई तब कहीं जाकर जमुना पर विश्वास हुआ। सब के सब राम-राम कहकर अपने घरों को चले गए। जमुना भी अपने घर आकर अपने परिवार के लोगों के साथ सुख चैन से रहने लगी।