ऋतुराज बसंत

प्रकृति के सौंदर्य में चार चांद लगाता है ऋतुराज बसंत।
मलय पवन की सुगन्ध से लता कूंज को महकाता है बसंत।।

पीली सरसों से खेतों को सुसज्जित करता है बसंत।
झूम झूम के पक्षियों के कलरव से वन को महकाता है बसंत।।

प्रकृति के कोनें कोनें में अपनी छटा को बिखराता है बसंत।
हर्ष आनन्द प्रेम प्रसन्नता और ऊमंग का आवेश व्यक्ति के मन में जगाता है बसंत।।,
बगिया के आंगन में फूलों की खुशबू से अपनें चारों और स्वच्छ परिवेश का
आवरण है बनाता बसंत।
भंवरें तितलियों की गूंजन से वाटिका को हरा भरा लहलाता ऋतुराज बसंत।।

पुरानें पते झाड़ नई नई कोंपलों से मनमोहक छवि का संचार करता बसंत।
प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को खुशहाल बनाता है बसंत।।

माघ पंचमी के दिन धूमधाम से मनाया जाता है उत्सव बसंत।।
व्यक्ति के मन में स्फूर्ति और जोश की उमंग जगा कर उस कि छवि को और भी महकाता है बसंत।

मानव मन में सकारात्मकता का भाव है जगाता बसंत।
रचनात्मकता और सृजनात्मकता के पथ पर विचारों में श्रेष्ठता है लाता बसंत।
कोयल की कूक व मधुर संगीत से व्यक्ति के मन को है लुभाता।
प्रकृति का दुल्हन की तरह श्रंगार करता है
ऋतुराज बसंत।।
विद्या की देवी सरस्वती का आव्हान करता है बसंत।
लेखकों को लिखनें के लिए प्रोत्साहित करता है बसंत।।
हृदय कि प्रसन्नता को चेहरे पर झलकाता है बसंत।
हे ऋतुराज बसंत तुम्हारा दिल से अभिनन्दन।।

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