वन के प्राणीयों की गुफ़तगू

वन के पक्षियों नें जंगल में सभी जीवों को आपातकालीन न्योता दे कर बुलवाया।
जंगल में एक बड़ी बैठक का आयोजन करवाया।।
वन के पक्षी आपस में वार्तालाप कर बोले।
आजकल हमारा भी धीरज है डोले।।

शहरों व कस्बों में मधुर कलरव कर इन्सानों को हैं जगाते।
वे हम पर ज़ुल्म करनें से जरा भी नहीं हिचकिचाते।
इन्सान हम से बेरुखी भरा व्यवहार है अपनाता।
हम पर तीर और पाषाण है बरसाता।।

कूड़ा कचरा स्वयं जगह जगह मानव ही है फैलाते।
बसों, सार्वजनिक स्थलों पर जगह जगह कूड़े कचरे का ढेर हैं लगाते।।

घरों में पानी की नालियों में भी दुर्गन्ध है फैलाते।
स्वच्छता के नाम पर मच्छर मक्खिय़ों का ढेर है लगवाते।।

हम पर ही आग बबूला हो कर हम पर पत्थर है बरसाते।
हमें बेच हमारा मांस खा कर हम पर ही जुल्म है ढाते।।

अपनें द्वारा फैलाई गंदगी से ही इंसान अस्वस्थ हैं हो रहे।
वे हमें ही कोरोना को फैलानें का कारण हैं समझ रहें।।

स्वार्थ के कारण इन्सान नें ही जंगलों का विनाश किया।
धरती के आंचल को क्षत-विक्षत कर उसे विध्वंस किया।
सागर में बहनें वाली जलधारा को अपनें कुकृत्यों से सुखा दिया।
वायु को जहरीले उत्पाद मिला कर प्रदूषित किया।।
पक्षियों की मधुर ध्वनि का कलरव जहां जहां सुनाई देता है

आज गाड़ियों,कारखानों के भीष्ण शोर की कलकलाहट का नाद दिखाई देता है।
बाढ़ और सुखे की चपेट से जगह जगह मानव है बौखलाया हुआ।
प्रकृति में संगीत की जगह शोरगुल है छाया हुआ।
प्रकृति के जीव-जंतुओं के विलोपन से असुंतलन का कोहराम सर्वत्र है छाया हुआ।।
जल,जमीन,वायु,आकाश प्रकृति, पर खतरे का बादल है मंडराया हुआ।

मानव कूड़ा कचरा नदी में फैंक कर
प्रदूषण है फैला रहे।
जलधारा में मल-मूत्र विसर्जित कर उसे प्रदूषण युक्त बना रहे।।

शेर बोला इन्सान हमें तो पकड़ कर चिड़िया घर में डालने का षड्यंत्र है रचाते।।
हमें बन्द पिंजरे में डालकर हमारा चैन-सुकून सब छीन लेंते।
उनके द्वारा जगह जगह फैलाई गन्दगी को साफ ही हैं करते।
मानव प्राणी पर उपकार ही है किया करते।।
हाथी, हिरण बोले हम तो मर कर भी मानव के काम ही हैं आते।।
हमें बेच कर फिर भी वे हमारा मांस खा कर अपनी तृषा है बुझाते।।
कौवा बोला हम इन्सानों द्वारा फैलाई गई गन्दगी को साफ ही हैं करते।
उन्हेंं ही खा कर अपना निर्वाह है करते।

इंसान कूड़े कचरे को प्लास्टिक के बंद डिब्बों और थैलियों में है डाल देते।
कौकरोच और चूहे, वन्य जीवों को मारनें
के लिए जहरीली दवाईयों का छिड़काव हैं करते।।
पक्षी जीवों को मार कर अपना ही नुकसान है किया करते।।
आलसपन और लापरवाही के कारण इन्सान ने अपना सर्वनाश किया।
स्वार्थ के कारण अपना धन्धा चौपट किया।।

वन्य जीवों नें ही तो अपने जीवन को मनुष्यों के साथ है जोड़ा।
इन्सानों ने न जानें क्यों हम पर प्रहार कर बेरुखी का आवरण है ओढ़ा।।

इन्सान हमें डरानें के लिए तरह तरह के मुखौटे अपनें खेतों में है लगाता।
हमारी जाति भाई बन्धुओं को मार कर अपनी खुशी है झलकाता।।

हम उन के खेतों को उपजाऊ हैं बनाते।
इनके खेतों को कुरेद कुरेद कर नमी वाला हैं बनाते।।

कठोर धरती को फसल योग्य हरा भरा हैं बनाते।
वे फिर भी हमारे भोजन का निवाला छिनने से जरा भी नहीं हिचकिचाते।।

वृक्षों को काटनें और जहरीली दवाईयों के छिड़काव से हम बेमौत मारे जाएंगें।
मुर्गीयों की तरह हम भी यूं ही मकान की छतों पर मृत पाए जाएंगें।।
पेड़ों को काटने और पौधों के नष्ट होने से
हम वन के जीव तो लुप्त हो जायेंगें।
मर कर भी मानव जाति के ही काम आएंगे।।

अपनें स्वार्थ के कारण इन्सान इंसानियत को भूल गया।
लालच में अन्धा हो कर वह हैवानियत से जूझ गया।

हमें मार कर तुम भी अच्छी फसल उत्पन्न नहीं कर पाओगे।
हमारी श्रंखला को तोड़ कर बहुत पछताओगे।

वनों के काटनें से प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाएगा।
धरती पर मनुष्य का रहा सहा अस्तित्व भी डगमगा जाएगा।।

हे मानव प्राणी अपनी करनी से तुम भी कब तक जी पाओगे
बिना हवा के,बिना भोजन तुम भी बे मौत मारे जाओगे।।
ऐ मानव अभी भी संभल जा।
आलस्य को त्याग कर कुछ नेकी का काम कर के दिखा।।

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