वापसी

किसी गांव में करतार और भरतार दो दोस्त थे। दोनों दोस्तों की दोस्ती इतनी प्रगाढ थी कि इकट्ठे खेलते शरारते करते और पेड़ों पर कूदते राहगीरों को तंग करना खूब मौज मस्ती में उनका समय व्यतीत हो रहा था। दोनों ही कृषक परिवार से संबंध रखते थे। दोनों का एक दूसरे के साथ इतना मधुर नाता था। वे अपने आपको हमेशा इतना खुशनसीब समझते थे कि अगर उन दोनों में से कहीं कोई इधर उधर चला जाता था तो वह हमेशा अपने आप को एक दूसरे के बिना अधूरा महसूस करते थे। वह सोचते थे कि एक दूसरे रे के बिना जीने की बात सोची भी नहीं जा सकती है। वह भगवान से यही प्रार्थना करते थे कि हम दोनों की दोस्ती जीवन भर ऐसी ही बनी रहे स्कूल में अगर एक दोस्त होमवर्क करके नहीं लाता था तो दूसरा भी होमवर्क नहीं करता था। मैडम दोनों को एक साथ सजा सुनाती थी। एक बार की बात है कि स्कूल में मैडम ने करतार को कहा कि तुम देर से स्कूल क्यों आए तभी उसका दोस्त भरतार बोला मेरा दोस्त कल पेड़ से नीचे गिर गया था उसके चोट आई थी इसलिए उसे आने में देर हो गई। भरतार बहुत डर गया था कि आज स्कूल में मैडम को क्या कहेगा तभी करतार ने उसे कहा इस पट्टी को अपनी टांग में बांध लो मैडम को क्या पता चलेगा तुम्हें सचमुच में ही चोट लगी है। एक दिन उसका गुनाह पकड़ा गया मैडम को पता चल चुका था कि दोनों दोस्त एक दूसरे को बचाने के लिए एक दूसरे का गुनाह अपने ऊपर ले लेते हैं। मैंडम भी उन दोनों की दोस्ती की कायल हो गई। मैडम ने उन्हें समझाया बेटा दोस्ती अपनी जगह काम है हमें इसके लिए झूठ नहीं बोलना चाहिए। भाग्य को कुछ और ही मंजूर था उनके गांव में इतनी भयंकर बाढ़ आई कि उनका सब कुछ पानी में बह गया। दोनों दोस्त स्कूल से वापस आ रहे थे उनके मां-बाप और मकान सब कुछ पानी की चपेट में आ चुका था। उनके घर में कोई भी नहीं बचा था। उसके मां-बाप और रिश्तेदार सभी पानी में बह गए थे। वे जान बचाने के लिए एक बड़े से पत्थर के नीचे सांस रोक कर बैठ गए थे वे दोनों किसी न किसी तरह बच गए थे परंतु सामान्य हालत में आने में उन्हें 5 महीने लग गए कुछ दिनों बाद स्थिति सामान्य हो चुकी थी बहुत सारे लोगों ने अपने मां बाप अपने बच्चों और अपने रिश्तेदारों को खो दिया था। कुछ लोग तो गांव छोड़कर चले गए थे। जो लोग बचे थे वह वही अपने गांव में आकर रहने लग गए। करतार का केवल एक खेत ही बचा था भरतार का भी इस दुनिया में कोई नहीं था। उसके पास तो कुछ भी नहीं बचा था करतार ने अपने दोस्त को कहा कि अब हम क्या करे। करतार ने कहा मेरे दोस्त मेरे साथ रहकर ही अपनी जिंदगी बसर करो। भरतार के सिवा उसके चाचा के और कोई भी नहीं था। उन्होंने उसे दूसरे गांव में बुला लिया था। वह अपने चाचा के पास रहने के लिए चला गया। इस प्रकार वे दोनों दोस्त ही बिछड़ गए। 15 साल हो चुके थे। करतार ने तो अपने गांव में ही रहकर खेती-बाड़ी करना शुरू कर दिया था। एक दिन की बात है कि उसके गांव में शहर से लड़कियों का ग्रुप आकर होटल की तलाश में आया करतार से ही पहले उनकी मुलाकात हुई बातों ही बातों में करतार ने उन लड़कियों को कहा कि तुम सब लड़कियां मेरे घर में आकर निसंकोच रह सकती हो। यहां पर तो होटल का मिलना असंभव है दूसरे गांव में होटल तो बहुत ही दूर है जो कमरा तुमने होटल में कमरा किराए पर लेना था जितना तुम दोनों चाहो इतने रुपए में तुम सब यहां रह सकती हो। उन लड़कियों को उनकी बात जंच गई। दिखने में करतार बहुत ही भोला भाला और इमानदार लगा। मालविका उसकी भोली सूरत पर फ़िदा हो गई। करतार नें अपने दो कमरे उन्हें किराए पर दे दिये

और उन सबको अपने हाथ का बढ़िया भोजन भी खिलाया। स्वाद स्वाद खाना खाकर सबने उसका शुक्रियादा किया। उन सब को बहुत ही खुशी हुई। उसने उन सब लड़कियों को गांव की सैर भी करवाई

10 दिनों तक वह लड़कियां उसके घर पर ही रही। जाते जाते वहां से मालविका ने अपना शहर का पता उसे दे दिया कि जब कभी शहर आना हो तो हमारे घर जरूर आना। भरतार भी उससे मिलकर खुश हो गया। उस बात को 6 महीने व्यतीत हो गए। मालविका के पिता ने मालविका के लिए बहुत सारे लड़के देखे मगर मालविका ने अंदाजा लगा लिया किए सारे के सारे उससे प्यार नहीं करते बल्कि उसकी धन दौलत से प्यार करते हैं। एक लड़का मालविका को पसंद भी आ गया था उसकी असलियत जानकर मालविका एकदम हैरान रह गई मालविका ने फैसला कर लिया कि वह शादी करेगी तो किसी ईमानदार इंसान से जो उसकी धन दौलत से नहीं बल्कि उसे सचमुच में ही सच्चा प्यार करता हो। उसके दिमाग में अचानक विचार आया क्यों ना उस गांव वाली नवयुवक से ही अपने रिश्ते की बात चलाई जाए। उस बेचारी का भी इस दुनिया में कोई नहीं था। उसने अपनी सारी कहानी मालिका को सुनाई कि कैसे उसके मां-बाप पानी की चपेट में बह गए उसका एक दोस्त था। वह भी गांव छोड़कर अपने चाचा के पास चला गया था। ना जाने वह कहां होगा उसका क्या हुआ पता नहीँ। यह सब बात उसने मालविका को बता दी थी। मालविका ने चिट्ठी लिखकर भरतार को अपने शहर बुलाया। उसने चिट्ठी में सब कुछ लिखा था। वह चिट्ठी पढ़ते ही शहर का पता पूछते पूछते मालविका के शहर में पहुंच गया। मालविका के पिता ने बताया कि बेटा मेरी बेटी तुम्हें बहुत ही प्यार करती है तुमसे शादी करना चाहती है। यह सुनकर करतार चौंका। वह। मल्लिका के पिता से बोला मेरे पास आपकी बेटी को देने के लिए कुछ नहीं है सिवाय प्यार के। मैं आपकी बेटी को बहुत प्यार से रखूंगा। हम गरीबों के पास बहुत ज्यादा धन दौलत नहीं है मेरे पास दो तीन खेत हैं और घर में तीन कमरे एक रसोई इसके अलावा मेरे पास कुछ नहीं है फिर भी आप मालविका का हाथ मेरे हाथ में लेना चाहते हैं मुझे कोई एतराज नहीं है। उसकी बेटी भी उसकी सच्चाई सुनकर हैरान हो गई। वह सोचने की कोई बात नहीं है गांव का सीधा साधा इंसान है परंतु इससे बढ़कर अच्छा जीवनसाथी उसे मिल ही नहीं सकता उसने मालविका के पिता को यह भी बता दिया कि वह अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सका केवल आठवीं तक ही पढ़ा है। माल्विका ने कहा कि पहले तो मैं तुम्हें पढ़ाएंगे फिर तुमसे शादी करके अपना घर बसाऊंगी। कुछ दिनों के पश्चात वह शहर आकर पढ़ाई करने लग गया। उसने 12वीं कक्षा पास कर ली। अच्छा सा मुहूर्त देखकर मालविका के माता पिता ने उसकी शादी करता करतार से कर दी। वह दोनों कुछ दिन गांव में रहते थे। कुछ दिन शहर में इस तरह उनकी शादी को 5 वर्ष व्यतीत हो गए। उनके घर में एक नन्हें से चिराग ने जन्म लिया उन्होंने उसका नाम अभि रखा। अभि तीन साल का हो चुका था। इसी बीच मालविका के मम्मी पापा चल बसे मालविका ने अपने पति करतार को कहा कि तुम गांव की जमीन बेच तो वह बोला नहीं हो सकता है कभी मेरा दोस्त उसे ढूंढते-ढूंढते आ जाए मैं उसे गांव की जमीन दे दूंगा। भरतार भी अपने चाचा के पास आकर रहने लग गया था। भरतार के चाचा ने उसे दसवीं तक बड़ी मुश्किल से पढ़ाया। वह खेती-बाड़ी में अपने चाचा का हाथ बंटानें लगा गया था उसकी शादी भी उसके चाचा ने करवा दी थी। उसके भी एक बेटा हो चुका था उसने अपने बेटे का नाम अभिजीत रखा एक दिन उसका बेटा अभिषेक अपने पापा के साथ दुकान पर गया। उसके पिता ग्राहकों से बातें करने में व्यस्त थे उसने सड़क से एक ट्रक जाते हुए देखा ट्रक रुका हुआ था। वह चुपचाप ट्रक पर चढ़ गया। वह अपनें ही ध्यान में मस्त हो कर कूदाकादी कर रहा था।। वह कूदते कूदते ट्रक के अंदर जा गिरा। ट्रक रुका हुआ था। वरना उसे चोट लगती ट्रक के ऊपर कोई भी नहीं था। वहां सामान पड़ा था। आगे एक ड्राइवर और कंडक्टर के इलावा कोई नहीं था। ट्रक चल पड़ा था काफी देर दूसरे किसी गांव में जाकर ट्रक रूका। ट्रक का ड्राइवर एक ढाबे ढाबे पर खाना खाने के लिए रुका। अभिषेक ने ट्रक के ऊपर से झांका। वह कहां आ गया।? उसकी आंखों में आंसू आ गए। उसने जोर से छलांग लगाई। उसे घुटने में चोट लग गई थी। उस ने दौड़ लगाई। वह जल्दी से घर पहुंचना चाहता था उसे अपने घर का रास्ता सूझा ही नहीं रहा था। व
केवल 4 वर्ष का था। चलते चलते उसे पास एक घर दिखाई दिया और वहां पर पहुंच कर जोर जोर से रोने लगा। उस को रोते देख कर एक आदमी अपने घर से बाहर निकला। उसने देखा एक छोटा सा बच्चा जोर जोर से रो रहा था। उसने बच्चे को पूछा तुम कहां से आए हो? उसे तो अपने घर का पता भी मालूम नहीं था वह बच्चा बेहद डर गया था वह डर के मारे बेहोश हो चुका था। उसके घुटने में भी चोट लग गई थी। सुखबीर ने उसे प्यार से जब उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा मेरा भी तुम्हारे जैसा ही बेटा है उसके साथ खेलो। सुखवीर ने उस बच्चे को अपने घर पर ही रख लिया वह इतना आदमी आदमी नहीं था कि वह उस बच्चे को उसके घर पहुंचा दे।

उसने सोचा चलो कोई बात नहीं आज से मेरे दो बेटे हैं। यह भगवान का भेजा हुआ दूत है इसे मैं अपने बेटे जैसा ही प्यार दूंगा। बच्चों में तो भगवान बसते हैं सुखवीर ने अपनी पत्नी को कहा कि आज छःमहीने हो चुके हैं इसको कोई ढूंढने नहीं आया। यह हमारे बेटे के साथ ही स्कूल में जाएगा। उन्होंने उसे भी अपने बेटे के साथ स्कूल में दाखिल करवा दिया और उस बच्चे का नाम रखा अभिषेक क्योंकि उसने अपना नाम अभि बताया था। स्कूल में दाखिल करवाते वक्त उसके पिता की जगह पर सुखबीर का नाम लिख दिया था। इस तरह से छः साल व्यतीत हो गए। सुखबीर और उसकी मां दोनों उस बच्चे को भी वैसा ही प्यार करते थे जैसे कि वह अपने बेटे को प्यार करते थे। वह भी उन्हें मां और बाबूजी कहने लगा। अभि भी नौ साल का हो चुका था। पेड़ों पर चढ़ना खेतों में दौड़ना शरारतें करना उन दोनों बच्चों को शरारते करते देख कर सुखबीर को अपने बचपन की याद आ जाती थी किस तरह वह और उसका दोस्त पेड़ पर चढ़ जाते थे और किस तरह मैडम को परेशान करते थेह यह सब बातें उसने अपने दोनों बच्चों को बता दी थी। दोनों पूछते अब आपका दोस्त कंहा है? तब वह कहता हम दोनों भी बिछड़ गए। हमारे गांव में इतनी भयंकर बाढ़ आई कि हमारा सब कुछ बाढ़ में नष्ट हो गया। हमारे मां बाप भाई बहन और ना जाने कितने रिश्तेदार बाढ़ की चपेट में आ गए। हम दोनों दोस्त स्कूल गए हुए थे। हम दोनों स्कूल से घर आ रहे थे इतनी जोर से तूफान आया कि हम तूफान से बचने के लिए एक बड़ी सी चट्टान के पास छुपने के लिए गए। वहीं पर एक बड़ी सी चट्टान के पीछे छुप गए थे। हम उस पत्थर के नीचे ना जाने एक दिन यूं ही बैठे रहे। दूसरे दिन जब वर्षा का पानी और तूफान थमा तो देखा वहां दूर-दूर तक एक भी व्यक्ति नहीं था हम घर कहां से पहुंचते? हम 5 दिन तक उस पत्थर के नीचे भूखे-प्यासे बैठ रहे। पांचवें दिन पुलिस वालों की मदद से बचे। पूलिस वालों को देखते ही हम दोनों जोर से चिल्लाए हमें बचाओ। हमें उन पुलिस वालों ने बचा लिया घर जाकर देखा हमारे घर सबकुछ बाढ़ में बह गए थे। हमारे घर का तो कुछ भी नहीं बचा था। मेरे दोस्त करतार के केवल दो खेत ही बचे थे। हम दोनों दोस्तों के इलावा हमारे परिवार में कोई नहीं बचा था। मेरे दोस्त ने मुझे कहा कि अब हमें में ही घर की सारी जिम्मेदारी संभालनी होगी। पढ़ाई तो छोड़नी ही पड़ेगी। हमें दिन रात मेहनत करके अपने लिए नया मकान बनाना होगा और खेती करके अपना जीवन बसर करना होगा। हम दोनों आठवीं तक ही पढे थे। हम दोनों खूब मेहनत करनेंं लगे मेरे चाचा जी भी दूसरे गांव में रहते थे उनके कोई संतान नहीं थी। उनका खत आया बेटा सुखबीर तू गांव चला आ। तू आज से हमारा ही बेटा है। तू यहां पर आकर अपने चाचा चाची का हाथ बंटा मैं अपने दोस्त करतार से विदा होकर अपने चाचा के पास गांव चला आया यहां पर आकर मेरे चाचा ने अपना सारा घर का बोझ मुझ पर डाल दिया। मैं अपने चाचा जी का खेती में हाथ बंटानें लगा। थोड़े दिन पहले ही मेरे चाचाजी चल बसे।

भरतार ने अपनी सारी कहानी अपने बच्चों को सुना दी। करतार और उसकी पत्नी ने अपने बेटे को बहुत खोजा मगर उन्हें अपना बेटा नहीं मिला। वह दोनों अपने बच्चे के वियोग में सूख कर कांटा हो गए थे। इस तरह रो रो कर उनका बेटा तो वापस उन्हें नहीं मिल सकता था मालविका ने अपने पति को कहा कि हम गांव जा कर क्या करेंगे? गांव की जमीन को बेच दो। वह बोला नहीं मैं इस जमीन को नहीं बेचेगा। उस गांव से मेरी पुरानी यादें जुड़ी है। शायद हो सके किसी दिन मेरा दोस्त वापस आ जाए मैं उसे ही गांव की जमीन सौंप दूंगा। वह गांव में ही रहेगा और हम उसके पास आकर रहा करेंगे। उसने गांव की जमीन पंचायत के प्रधान को दे दी। हम कुछ दिनों बाद वापस आकर इसकी देखभाल करेंगे।

मालविका हमेशा अपने बेटे के वियोग में उसे हर दम याद कर के पागल हो रही थी।

मरता ने अपनी पत्नी को कहा कि अब हमें अपने दोनों बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलानी है। हमारे पास इतने अधिक रुपए नहीं है इसलिए मैं शहर जाकर कुछ नौकरी वगैरह का जुगाड़ करता हूं। वह अपनी पत्नी से अलविदा लेकर शहर आ गया। फटे हुए कपड़ों से चला जा रहा था। वह एक बड़े से भव्य आलीशान घर को देख कर रुक गया वहां पर बाल्कनी के बाहर दो बच्चों की फोटो लगी हुई थी। दोनों बच्चे एक दूसरे के गले लगकर एक दूसरे को प्यार कर रहे थे। वह उस फोटो को काफी देर तक निहारता रहा। उसे अपना बचपन याद आ गया कि कैसे वह और उसका दोस्त इसी तरह गले लगकर एक दूसरे के साथ लड़ाई झगड़ा भूल कर दोस्ती करते थे उसे याद आ रहा अपनी पत्नी से अलविदा हो कर वह सबसे पहले अपने गांव आया। उसने अपने दोस्त को खोजा परंतु उसका दोस्त उसे कहीं नहीं मिला कुछ लोगों ने उसे बताया कि वह गांव छोड़कर शहर जा चुका है। वह अपने दोस्त को ढूंढता ढूंढता ही शहर पहुंचा था। भरतार ने सोचा शायद उसका दोस्त उसे फटे कपड़ों में देखकर पहचान ही नहीं पाएगा। शहर में आते आते उसके सारे रुपए समाप्त हो चुके थे। वह घर घर जाकर भीख मांग रहा था जिससे उसे कुछ रुपए मिल जाए। और जब कुछ रुपए इकट्ठे हो जाए तो कुछ काम कर सके।

उसने एक घर का दरवाजा खटखटाया वहां घर के अन्दर से एक आदमी बाहर निकला। करतार को महसूस हुआ जैसे कि वह उसका दोस्त है परंतु नहीं यह बहुत ही गरीब इन्सान है। यह मेरा दोस्त नहीं हो सकता। यह आदमी तो बहुत ही कमजोर है जैसे ही वापस जाने लगा उसके दोस्त नें कहा करतार। करतार ने पीछे मुड़कर देखा। मुझे किस ने आवाज दी तब तक वह भिखारी बाहर जा चुका था। कटोरा हाथ में पकड़े हुए था। करतार ने सोचा कहीं वह मेरा दोस्त तो नहीं था वह दरवाजे की ओर दौड़ा और बाहर आकर देखा वह भिखारी बैठा बैठा रो रहा था। उसके दोस्त नें भी उसे पहचाना नहीं था। मेरा भाग्य मुझे कंहा भीख मांगने ले आया। तुम्हारे कहीं लगी तो नहीं। तुम्हारे घुटने से भी खून बह रहा है। मेरे साथ आओ मैं पैरों में तुम्हारे पट्टी बांध देता हूं। जैसे ही उसने उस भिखारी को गौर से देखा उसने कस करके अपने दोस्त को गले लगाया बोला यह तुम्हारी क्या हालत हो गई है। तुम भीख मांग रहे थे। तुम मेरे पास क्यों नहीं आए? मैं तुम्हारा पक्का दोस्त हूं। चलो वह अपने दोस्त को पकड़कर अंदर ले आया। आओ। अपनी पत्नी को कहा देखो यह है मेरा दोस्त जिस की कहानी मैंनें तुम्हें सुनाई थी। उसने अपने दोस्त को पहनने के लिए कपड़े दिए और सात दिन तक उसकी खूब सेवा की। भरतार नें अपनी सारी कहानी अपने दोस्त को सुना दी। उसने कहा कि मैं तुम्हें ढूंढने गांव गया था मगर गांव वालों ने उसे कहा कि वह शादी कर के शहर में बस गया है। मैंने तुम्हें शहर में बहुत जगह ढूंढा मगर तुम नहीं मिले। सोचा चलो शहर में ही कोई नौकरी ढूंढता हूं। मेरे दो बच्चे हैं अभिषेक और अभिजित उसके दोस्त ने उसकाअभिजीत नाम रख दिया था।

करतार अपनें दोस्त को बोला मेरी कहानी भी दर्दनाक है। हमारे भी एक बेटा था। उसे भगवान ने हमसे छीन लिया। मेरी पत्नी उस के वियोग में सुख कर कांटा हो गई है। डॉक्टरों ने उसे कहा कि जब तक उसे कोई बच्चा नहीं मिलता तब तक वह पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो सकती। वह अपने बच्चे को ढूंढते-ढूंढते किसी भी बस के पीछे भागने लगती थी एक दिन इतनी बुरी तरह से गिरी कि वह बच तो मर गई मगर डॉक्टरों ने कहा कि वह अब कभी मां नहीं बन सकती। भरतार ने कहा कि मेरे भी एक ही बेटा था एक बेटा तो भगवान ने उसे दे दिया या यूं समझो भगवान ने मेरी झोली में डाल दिया। उस बच्चे के मां-बाप का कुछ पता नहीं है और ना ही उस बच्चे को कोई ढूंढने आया।

करतार ने कहा मेरे दोस्त अगर आज मैं तुमसे कुछ मांगू तो तुम मना तो नहीं करोगे। भरतार बोला मांगने तो मैं आया था नौकरी की तलाश करने। बच्चे बड़े हो रहे हैं मैंने सोचा कि इन दोनों बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए काफी रुपया-पैसा होने चाहिए इसलिए मैं यहां नौकरी की तलाश करने आया था। करतार बोला भाई मेरे तुम यही मेरे साथ काम करना तुम्हारे बच्चे के लिए पढ़ाई के लिए रुपये मैं खर्च करूंगा। उसने अपनी सारी कहानी अपनें दोस्त को सुनाई किस प्रकार उसने मालिका से शादी की। तुम्हारी भाभी पिकनिक पर गई हुई थी। अपनी सहेलियों के साथ गांव मे पिकनिक मनाने आई। मैंने उन्हें अपने घर पर कमरा रहने के लिए दिया जब तुम चले गए थे तो मैंने रात दिन मेहनत करके तीन कमरे बना लिए थे और खेती बाड़ी करके अपना जीवन बिता रहा था। उसी समय मालविका गांव में आई। उसे अपना घर किराए पर दे दिया। उन्हें खाना भी खिलाया। उन्हें गांव की सैर भी करवाई। वह मुझे अपना दिल दे बैठी और दो-तीन साल बाद उसने मुझसे शादी का प्रस्ताव रखा। उसने मुझे शहर बुलाया और उसके बाद मैंने अपनी बारहवीं की परीक्षा दी थी और फिर मालविका से शादी कर के शहर में रहने लग गया। शादी के कुछ दिनों बाद जीत नें हमारे घर में जन्म लिया वह तीन साल का था जब वह हमसे बिछड़ गया। वह मेरे साथ दुकान गया हुआ था मैं ग्राहकों के साथ बातें करने में व्यस्त था वह इतना चंचल था कि चारों तरफ कूदना पेड़ पर चढ़ना जैसे हम दोनों बचपन जैसे हम दोनों बचपन में हुआ करते थे वैसा ही शरारती था। पता नहीं उसके बाद वह कहां चला गया। उसे देखते-देखते आंखे भी पथरा गई हैं। आठ साल हो चुके हैं मगर हमारा बेटा आज तक हमें नहीं मिला उसकी कोई भी फोटो भी हमारे पास नहीं थी जो पुलिस वालों को दिखाते। भरतार ने कहा तुम्हारी दर्दनाक कहानी सुनकर मुझे बड़ा दुःख हुआ। भरतार ने कहा मेरे पास मेरा बेटा अभिजीत। वह मुझे मिला था। दोनों बच्चों को लेकर हम एक कुटिया में गए हुए थे। वहां पर एक साधु बाबा नें उसका हाथ देखकर हमें बताया कि उसके नसीब में उसके मां-बाप का सुख नहीं लिखा था। उसने हमें बताया कि अगर तुम उसको किसी को गोद दोगे तो उस व्यक्ति को देना जो बच्चे को भी बिना देखे तुम से ले जाने की मांग करे। बिना देखे उस बच्चे को स्वीकार करना अगर कोई भी उस बच्चे को स्वीकार करेगा तो ठीक है। मैंने सोचा कि इस बच्चे को मैं कहां से पढ़ाएंगे। मैं उस बच्चे को किसी भी ऐसे व्यक्ति को नहीं दूंगा जो उसके साथ नौकरों वाला बर्ताव करें। मेरे पास कुछ लोग बच्चे को मांगने आए थे। उन्होंने कहा था कि हम इस बच्चे को पढ़ाएंगे। हमारे कोई बच्चा नहीँ है। मुझे बाद में पता चला कि उन्हें बच्चा नहीं उन्हें काम करने के लिए नौकर चाहिए था। वह उस बच्चे के मुझे ₹500000 दे रहे थे। मैं तो उस बच्चे को अपना बच्चा स्वीकार कर चुका हूं। शायद वह किसी अमीर घर का बच्चा है। धीरे-धीरे वह हमारे गांव के जीवन में हमारे साथ अभ्यस्त हो गया। मुझे पता ही नहीं चला कि वह मेरा बच्चा नहीं है। मैं तो उन दोनों को राम और लक्ष्मण की जोड़ी मानता हूं। मैं किसी भी कीमत पर उस बच्चे को किसी को भी नहीं दूंगा। मैंने स्कूल में उसे दाखिल भी करवा दिया है।

करतार बोला भाई मेरे तुम उस बच्चे को मुझे दे देना। तुम्हारी भाभी शायद उस बच्चे को पाकर खुश हो जाए। हम उस बच्चे को बिना देखे स्वीकार करेंगे भरतार बोला मैं तुम्हें उस बच्चे को हंसते-हंसते दे दूंगा। भाभी तो मां के समान होती है। भाभी को खुशी मिलेगी मुझे मंजूर है। परंतु मुझे अपने बेटे को बड़े प्यार से तैयार करना होगा। क्योंकि वह हम दोनों को ही अपने मां-बाप समझता है।

करतार और उसकी पत्नी मालविका भरतार के साथ गांव चलने के लिए तैयार हो गए। करतार ने कहा पहले मैं घर जाकर अभिजीत को मनवाता हूं जब वह मान जाएगा तब तुम दोनों को भी गांव बुला लूंगा।

भरतार जब अपने घर पहुंचा तो खुश भी था और उदास भी। घर आकर अपनी पत्नी से बोला भाग्यवान आज मैं अपने दोस्त से मिलकर आया हूं। उसने अपनी पत्नी को अपने दोस्त की सारी कहानी सुनाई उसकी कहानी सुनकर भरतार की पत्नी की आंखों में आंसू आ गए। भरतार ने कहा कि हम अभिजीत को उन्हें नहीँ देंगे। उसे समझा कर ही उन्हें देंगे। उसके दोस्त की पत्नी अपने बच्चे की याद में सुख सुख कर कांटा हो चुकी है और डॉक्टरों ने उसे कहा है कि वह कभी भी मां नहीं बन सकती। हम अभिजीत को उसे दे देंगे। वह तो हमारे घर में ही रहेगा।

मेरे बचपन के दोस्त के पास वहां पर उसके पास उसे किसी भी वस्तु की कमी नहीं होगी। पढ़ लिखकर बड़ा आदमी बन जाएगा। भरतार की पत्नी भावुक हो कर बोली मैं अपने बच्चे को किसी को भी नहीं दूंगी। मेरा बेटा मुझसे मत छीनो क्या हुआ इसको मैंने जन्म नहीं दिया मैं इसकी किसी को भी नहीं दूंगी। किसी ना किसी तरह करतार ने अपनी पत्नी को समझाया कि वह हमारे पास ही रहेगा जब हमें उसकी याद आएगी तब हम उसे मिलने के लिए चले शहर चले जाया करेंगे। भरतार ने अपने बेटे को बुलाया अभिजीत को बुलाया मैं अपने दोस्त के पास तुम्हे शहर में भेजना चाहता हूं। तुम उनके पास खूब खुश रहोगे तुम्हें वहां किसी भी चीज की कमी नहीं होगी। तुम वहां खूब लिख पढ़ पाओगे। उनके कोई भी बेटा नहीं है। तुम्हें अपना बेटा बनाना चाहते हैं।

अभिजीत रोते-रोते बोला मैं अपने मां बाबा को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा मुझे नहीं पढ़ना है। मैं गांव में ही पढ़ लूंगा। बड़ी मुश्किल से भरतार ने उसे समझाया बेटा हमारे पास इतने रुपए नहीं है हम तुम्हें अच्छी शिक्षा नहीं दे सकते। तुम उनके घर में रहकर अपनी शिक्षा को पूरी ही नहीं करोगे बल्कि मां बाप का प्यार भी तुम्हें वहां पर मिलेगा हम तुमसे दूर थोड़ी ही रहेंगे हम भी तुमसे मिलने शहर आ जाया करेंगे। बेटे जब तुम हमें मिले थे तुम छोटे से नन्हे से बच्चे थे। हम तुम्हें किसी को भी देना नहीं चाहते थे।

अपने दोस्त की कहानी सुन कर हमारी आंखें भर आई। हम उन्हें इनकार नहीं कर सके। अभिजीत बोला ठीक है बाबा अगर वह मुझसे ठीक ढंग से पेश नहीं आए तो मैं वापस आप दोनों के पास लौट आऊंगा। भरतार बोला पहले तुम उन दो दोनों से मिलना तुम्हें उनके सामने अपना चेहरा ढक कर जाना होगा। एक साधु बाबा ने हमसे कहा था कि अगर तुमसे कोई उस बच्चे को मांगे तो तुम बिना देखे उन्हें बच्चे को सौंपना तभी तुम्हारा बच्चा सुखी होगा नहीं तो तुम बच्चे को स्वयं पालना। भरतार ने अपने दोस्त और अपनी भाभी को गांव बुला लिया था। दोनों गांव पहुंच चके थे बच्चों को उन दोनों के पास लाया गया। बच्चे के चेहरे को दुपट्टे से ढक दिया। बच्चा बोला अंकल आप मुझे लेने तो आए हो पर मैं अपने मां बाप को छोड़कर जाना नहीं चाहता। एक शर्त पर आप दोनों के साथ चलने के लिए तैयार हूं अगर आप दोनों जब कभी मेरा दिल अपने मां बाबा से मिलने को करे तो आप मुझे भेजेंगे उन दोनों ने कहा बेटा हमें तुम्हारी बातें मंजूर है। हम जब भी तुम्हें अपने मां-बाप की याद आए तब तुम गांव आ सकते हो या उन्हें शहर बुला सकते हो रीति रिवाज के साथ उन्होंने अभिजीत को पुत्र स्वीकार कर लिया। अपने मां बाबूजी के गले लगकर अभिजीत फूट-फूट कर रोने लगा भरतार ने कहा बेटा तुम्हारे बचपन की एक निशानी मेरे पास है यह एक चांदी का लॉकेट है जो तुम्हारे गले में था जैसे उन्होंने वह लोकट करतार के पास दिया यह देखकर चौंका क्योंकि वह लोकट तो उनके बेटे जीत का था

वायदे के मुताबिक वे दोनों उसे बिना देखे अपने घर लेकर आ गए। कानूनी तौर पर उन्होंने उसे गोद ले लिया जैसे ही उन्होंने उस उसके चेहरे पर से कपड़ा हटाया तो देख कर चौके उस बच्चे की शक्ल उनके बेटे जीतू से मिलती थी जो अभिजीत की मां ने उसे कहा बेटा अपनी कमीज ऊपर करो उसके पीठ पर एक बड़ा सा तिल देखकर के हैरान हो गई।

वह तो उनका खोया हुआ बेटा था। उन्हें अपना खोया हुआ बेटा वापस मिल गया था अपने बेटे को वापिस पाकर भी दोनों खुश हो गए उन्होंने अपने बच्चे के गले लग कर बोले तुम ही हमारे खोए हुए बैठे हो उसनें भरतार को अपने गांव की सारी जमीन दे दी। वह गांव में आकर रहने लग गया उसका बेटा अभिषेक भी गांव में रहकर पढ़ाई कर रहा था। अभिजीत के माता-पिता भी अपने बच्चे की शादी करके गांव में आकर बस चुके थे दोनों दोस्त गांव में इकट्ठे हो गए थे।

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