सच्चा सुख

किसी नगर में एक राजा राज करता था ।वह अपने आप को बहुत ही अमीर समझता था ।वह समझता था कि मुझसे अमीर दुनिया में कोई नहीं है ।।मैं इस नगर का सुखी इंसान हूं ।मेरे पास धन दौलत ठाठ-बाठ सभी कुछ मेरे पास है। मैं अपने हाथों से भी बहुत दान करता हूं मैं जरुरतमंदों की सहायता भी करत हू।मुझसे ज्यादा दानी नगर में कोई नहीं होगा। एक दिन उसने अपने महल में घोषणा कर दी कि जो कोई मुझे गलत साबित कर देगा कि मुझ जैसा सच्चा सुख किसे प्राप्त है ?मेरे सिवा शायद ही कोई ऐसा हो जिस के पास इतनी धन दौलत है ।महल में सारे लोग उपस्थित हुए राजा ने अपनी बेटी को भी महल में बुला लिया था। वह भी देख रही थी कि मेरे पिता की बातों को कौन सा ऐसा व्यक्ति है जो मेरे मेरे पिता को गलत साबित कर सकता है ।वह सोचने लगी कि अगर आज किसी व्यक्ति ने मेरे पिता को गलत साबित कर दिया तो      अगर वह जवान  व्यक्ति हुआ तो मैं उस व्यक्ति के साथ में सारे जीवन भर के लिए बंध जाऊंगी ।

एक माली का काम करनेवाला माली भी वहां आकर बैठ गया ।।वह एक आंख से काना था सभी दूर दूर से लोग आए हुए थे। परंतु राजा के सामने सब की बोलती बंद हो गई ।शाम होने को आई थी अभी थोड़ा सा समय  शेष था ।कोई व्यक्ति  भी राजा को गलत साबित नहीं कर सकता था कि  ।कोई भी  इतना  धनवान नहीं है जितना कि इस नगर का राजा वीरसेन उसके सामने तो सभी लोग अपने आपको तुच्छ  महसूस करते थे ।उसी महल में काम करने वाले माली ने राजा को कहा राजा जी छोटा मुंह बड़ी बात ।राजा जी मैं आपकी बात को काटता हू। आप कहते हैं कि मुझसे ज्यादा सुखी इंसान इस नगर में कोई नहीं है और मगर आपकी सोच गलत है आप इस नगर में सुखी इंसान ही है। इस संसार में कोई एक ही सुखी इंसान होगा कोई एक बिरला इंसान ही होगा। यह तो आज आपको स्वयं ही खोजना होगा यह तुम कैसे कह सकते हो ।माली बोला में यह एक सच्चे अनुभव से कह रहा हूं ।वहां से साधुओं का झुंड भिक्षा मांगने आ गया था। राजा ने उन साधुओं को बिठाया उन्हें भिक्षा दी उनको आदर से विदा किया ।जाते-जाते उन्होंने वही सवाल उस साधु महोदय से  कहा। साधु बाबा जी आप मुझे बताओ कि इस संसार में सच्चा सुख किस इंसान के पास है। साधु बोले यह सवाल तो तुमने बड़ा अच्छा किया है। इस संसार में जिस इंसान ने सच्चा सुख प्राप्त कर लिया उसके पास किसी धन दौलत की जरूरत नहीं होती। वह इंसान संसार का सबसे धनी इंसान होता है। राजा बोले वह धनी इंसान कौन है? तुम सच्चे सुखी इंसान हो राजा ने कहा  । यह साधु महात्मा उस से कहेंगे कि तुम सच्चे सुखी  इन्सान हो। बाबा बोले यह तो तुम्हें ही पता करना पड़ेगा आज से ठीक  एक महीने बाद तुम्हें इस प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा ।तुम स्वयं इस प्रश्न को खोजो। गांव-गांव में और इस नगर के सारे हिस्सों में घूम घूम कर स्वयं पता करो। इसके लिए तुम्हें स्वयं ही मेहनत करनी पड़ेगी ।

राजा हर रोज अपने नगर में घूम घूम कर सारे ढूंढता था मगर कोई भी ऐसा व्यक्ति नजर नहीं आता था। कई लोगों के पास इतनी धन दौलत होते हुए भी कोई खुश नहीं था किसी ना किसी को कोई ना कोई दुख था कोई कह रहा था मेरे पास दौलत नहीं है कोई कह रहा था मेरे पास भी नहीं है ।हर एक व्यक्ति को यही कहते सुना कि हम गरीब हैं ।काश हमारे पास घर होता ,काश मेरे पास गाड़ी होती, अंदर से कही ना कहीं हम गरीब है । खुश होने का तो कोई नाम ही नहीं था। वह सोचने लगा मेरे पास भी इतनी धन दौलत है परंतु अंदर से तो मैं भी मायूस हूं।इस धन दौलत को कंही  कोई चुरा कर ना ले जाए।  माली ने यह बात तो कहीं ना कहीं ठीक ही कही है ।उसने माली को साथ लिया और एक छोटी सी झोपड़ी के पास जाकर रुक गए ।जब जहां पर जाकर राजा ने दरवाजा खटखटाया ।वहां पर एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी आपस में कुछ कह रहे थे ।ब्राह्मण ने ने दरवाजा खोला उनको कहा बैठ जाओ टूटी हुई चारपाई पर बैठने के लिए कहा। दोनों उस चारपाई पर बैठ गए ।ब्राह्मण ने मुंह पर उंगली रखने के लिए कहा। ठहरो !अभी हम बहुत ही जरुरी काम कर रहे हैं ।उसके बाद हम तुम्हारी बात सुनेंगे।राजा ने कहा तुम नहीं जानते मैं कौन हूं? पहले मेरी बात सुनो वह ब्राह्मण बोला होंगे आप राजा परंतु पहले हमें अपना काम करने दीजिए फिर मैं आपकी बात सुनूंगा राजा ने माली को चुपके से कहा यह ब्राह्मण तो अपने आप को बड़ा आदमी समझ रहा है ।इसको पता नहीं है किससे बात कर रहा है मै अगर ं चाहूं तो उसको सजा दे सकता हूं ।माली ने राजा से कहा चुप करो मुंह पर उंगली रखने को कहा राजा चुप हो गया राजा ने देखा ब्राह्मण और ब्राह्मणी ने एक चारपाई वहां पर रखी ।उन्होंने देखा वे दोनों एक एक बूढ़े आदमी को पकड़ कर लाए और अपने सहारे से बिस्तर पर बिठाया ।  वे दोनों  एक बुढ़िया को पकड़कर लाए ।उसे भी बिस्तर पर बिठाया । व्राहम्णी  अंदर से पानी लेकर आई ।उसने तसले में पानी डाला अपने सास-ससुर के पैर छुए। उनके पैर तोलिए से पहुंचे फिर उनके चरण स्पर्श करके उन से आशीर्वाद लिया। बूढ़े और बुढ़िया ने अपना हाथ हिलाया मानो वे दोनों उन दोनों को आशीर्वाद दे रहे थे । उन दोनों के बच्चे आकर बोले हम भी दादा दादी जी की सेवा करेंगे ।लड़का बोला पहले मैं सेवा करुंगा ।लड़की बोली नहीं पहले मैं करूंगी । ब्राह्मण और ब्राह्मण बोले तुम दोनों भी सेवा करना चलो, टोनी तुम अपने दादाजी को पंखा झलो ।और मुन्नी तू प्लेट में गर्म-गर्म ।रोटी रखी है उसको लाकर  अपनें  दादा दादी को दे दे तभी ब्राह्मणी ने कहा आज घर में सब्जी भी नहीं थी केवल रोटी में नमक लगाया है। ब्राह्मण बोला कोई बात नहीं रोटी तो है ना, यह भी बहुत  बड़ी बात है। मुन्नी रोटी लेकर आ गई । उसने एक टुकड़ा अपने हाथों से दादा  और दादी दोनों को खिलाने लगी ।ब्राह्मणी बोली मैं आज बहुत ख़ुश हूं मेरे दोनों बच्चे भी अपने दादाजी की इसी तरह से सेवा कर रहे हैं। आज तो खाने को एक ही रोटी है। कोई बात नहीं तुम खुश हो जाओ आज तो हमारे पास एक रोटी तो है हम सब इसी में खुश है ।मेहनत से और अपने बूढ़े माता पिता के आशीर्वाद से हमारे पास सब कुछ प्राप्त है ।बस यह सुखी रहे इन से बढ़कर सबसे सच्चा सुख हमें कहीं नहीं मिल सकता। इनका आशीर्वाद पाकर हम अपने आप को बहुत ही खुशनसीब समझते हैं ।यह दृश्य देखकर राजा की आंखों में आंसू छलक आए उसको आज  समझ में आ गया था कि वह आज तक अपने आप आप से अनजान था ।वह अपने आप को बड़ा ही धन दौलत वाला इंसान समझता था ।आज मैं अपने आप को बहुत ही तुच्छ इंसान समझता हूं ।मैं महल मैं ठाठ-बाट सेरहता हूं मैंने कभी अपने बूढ़े माता पिता से कभी यह नहीं पूछा ,कि तुमने खाना खाया कि नहीं ?कभी उनके चरण स्पर्श नहीं किए ?आज इन दोनों का ऐसा प्यार इतना सच्चा इंसान मैंने कभी जिंदगी में नहीं देखा। इनके पास केवल एक झोपड़ी है खाने के लिए भी एक चपाती वह भी नमक के साथ ,और भी फिर भी कितने प्यार से अपने बड़े बूढ़े मां बाप की सेवा में लगे थे ?आज मैंने महसूस किया कि मनुष्य की सच्ची धन-दौलत तो उनके माता-पिता और उनके बुजुर्ग है हमें हमें अपने बुजुर्गों का सम्मान करना नहीं भूलना  चाहिए ।उन बच्चों को जब राजा ने अपने पास बुलाया तो बेटी बोली मेरे दादा दादी मुझे जान से ज्यादा प्यारे हैं ।जब मेरे पास बहुत सारे रुपए होंगे तब मैं अपने दादाजी को दांतो का सेट लेकर आऊंगी ।उनको खाना खाने में बड़ी मुश्किल होती है।तभी लड़का बोला मैं तो अपने दादा जी के लिए एक लाठी ले कर आउंगा ।जिस से रात को लाठी ले कर चले तो वह गिरे नंही। जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तब उन की लाठी मै बनूंगा। यह सुन कर राजा अपना सा मुंह ले कर वंहा से चला गया।राजा उनके सामने अपने आप को बहुत ही तुच्छ महसुस कर रहा था।वह तो कभी भी उनकी सेवा नंही कर सका।घर आ कर राजा ने खुद अपने बूढ़े माता पिता के पास जा कर उनके चरण स्पर्श किए और नौकरों को कहा आज से मेरे माता पिता की सेवा तुम नंही करोगे।मेरी जिन्दगी की जो चंद सांसे बची हैं मैं अपने बूढ़े माता पिता की सेवा करूंगा।आज.इनकी सेवा कर मुझे जो सुखद अनुभूति हुई है वह जीवन में मुझे कभी भी नहीं हुई ।आज मानो दुनिया की सबसे सच्ची दौलत हासिल कर ली है ।उसने माली को बुलाया तुमने मुझे सच ही कहा था उसने अपनी बेटी को बताया कि वह माली सच ही कहता था तुम भी अपने दादा दादी की सेवा करो वह बोली मैं तो अपने दादा दादी के पास हर रोज आती हूं ।मैं तो उनकी उनका ध्यान रखती हूं। वह बोला पिता जी अाज मैं आपसे कुछ मांगना चाहती हूं आप माली को ईनाम तो देना चाहते हो परंतु आज मैं यह कहना चाहती हूं कि मैं इस माली को अपना जीवन साथी के रूप में स्वीकार करना चाहती हूं ।जिसने आप को नई दिशा प्रदान की है ।मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि  वह एक आंख से काना है मुझे उससे बेहद प्यार है। मैं तो वह जैसा है उसी तरह अपनाना चाहती हूं ।तब माली बोला आप मुझे ईनाम तो दे दो परंतु मैं आपकी बेटी से शादी नहीं कर सकता ।भला मैं तुम्हारी क्या सेवा कर सकता हूं । मैं  तो काना हूं। मेरी एक आंख नहीं है तुम अगर मुझे एक आंख से स्वीकार करोगी तब तो ठीक है ।मैं इस दूसरी आंख को लगवाना नहीं चाहता क्योंकि मुझे यह किसी की याद दिलाता है ।मैं बहुत ही अमीर आदमी था ।मैं अपने माता पिता के साथ रहता था ।मेरे माता-पिता ने मुझे सब कुछ दिया था धन-दौलत मैंने गलत संगत में पड़ कर उसकी धन-दौलत को एक ही झटके में उड़ा दिया। उनकी कभी सेवा नहीं की ।और उनकी धन दौलत को लुटा दिया ।और मै बिल्कुल बेघर हो गया परंतु जब वे  मुझे छोड़ कर चले गए और जब मेरे पास कुछ नहीं बचा , एक दुर्घटना में मेरी आंखें भी चली गई। तब कंही जा कर  मुझे अक्ल आई पर  तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मैंने सोचा अब मैं हमेशा ईमानदारी की जिंदगी बिताऊंगा। मेरे मां बाप मुझे सीख देकर गए थे उनकी याद अभी भी मेरे दिल में है जब भी मैं किसी वृद्ध व्यक्ति को देखता हूं तो मेरी आंखें नम हो जाती है ।पश्चाताप की आग में मेरा खून खौल उठता है। उस दिन जब आपने मुझसे पूछा तो मेरे मन में जो कुछ था मैंने आपको कह डाला परंतु अब मैं ईमानदारी  का जीवन व्यतीत कर रहा हूं। तुम जैसी भी हो मैं तुम्हें अपना जीवनसाथी चाहती  मानती हूं ।मैंने अपने चुनाव में कोई गलती नहीं की उसने मालिक के साथ शादी कर ली राजा ने भी अपना राजपाट त्याग कर अपना सारा जीवन अपने बूढ़े मां बाप की सेवा में लगा दिया।

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