कछुआ,खरगोश और बन्दरों का झूंड

एक कछुआ घने जंगल में था आया ।
शीतल छांव देख कर मन ही मन मुस्कुराया।।
कुछ खरगोशों ने भी वहां सुस्तानें के लिए लगा रखा था डेरा।
उन्होंने सामने आ कर उसे था घेरा।।


खरगोश अपनें साथियों को बोले
भागों रे भागो ,यहां से भागो।
जागो रे जागो,जागो रे जागो।।


मोटी और भददी खाल वाला आया है यहां एक साथी।
इसकी बदसुरत और मोटी त्वचा हमें जरा भी नहीं है भाती।।
हमें नहीं है इसे साथी बनाना,
इसके साथ सख्ती से है पेश आना।।
आओ मिल कर इसे डराएं,
जल्दी से इसे यहां से दूर भगाएं।।


हमारे विश्राम स्थल को इसनें है घेरा ।
आओ इसके मार्ग को अवरूद्ध कर लगाएं डेरा।।
कछुए कि ओर देख कर खरगोश बोले
हम तो हैं सुन्दर मुलायम खाल वाले।
तुम तो हो बदसूरत सी खाल वाले।।
तुम्हारा रुप तो लगता है मोटी चट्टान वाला।
दिल भी होगा तुम्हारा काला काला
हम हैं कितने सुन्दर, कितने प्यारे।
तुम तो हो कुरुप ,कुरुप और काले।
हमारे बाल भी चमकीले और न्यारे।।


कछुआ उन कि बातों को सुन हैरान हुआ।।
उन कि मुर्खतापूर्ण व्यवहार से जरा भी परेशान नहीं हुआ।।
अचानक कुछ बन्दरों का झुंड भी था वहां आया।
मीठे मीठे फलों का ख्याल मन को भाया।।
मोटी शाखा पर बैठ उन्होंने उधम मचाया।
टहनीयों को हिला हिला कर था जोर लगाया।।
फलों को खा खा कर था नीचे गिराया।
उन सब को फल खाता देख कर खरगोशों के मुंह में पानी भर आया।
उन सब का जी भी फल खानें के लिए ललचाया।।
बन्दर तो पेड़ों को हिला हिला कर मस्ती से थे झूम रहे।
नीचे हाय,उफ्फ, कर कर खरगोश थे धूम धड़ाम से गिर रहे।।
पेड़ों से फल गिर कर खरगोशों पर थे पड़े।
हाय! तौबा कर खरगोश थे चीख पुकार कर रहे।।

कछुआ उनकी तरफ देख मुस्कुराया।
वह तो फलों का प्रहार भी खुशी खुशी सहन कर पाया।।
कछुआ खरगोशों कि तरफ देख बोला ।
हाय !हाय!,उफ्फ! ये कौन बोला।
बेचैन और बौखलाहट भरे स्वर से ये कौन डोला?
कछुआ बोला अब बताओ किस कि खाल है प्यारी?
मेरी या तुम्हारी।।
तुम सब नें तो डाक्टर के पास जानें कि कर ली है तैयारी।
जल्दी से नौ दो ग्यारह हो जाओ नहीं तो मौत कि कर लो तैयारी।।

खरगोश बोले हमें तो भाई अपनी जान है प्यारी।
तुम्हारी खाल तो है सबसे सुन्दर , अद्भुतऔर न्यारी।।
अपनी अपनी जगह सभी है खुबसुरत।
न कोई छोटा बड़ा और बदसुरत।।
आओ हमें तुम्हारी दोस्ती है स्वीकार।
हम तुम से आज के बाद कभी नहीं करेंगें तकरार।।

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