मेराघर

मेरा घर जगमग करता।
सुंदर आकर्षक और साफसुथरा दिखता।
मेरे मन के हर दर्पण को मोहित करता।।
घर में दस कमरे हैं और एक है हॉल।
जिस में हमेशा पढ़ाई करने का सदा रहता है माहौल।।
खुली खुली खिड़कियां और एक है बाल्कनी।
सुबह सुबह बाहर की ताजी हवा है आती और मेरे मन की मुस्कान को दुगुना है करती।।
छोटी सी बगिया है बड़ी निराली।
जहां पर पौधों की करती हूं रखवाली।।
एक खुशी भरा वातावरण सदा है छाया रहता। घर के हर प्राणी का चेहरा सदा खिला खिला है रहता।।
पापा भी हैं बड़े ही प्यारे।
हम उनके हैं राज दुलारे।।
मम्मी भी है भोली भाली।
अंदर से नर्म और बाहर से सख्त दिखने वाली।।
भैया मेरा हरदम करता शैतानी।
छोटी बहन उसके कान पकड़कर सदा करती अपनी मनमानी।।
दादी भी है मोटे मोटे चश्मे वाली।
हरदम भक्ति के रस में डूबे रहने वाली।।
दादू भी है बड़े गंभीर।
दिल करता है खैंच डालूं उनकी तस्वीर।।
चाचा जी हैं ऑफिस जाते।
हर रोज हमें मिठाई लेकर आते।।
चाची जी हैं तेजतर्रार।
चाचा जी से करती है बात बात पर तकरार।।
नानाजी से हर कोई प्यार करता।
लेकिन उनकी डांट डपट से सदा है डरता।। नानी हमें सदा घेरे रहती।
हमसे सदा प्रश्नों की बौछार है करती।।
हमारा है एक संयुक्त परिवार।
जिस में आपस में मिलजुल कर हर प्राणी करता है प्यार।।
सुःख दुःख में सभी मिलकर हैं रहते।
एक दूसरे की तन मन धन से हैं सेवा करते।।
मेरी अभिलाषा है मेरा घर यूं ही जगमग करता रहे।
हर रोज हर प्राणी के जीवन में खुशियां भरता रहे।।
बुआ भी है घर में आई।
वह अकेली ही हैं आई।।
घर में बन्टू और उसके पापा के सिवाय घर में नहीं है कोई।

उनके घर में हाथ बंटाने वाला नहीं है कोई।
उनका है एकल परिवार।।

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