सच्ची राह कविता

वृद्धों का ना तुम करो अपमान।

भविष्य की संचित निधि समझकर सदा करो उनका सम्मान।।

इन कीमती निधि को यूं ना तुम ठूकराना।  अपने संस्कारों  से तुम यूं ना पीछे हट जाना।।

उनके साथ रह कर ही आती है घर में खुशहाली।

हीरे मोती से बढ कर है घर में उनकी शोभा निराली।।

अपने मां बाप के लिए वक्त निकालना है कर्तव्य तुम्हारा।

जिन्होनें स्नेह और  अच्छे संस्कार दे कर तुम्हारा भाग्य संवारा।।

उन्हें बहिष्कृत करनें का ख्याल कभी अपनें मन में न लाना।

यूं उन्हें रुसवा कर अपनी लज्जा को न बेच खाना।

उनके स्नेह आशीर्वाद प्यार और करुणा का अनुभव करना।

उनके मार्गदर्शन से अपनी जीवन की बिगड़ी नैया को पार लगाना।

उनकी कभी भी उपेक्षा मत करना।

परिवार समाज और संस्कृति का अपमान मत करना।।

शांत और सुखी जीवन व्यतीत करने के लिए स्वार्थ और भेदभाव का त्याग  करना।

उनकी खुशी को ही अपनी खुशी बना कर दिखाना।।

आत्मीयता सहनशीलता और सहानुभूति जैसे गुण को अपने अंदर जगा डालना।

उनके अनुभवों को ग्रहण कर एक मिसाल बन कर दिखाना।

उन  के सुःख दुःख को बांटकर  उन को खुशी देना सीखो।

एक सच्चा सपूत बन कर एक आदर्श नवयुवक बनना सीखो।

संयम  धैर्य  विवेक और  समझदारी से  हर काम करना सीखो।

अपनें माता पिता का आशीर्वाद ले कर अपने मकसद में सफल होना सीखो।  

मां बाप की सेवा  कर अपना जीवन धन्य बनाना।  

मां बाप के उपकार को  न तुम कभी भूल पाना।।

पाप और पुण्य का हिसाब यहीं मिल जाएगा। इस संसार से ऐ प्राणी तू हाथ कुछ ने कर जाएगा।

तेरा मेरा का चक्कर छोड़ कर खुश हो कर जीना सीखो।

अंहकार को छोड़कर सच्ची राह अपनाना सीखो।।

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