जैसे को तैसा

भाई और बहना का एक दिन हुआ मनमुटाव।
दोनों का आपस में था बहुत ही जुड़ाव।।

बहना ने सोचा, भाई मुझे मनाने आएगा।
कब तक वह मुझसे पीछा छुड़ाएगा?

भाई ने रसोई से बर्फी और मिठाई का डिब्बा उठाया।
खूब चटकारे लगा-लगा के मिठाई का किया सफाया।।

बहना दौड़ी-दौड़ी आई और भाई पर चिल्लाई।

बर्फी और मिठाई जो माँ ने थी बनाई,
सब तुमने क्यों अकेले ही खाई?
क्या खाते समय तुझे मेरी याद नहीं आई?
क्यों रे भाई, तूने मुझसे ये बात छुपाई?

अब भाई भी न था कुछ कम,
बोला, तूने मेरी नाक में कर रखा था दम।
तू भी तीन-पाँच करने में किसी से नहीं कम।
तुमने भी तो मुझसे की बेवफाई।
तूने भी तो कल रात खीर की कटोरी
मुझसे छिपाकर भरपेट खाई।
खाते समय क्या मेरी याद नहीं आई?
तूने भी तो अपने भैया से की रुसवाई।।

शायद अब तुझे समझ में यह बात अच्छी तरह आई।
किसी ने ठीक ही कहा है—जैसे को तैसा।
मिल-बाँटकर खाने में ही सबकी भलाई।
लड़ते रहने से भी तो किसी की नहीं होगी भलाई।।

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