आज्ञाकारी बालक श्रवण

त्रेता युग में एक वीर बालक ने था जन्म लिया ।

माता पिता ने श्रवण कुमार नाम रखकर उसका लालन पालन किया।

वह बालक अपने माता पिता पर  स्नेह सुधा बरसाता था।।

श्रद्धा भाव अर्पित कर उन पर जान न्योछावर करता था। ‌

श्रवण कुमार ने अपने माता पिता की सेवा को अपना परम सुख जाना। 

पुण्य  रुपी कर्म का सुनहरा अवसर पा कर अपना फ़र्ज़ निभानें का सौभाग्य माना।

अपने माता पिता को तीर्थ करवानें का मन में विचार जगाया।   

उसमें दो टोकरीयों  रखवा कर,उन्हें कांधे पे बिठा तीर्थस्थल का दर्शन करवाया।। 

डंन्डे के सहारे से एक में माता दूसरे में पिता को बिठा कर जगह जगह घुमाया।

सभी  तीर्थ स्थानों पर ले जाकर उनका मनोरथ पूरा कर दिखाया।।

अपनी कर्तव्यनिष्ठा निभाकर अपना अद्भुत परिचय  करवाया।

एक साहसी और  वीर बालक की अद्भुत मिसाल  दे कर सभी को अवगत करवाया।। 

एक दिन वे अपनें माता-पिता सहित भ्रमण करते करते अयोध्या नगरी सरयू नदी के पास आए।

वहां की शीतलता देखकर आराम करने का विचार मन में लाए।।

श्रवण के माता-पिता को प्यास ने सताया ।

उन्होंने अपने बेटे श्रवण से पानी मंगवाया।।

श्रवण पानी लेने एक समीप के सरोवर पर था गया।

पानी में बर्तन डालनें के लिए था थोड़ा  सा झुक गया।।

अयोध्या का राजा दशरथ जानवरों का शिकार करने था जंगल में आया।

सर सर की आवाज नें राजा को चौंकाया ।।

राजा नें कोई जानवर समझकर शब्दभेदी बाण उस पर चला डाला।

तीर  नें श्रवण के सीने को छेद  कर उसे  लहूलुहान कर डाला।।

हाय मां बाबा! कह कर जोर से श्रवण नें आवाज लगाई।। शोर सुन कर राजा नें उस दिशा में दौड़ लगाई।।

उसे तड़फता देख कर राजा की आंखें भर आईं।

हाय!होनी नें यह कैसी लीला रचाई।।

राजा ने पास जाकर श्रवण से क्षमा की गुहार लगाई ।

हाय! यह घिनौना कार्य करनें की भनक क्यों मुझे नहीं थी दी सुनाई?।

मुझे तो बस पक्षियों की आवाज ही थी दी सुनाई ।।

बिना सोचे समझे मैनैं ये क्या कुकृत्य कर डाला? 

तुम जैसे आज्ञाकारी बालक को बेमौत ही मार डाला।।

श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता का परिचय राजा से करवाया ।

उनसे विनती मांग अपने माता पिता की सहायता करने के लिए मनवाया।।

श्रवण कुमार तड़फ कर राजा से बोला, अपने अंधे माता पिता का था इकलौता सहारा !

मेरे बिना उनका कैसे चलेगा गुजारा?।

अपने माता-पिता की प्यास बूझानें हेतू पानी लेने  था यहां आया ।

होनी नें यह कैसा अजब गजब खेल ढाया।।

पानी ले जाकर देने के लिए राजा ने जैसे ही हाथ आगे बढ़ाया ।

बुढ़े माता पिता ने स्पर्श न पहचान कर अपना हाथ पिछे हटाया।।

श्रवण के माता पिता अपनें बेटे  के शब्द सुननें को थे आतुर।

वे अपनें बेटे को इतनी देर तक आता न देख प्यास से थे व्याकुल।।

माता पिता ने कहा बेटा तुमने इतनी देर कहां लगाई ?

राजा ने चुप रहने में ही समझी भलाई।

हमारे बेटे ने पानी लाने में इतनी देर कहां लगाई ?

राजा ने शोक भरे शब्दों में सारी कहानी सुनाई।

उनके बेटे की मौत की खबर थी जा कर  सुनाई।।

वे जोर-जोर से विलाप कर राजा पर चिल्लाए। 

अपने दुःखी मुखड़े से थे वे कहराए।।

श्रवण कुमार के माता-पिता ने उसे श्राप दे डाला।

हाय! अभिमानी राजा तूने हमारा घर संसार सब कुछ नष्ट कर डाला।। 

वे बोले हम पानी को हाथ तक नहीं लगाएंगे ।

अपने बेटे के पास ही  प्यासे ही तड़फ तड़फ कर मर जाएंगे।।

तूने  हमें बेटे के लिए तड़फाया।

बेटे के विरह में सैंकडों आसूं रुलाया।।

हमारे श्रापसे तुम भी न बच पाओगे।

हमारे जैसे ही अपने बेटे के वियोग को सहन न कर पाओगे।।

तू भी एक दिन बेटे के वियोग में मारा जाएगा।

यूं ही तड़फ तड़फ कर प्यासे ही मर जाएगा।।

होनी सच ही साबित हुई। 

राजा दशरथ की मृत्यु भी पुत्र वियोग में हुई।।

श्रवण नें आज्ञाकारी बालक का कर्त्तव्य निभाया।

अपनी!शहादत दे कर अपना जीवन कृतार्थ कर दिखलाया।।

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