आशा की किरण

यह कहानी हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से गांव की है ।एक बार मुझे शिक्षा के किसी कार्यक्रम के लिए बाहर जाने का मौका मिला। वहां जाकर मुझे इन इलाकों को देखने के बाद मेरी लेखनी ने मुझे यह लिखने के लिए मजबूर कर दिया ।मैं धीरे धीरे चलती जा रही थी। मैं इन कस्बों से अवगत नहीं थी। मुझे शिक्षा से संबंधित सेमिनार के लिए जो स्थान मुझे चयनित किया गया था वहां मुझे 1:00 बजे पहुंचना था ।मैं अपने साथियों को मिलने का इंतजार कर रही थी ,जहां पर हम खड़े थे वहां से 2 किलोमीटर पैदल चलना था ।वहां से हम सब साथियों ने शिक्षा कार्यक्रम में भाग लेने जाना था। मैं भी इसी प्रकार अपने आवास स्थान से पैदल ही चल रही थी ।कुछ दूरी पर जाकर मैंने देखा कि एक फटे हुए कपड़ों वाली महिला शक्ल से बिल्कुल भीखारी लग रही थी। उसके साथ पांच बच्चे थे और एक बच्चा उसने अपनी गोद में लिया हुआ था ।वह आगे आगे चल रहे थे ।मैं इनसे थोड़ा ही कदम पीछे थी चलती चलती ।वह महिला कभी पेट पर हाथ रख दी ।उसने बच्चे को अपनी चुनी से बांधा हुआ था। उसकी कमर में चुनरी बंधीं हुई थी ।उसमें उसने अपने बच्चों को लिटा रखा था ।

ऐसा लगता था कि वह महिला काफी दिनों से भूखी हो।एक जगह चलते चलते वह महिला रुक गई ।उसने अपने साथ चलते हुए बच्चों को भी रुकने का इशारा किया। वह पीछे की ओर भी देख रही थी ।मैं उसे देख तो नहीं रही हूं ।थोड़ी देर बाद वह बैठ गई मैंने उसे देखकर अपना मुंह दूसरी ओर कर लिया ताकि उसे लगे कि मैं उसे देख नहीं रही हूं मैंने अपना मोबाइल कान में लगा लिया था ।ु मैंने अपना फोन ऑफ रखा हुआ था ।

मैं यह देखने का प्रत्यन कर रही थी कि कंही यह कोई चोर तो नहीं मैं उसके चेहरे के पीछे क्या छुपा है ।उसे समझने का प्रयास कर रही थी ।उसने कूड़े के ढेर में से सारा कूड़ा निकाला उसे कूड़े के ढेर में से बड़ी मुश्किल से एक रोटी मिली ।उसने जल्दी से रोटी के पांच टुकड़े किए वह रोटी भी पांच दिन की बासी थी ।उस रोटी को देखकर वह खुशी महसूस कर रही थी।उसने वह रोटी ली और उसके पांच टुकड़े और एक एक टुकड़ा सभी बच्चों में बांट दिया फेंके हुए टुकड़ों में से चावल के दाने खाने लगी थी। मुझसे यह देखा नहीं गया मेरी आंखों से आंसू बहने लगे थे ।उसका एक बेटा तभी आकर बोला आज पांच दिनों से केवल हमें यह रोटी मिली है मां ,अब रोटी कब मिलेगी? हम से अब और नहीं चला जाता तब वह बोली बेटा रोटी जरूर मिलेगी थोड़ा और आगे जाएंगे वंहा हमें रोटी मिलेगी ।मैंने धीरे धीरे आगे चलना शुरु कर दिया। मैंने अपने टिफिन बॉक्स से निकालकर रोटी उन्हें दे दी रोटी पर वह ऐसे टूट पड़े मानो ना जाने कितने दिनों के भूखें हो।ं मैं धीरे-धीरे चली जा रही थी और उनकी बातें भी सुन रही थी ।एक जगह प्राईमरी स्कूल का बोर्ड देखकर वह बोली बेटा यह स्कूल है यहां से खाने की भीनी भीनी सुगंध आ रही है यहां पर हर रोज तरह तरह के खाने बनते है।ं जो बच्चों का जूठा बचा होता है वह मैं तुम्हें छुपाके खिला देती हूं परंतु आज अभी तुम सब को इंतजार करना होगा क्योंकि आज स्कूल में कोई बड़ा ऑफिसर आया होगा उसके लिए तुम को आधे घन्टे के े बाद खाना मिलेगा तभी वह बच्चा बोला मुझे भी स्कूल में दाखिल कर दो मां मैं स्कूल में बैठ डट कर भोजन करा करूंगा ।उसकी मां बोली मेरे पास तुम्हारे लिए कपड़े भी नहीं है तुम्हें स्कूल में ड्रेस ना लाने पर मार पड़ेगी। तुमने देखा नहीं है जब हम यहां से गुजरते हैं तो स्कूल की शिक्षिका डांट कर कहती है कि निकलो यहां से ।हम वहां तुम्हें कैसे दाखिल करवा सकते हैं यहां तो हमें प्रवेश भी नहीं मिलेगा ।वह बच्चा बोला मैं अपने आप ही स्कूल आ जाया करूंगा ।मां मैं मैडम से कहूंगा मैं भी पढ़ लूंगा। मैं यहां पर भरपेट भोजन खाया करुंगा ।

उनके छोटे-छोटे मासूम बच्चों के मुख से यह सुनकर मेरी आह निकलती मैं वहां से जल्दी जल्दी चल कर अपने शिक्षा कार्यक्रम में भाग लेने चली गई ।वहां पर मेरा बिल्कुल भी कुछ भी काम करने का मन नहीं किया ।मैं कुछ काम करने की सोचती मेरी आंखो के सामने वह गरीब मां का चेहरा आ जाता जो कि कूड़े कर-कट के ढेर में से खाना ढूंढ रही थी हमने अपने स्कूलों में मिड डे मील जारी तो कर दिया परंतु हमने इसकी सही कीमत नहीं आंकी क्योंकि हमने मिड डे मील सभी शिक्षण संस्थानों में अनिवार्य कर दिया जबकि सभी शिक्षण संस्थानों में उस मिड डे मील के कार्यक्रम को शुरू करने की व्यवस्था की गई है परंतु हमारे 25 राज्यों में से सभी क्षेत्रों के बच्चे स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करते हैं हमें मिड डे मील उन्हीं शिक्षा संस्थानों में या जहां पर जिन राज्यों में अधिक आबादी हो या जिस क्षेत्र के लोग समृध औरा खुशहाल ना हो ।वही इस व्यवस्था को लागू करना चाहिए था ।मेरा तो यही सुझाव है कि जहां पर बच्चों को घरों में भरपेट खाना मिलता है। वहां तो स्कूलों में बनने वाले भोजन को तो कोई छूता तकनहीं है ।हमें वहां केवल पौष्टिक आहार ही उपलब्ध करवाना चाहिए ।मैं जब अपने शिक्षा से संबंधित स्कूलों में गई वहां मैंने पाया कि अधिकतर अध्यापक वर्ग तो सारा दिन मिड डे मील का रजिस्टर ले कर उनके बारे में ही चर्चा करता रहता है। दाल चावल चीनी नमक और पढ़ाने को तो समय ही नहीं बचता। मिड डे मील तक ही सीमित रहता है और अध्यापक वर्ग क्या करें उन पर अपने से ऊपर वाले अधिकारियों का दबदबा होता है । रजिस्टर महीने की आखिरी तारीख तक पूरा नहीं हुआ या मिड डे मील में कोई गड़बड़ी हुई या आकर किसी निरीक्षक महोदय ने मिड डे मील का रजिस्टर देख लिया तो खूब कार्यवाही होगी ।इस चिंता में आधे से अधिक अध्यापक बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने में असमर्थ होते हैं या उन पर अपने अधिकारियों का दबाब होने से कुछ तो झूठ मुठ बीमार हो जाने का नाटक करते े हैं ।उन अध्यापक वर्गों की बारी आती है जो बेचारे सारे के सारे सारे साल बच्चों को मेहनत करवाते हैं। उन्हीं पर इनकी तलवार पड़ती है बाकी भाई-भतीजावाद वाले अध्यापकों या चापलूसी करने वाले अध्यापकों पर इन बातों का कोई असर नहीं पड़ता है।ैमैं वहां से जब अपने सेमिनार पहुंची तो वहां पर मैंने सभी स्कूलों से आए हुए अध्यापकों को इस घटना के बारे में बताया ताकि वे उन बच्चों को अपने स्कूल में अवश्य शामिल करें जिनके मां बाप उन्हें भर पेट खाना नहीं खिला सकते। इसके लिए बच्चों को स्कूल में बिना किसी शर्त के स्कूल में प्रवेश देना होगा, पहले अनोपचारिक तरीके से उनको प्रवेश करवाना होगा फिर उनके आयु से संबंधित तथ्य जुटाने होंगे ।हमें उन बच्चों को प्रवेश दिलाने में मना नहीं करना होगा जिनके पास आयु प्रमाण पत्र या जरूरी दस्तावेज ना हो । किसी बड़े अधिकारी या स्वास्थ्य अधिकारी से उनका प्रमाण पत्र बनवा कर उनके बड़े मुख्य से हस्ताक्षर करवा कर उनको स्कूलों में अवश्य दाखिल करना होगा ताकि छोटे-छोटे मासूम बच्ची शिक्षा से वंचित ना रहे। इसके लिए उनके लिए खाने पीने की व्यवस्था और उनकी स्वास्थ्य की जिम्मेदारी हमें ही निभानी होगी कहीं ना कहीं इन बच्चों में ही हमारे देश का भविष्य छुपा है ।हमें इन बच्चों को आगे लाना होगा। इस कहानी को लिखने का तात्पर्य मुझे इन सभी तथ्यों से अवगत कराना है जिससे की एक आम बालकों को इन सभी समस्याओं से जूझना पड़ता है इसके लिए कहीं ना कहीं हम भी जिम्मेदार हैं ।और हमारे अभिभावक गण भी हमें इन परिस्थितियों का कड़े दमसे मुकाबला करना है ।सच्ची वास्तविकता से सब लोगों को उजागर करना है।हमें अपने शिक्षा से जुड़े हुए अभिभावकों अध्यापकों और सभी राज्यों के मांन्य गणों को प्रेरित करना होगा । कोई भी बच्चा इन समस्याओं से इतना निष्प्राण ना हो जाए कि उसके पास खाने के लिए रोटी ना हो ,पहनने के लिए कपड़ा ना हो, अगर उसे खाने के लिए रोटी नहीं मिलेगी तो वह शिक्षा कैसे ग्रहण कर पाएगा इसके लिए हम सभी को मिलकर कदम उठाना होगा ।ं

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