ईमानदार बंजारा

बंजारों की एक छोटी सी बस्ती थी। उन बंजारों का मुखिया था रामप्रसाद। रामप्रसाद को उन्होंने मुखिया पद से हटा दिया था। वह अपने बेटे के साथ अलग से रहता था। राम प्रसाद की पत्नी मर चुकी थी। उसनें अपनें बेटे का  नाम  विवेक रखा था। प्यार से वह अपने बेटे को  विकु बुलाया करता था। विकु की मां उसे छोड़ कर जा चुकी थी। बंजारों की  बस्ती से अलग  रह कर अपने बेटे की परवरिश कर रहा था। वह काम की तलाश में भटक रहा था। काम की तलाश में चलते चलते वह काफी दूर निकल चुका था। कभी-कभी वह यूं ही काम की तलाश में दूर-दूर तक निकल जाता था। एक दिन चलते चलते वह जमीदार की हवेली में पहुंच गया। जमीदार ने अपनी हवेली में एक द्वारपाल भी तैनात   किया हुआ था। द्वारपाल का बेटा सोमेश भी उसी की तरह लालची था।। सोमेश नें जमीदार की पत्नी का सोने का हार चुरा लिया था। वह जब हार चुरा कर भाग रहा था रास्ते में उसे बंजारा राम प्रसाद मिल गया। उसने एक योजना बनाई मैं इस बंजारे को अपराधी ठहरा दूंगा कह दूंगा कि जमींदार की पत्नी का हार इसी ने चुराया है। उसने घर आकर उस हार को अपने घर के पास ही एक खेत में छुपा दिया। जब दूसरे दिन द्वारपाल का बेटा महल में आया तो वह द्वारपाल ने उसे कहा बेटा अब तुम भी बड़े हो चुके हो कोई न कोई काम  किया करो। आवारागर्दी मत करा करो।

रामप्रसाद का बेटा विवेक बहुत ही होनहार था। उसने पास के स्कूल में उसे दाखिला  दिलवा दिया था। वह रोज स्कूल जाता था। जब उसे अपने मां की याद आती थी तो अपने घर के बाहर एक आम का पेड़ था जिस पर कोयल गूंजन किया करती थी  वहां चला जाता था। कोयल  के छोटे-छोटे बच्चे थे। वह घंटो घंटो यूं ही  उसके कोयल के मीठे मीठे गाने का  सुनता रहता था। उसकी अध्यापिका ने बताया था कि कोयल बहुत ही मीठा गाना गाती है। कोयल के छोटे-छोटे बच्चे कूं कूंकरते थे। वह चुपचाप उस पेड़ के नीच चारपाई लगा कर सो जाता था। उसे लगता था कि मां लोरी गाकर उसे सुला रही है। वह कोयल के बच्चों को नुकसान नहीं पहुंचाता था।  विवेक जब भी उदास होता था तो वह चटाई लेकर उसके घोंसले के पास  चला जाता था। कोयल जान जाया करती थी कि आज वह बहुत उदास है। वह उसकी दोस्त बन चुकी थी। रामप्रसाद  जब देर रात तक घर नहीं आया उस  समय  विवेक केवल 12साल का था। वह चुपचाप  कोयल के  घोंसले के पास आम के पेड़ के नीचे सो गया था। कोयल काफी देर तक उसकी चटाई के पास  मंडरा रही थी। वह चुपके चुपके रो रहा था। कोयल वहां से सीधा उड़ चुकी थी। वह रामप्रसाद को ही ढूंढने निकली थी। उड़ते उड़ते वह काफी दूर तक पहुंच चुकी थी।

द्वारपाल का बेटा  सोमेश जब महल में पहुंचा जमीदार बोला जिस दिन तुम यहां आए थे उस दिन रानी का  सोनें का हार ना जाने कहां चला गया। कहीं तुम तो चुरा कर नहीं ले गए। वह बोला मैं भला  हार क्यों चुराने लगा।उस दिन जब मैं घर जा रहा था तो थोड़ी देर के लिए मैंने रामप्रसाद को रुकने के लिए कहा था। वह यहां आया था। वह भी काम की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था। शायद वही तो आपकी पत्नी का हाथ चोरी कर ले गया होगा। द्वार पाल बोला हां हां जमीदार साहब वही आपकी पत्नी का हार चुरा कर ले गया होगा क्योंकि वह उस दिन बार-बार अपने बैग में बार  बार हाथ डालकर देख रहा था।

द्वारपाल ने बंजारे रामप्रसाद को बुलाया रामप्रसाद ने सोचा शायद जमीदार उसे कुछ काम दे दे इसलिए मुझे अपनी हवेली में बुलाया होगा। रास्ते में सोचता जा रहा था कब जैसे मैं हवेली पहुंच जाऊं। आज तो मैं धनी व्यक्ति बन जाऊंगा। मुझे काम के लिए ही बुलाया होगा। आज तक तो मुझे कभी किसी ने नहीं बुलाया।  मेरे बेटे की किस्मत शायद  अब जाग ही जाएगी। मैं उसे ढेर सारी खुशियां दूंगा।  उसकी मां  जब से मर गई तब से वह छोटा सा बच्चा अनाथ हो गया। मैं उसे वह प्यार नहीं दे पाया जो एक  मां दे सकती है। वह जमीदार की हवेली में पहुंच गया।

द्वार पाल बोला तुम उस दिन भी  मेरे बेटे के साथ  थे । तुमने ही रानी का हार चुराया है। वह बोला मैं गरीब जरूर हूं मगर मैं चोरी नहीं कर सकता। मुझे रानी के हार से क्या लेना। मैनें हार नहीं चुराया।

जमीदार वहां आ चुका था। वह बोला तुम काम की तलाश में आए थे हम तुम्हें अपने यहां काम पर रख लेंगे तुम सच सच बताना रानी का हार तुमने चुरा कर कहां डाला। वह बोला मैं उस दिन द्वारपाल जी के बेटे सोमेश के साथ जा रहा था। उसने ही मुझे यहां बुलाया था ताकि मैं आपसे काम मांग सकूं। मैंने सोचा पहले मैं कहीं और काम की तलाश में चलता हूं। मुझे अगर काम नहीं मिलेगा तभी मैं आपसे काम के लिए भीख मांग लूंगा। मैं यहां से चला गया था।

रामप्रसाद बोला हार सोमेंश ने ही चुराया होगा द्वारपाल ने जब अपने बेटे का नाम सुना तो वह आग बबूला हो उठा बोला झूठ क्यों बोल रहे हो।कल तक हार ले आना वर्ना तुम्हें घर जाने नहीं दिया जाएगा।  सुमेश भी तब तक वहां पहुंच चुका था। वह बोला जमीदार साहब आप इसको छोड़ो मत। उसने ही  हार चुरा कर ना जाने कहां रख दिया है।

जमीदार ने राम प्रसाद को पकड़ लिया। उसने रामप्रसाद को बांध लिया था।  रामप्रसाद बोला रहम करो। जमीदार साहब मेरा छोटा सा बच्चा घर में अकेला है।  मैं  जब घर नहीं  जाऊंगा तो वह अकेला मर जाएगा। मेरे सिवा इस दुनिया में  उसका कोई नहीं है। जमीदार को जरा भी दया नहीं आई। उसने कहा तुम इस हवेली के बाहर पड़े रहो। उसने रामप्रसाद के हाथ बांध दिए थे।  उसनें रामप्रसाद को कहा तुम्हे हम 15दिन का समय देते हैं इन 15दिनों के भीतर तुम नें हार हमारे हवाले नहीं किया तो तुम्हे पांच साल की सजा दे दी जाएगी।

काफी रात तक रामप्रसाद जब घर नहीं पहुंचा तो विवेक  को चिन्ता सतानें लगी। मेरे बाबा तो बाहर से आनें में कभी इतनी देर नहीं किया करते थे। कोयल के घोंसले के पास चला गया। वह कोयल के बच्चों का बहुत ध्यान रखता था। वह उस के बच्चों को कभी दाना डालना नहीं भूलता था। कोयल यह सब देखा करती थी। विकु कोयल के घर लें के पास चटाई पर लेट कर रो रहा था। कोयल से उसका दर्द देखा नहीं गया। उड़ती उड़ती वह जमीदार की हवेली में पहुंच गई। उसने देखा कि रामप्रसाद  जमीदार की हवेली के बाहर कराह रहा था। उसके पास आ कर कूं कूं करने    लगी थी। राम प्रसाद को पता चल चुका था कि कोयल उसको ढूंढते ढूंढते वहां आई है। वह उसके बेटे की दोस्त थी। उसने एक कागज पर बड़ी मुश्किल से अपने बेटे को  पत्र लिखा। बेटा मुझे जमीदार  ने चोरी के इल्जाम में बेड़ियों से बांध दिया है। वे कल मुझे  सजा सुना देंगे।  मैंने  हार नहीं चुराया है। बेटा तुम्हारा बाप मर जाएगा मगर चोरी नहीं करेगा। मैं जल्दी ही  छूट जाऊंगा तब तक तुम अपने चाचा के पास चले जाना।  कोयल उठते उडते विकु के पास पहुंच गई। कोयल पेड़ के पास आकर आ कर मंडरा रही थी। उसने एक कागज का  टुकड़ा विवेक के सामने डाल दिया। विवेक ने देखा उसके पिता ने लिखा था कि मैं काम की तलाश में जमीदार के महल में गया था। द्वारपाल ने अपने बेटे का इल्जाम मुझ पर डाल दिया।जमीदार नें रानी के हार को चुरानें  के इल्जाम में मुझे बन्दी बना लिया है। शायद हार द्वारपाल के बेटे  नें ही चुराया है।तुम सोमेश के घर की तलाशी करना। तुम अपनें चाचा के साथ चले जाना। तुम कोई सुराग ढूंढ सको तो ठीक है बेटा। विवेक पत्र पढ कर रो पड़ा। उसके चाचा को भी खबर मिल चुकी थी। वह बोला बेटा तुझे डरने की कोई जरुरत नहीं। तुम्हारे बाबा कभी चोरी नहीं कर सकते। चोर को कैसे पकड़ लिया जाए। कोयल की समझ में सारी सच्चाई आ चुकी थी। विवेक भी सोमेश के ऊपर नजर रखा करता था। कोयल भी सोमेश की हरकतों को देखा करती थी। कोयल एक दिन जब पेड़ पर बैठी बैठीथी तो उस नें सोमेश को खेत की ओर जाते देखा। वह भी दूर तक उसके पीछे पीछे उड गई। सुबह सुबह के समय सोमेश  खेत में आया उसने वहां एक गडडा किया।उसमें से उसने कोई वस्तु निकाली उसी वक्त उसे कुछ आहट सुनाई दी। उसने वहां से जाते हुए कुछ लोगों को देखा। उसने उस वस्तु को वही जमीन में गाड़ दिया। वह वहां से जानें ही लगा था तभी उसका पैर एक नुकीले पत्थर से टकराया। उसके घुटनों में चोट लगने गई थी। उस की पैन्ट का एक छोटा सा टुकड़ा भी वहां गिर गया था। सोमेश नें जल्दी ही घुटने की चोट को ढका।उस के खुन भी बह रहा था। जल्दी ही घर आ गया ताकि कोई उसे देख न ले।

कोयल विवेक के पास आ कर कूंकूं करनें लगी। उसका चाचा बोला तुमने यह क्या पाल रखा है वह बोला यह मेरी दोस्त है मैंने इसे अपनी मां के रूप में देखा है।  बाबा जब यहां  नहीं होते तो वह मुझे मीठा मीठा गाना गाकर सुनाती है। शायद वो मुझे कुछ कहना चाहती है। उसका चाचा बोला शायद हो सकता है। वह दोनों कोयल के पीछे पीछे चल पड़े। कोयल सोमेश के घर के पास के पास  कूंकने लगी। वह अपनें चाचा से बोला  यहां खेत में  कुछ है। उसने देखा वहां पर पत्थर पर खून लगा हुआ था। शायद यहां पर कोई कुछ खुदाई  करनें के लिए आया हो।

विवेक के चाचा जी बोले बेटा शायद  यहां पर किसी ने कुछ खुदाई की है। कोयल भी उसी स्थान पर बैठकर  कूकने  लगी। जहां पर कोयल बैठी थी वहां पर वह खोजने लगे। वहां पर उन्हें एक थैली में लिपटा हुआ हार मिल गया ।

विवेक  हार देख कर खुश हो गया। उसने अखबार में पढ़ लिया था जमीदार ने राम प्रसाद को चोरी के इल्जाम के लिए  उसके पिता को पांच साल की सजा सुना दी थी। सजा को केवल एक दिन शेष था। विवेक ने कहा चाचा जल्दी  जमीदार के महल चलो। हार तो मिल चुका है।

वह दोनों जमीदार की हवेली में पहुंचे। वहां पर पहुंचकर विवेक जमीदार  को बोला जमीदार साहब आप धनवान जरूर है। आपने मेरे पिता को यूं ही   बन्दी बना दिया है। आपने बिना सबूत के मेरे पिता को  सजा सुना दी। आप कैसे जमीदार हो। आपने कैसे व्यक्ति को द्वारपाल  नियुक्त किया है जिसको अपने बेटे के बारे में भी मालूम नहीं है।

जमीदार गुस्सा होकर बोला तुम कौन हो? और इस बंजारे की पैरवी करने क्यों आए? मैं अपने पिता को यहां से छुड़ा कर ले जानें आया हूं क्यों कि मेरे पिता बेकसूर है। यह लो आप अपना हार।  जमीदार बोला जब तुम्हारे पिता को मार पड़ी तभी उसने तुम्हें  हार लौटाने के लिए यहां बुलवा लिया होगा। वह बोला जमीदार साहब आप अमीर हो इसलिए आप अपने ऊपर गर्व कर रहे हो। विवेक बोला द्वारपाल के बेटे ने  ही चोरी की थी। द्वारपाल बोला  तू भी अपने बाप की तरह  ही झूठा है। विवेक ने कहा जब हम  हार ढूंढ रहे थे तो सोमेश के खेत से  ही हमें  यह हार मिला। जब वह वहां  हार  खोज रहा होगा तो  उसने सोचा होगा कि कोई उसे देख ना ले इसलिए शायद उसे चोट भी लगी है। उसकी टांग पर या बाजू में कहीं चोट का निशान होगा। आपको पता चल जाएगा कि चोरी सोमेश नें ही की है। जमीदार बोला अगर ऐसी बात है तो मैं द्वारपाल को भी अपनी हवेली से निकाल दूंगा। और तुम्हारे पिता को यहां से छोड़ दूंगा। बेटा अगर तुम सच बोल रहे हो तो।

जमीदार नें सोमेश को अपनी हवेली में बुलाया। वह अपनी बाईक पर बैठकर जमीदार की हवेली  में पहुंचा। जमीदार को प्रणाम कर बोला आप नें मुझे क्यों बुलाया अब क्या हुआ? जमीदार बोला जरा अपनी बाजू तो दिखाओ। उसकी बाजू में कहीं  चोट की निशानी  नहीं थी। जमीदार नें कहा अपनी टांग भी दिखाओ जैसे ही उसनें पैन्ट  ऊपर करी उसकी टांग पर पट्टी बंधी थी। उसकी पेंट का छोटा सा टुकड़ा भी विवेक ने संभाल कर रख दिया था जो  सोमेश ने नहीं देखा था। उसने अपनी पैंट की सिलाई  भी करवा दी थी।

सुमेश पकड़ा जा चुका था। द्वारपाल को जमींदार ने अपनी हवेली से निकाल दिया। उसने रामप्रसाद से माफी मांगी कहा मुझे माफ कर दो। आज से द्वारपाल के पद पर मैं तुम्हें नियुक्त करता हूं। तुम्हें ऐसे भी काम की तलाश थी। विवेक ने  अपनें बाबा को बताया कि इस कोयल  की मदद से मैं आपको छुड़ाने में कामयाब हुआ। मेरी मां के रूप में ही वह मुझे बचाने आई है। उसनें अपनी कोयल को चूम लिया। विवेक नें अपनें पिता को छुड़ा दिया था। जमीदार के महल में द्वार पाल के पद पर आसीन हो गया था। विवेक भी खुशी खुशी अपनें पिता के साथ रहने लगभग लग गया था।

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