उल्टा पुल्टा

11/4/20
टप्पू बहुत ही बुद्धिमान बच्चा था। अपनी कक्षा में हमेशा अव्वल आता था। वह बहुत ही जिद्दी और शरारती भी था। उसके माता-पिता उसे समझाने की बहुत कोशिश करते बेटा ज़िद नहीं करते मगर वह अपने माता-पिता की बातों पर ज़रा भी गौर नहीं करता था और अपने माता-पिता को बहुत ही परेशान करता था। उसके माता-पिता उसे सुबह के समय सैर करने के लिए कहते पर वह उनकी जरा नहीं सुनता था। उसके पिता गुस्से में उस पर ठंडा ठंडा पानी फैंकते मगर फिर भी वह रजा़ई ओढ़ कर चुपचाप सो जाता। उस पर अपने माता-पिता की बातों का कोई असर नहीं पड़ता था। शरारती होने के साथ-साथ वह बहुत ज़िद्दी भी था। कई बार दूसरों के सामने उसके माता-पिता को बहुत ही शर्मिंदा होना पड़ता था। कभी-कभी तो वह अपनी मां पर इतना बिगड़ता और कहता कि मां खाने में कैसी सब्जी बनाई है? मुझे बाज़ार से पिज़्ज़ा बर्गर मंगवा कर दो। मैं तो छोले भटूरे खाऊंगा। घर का खाना नहीं खाऊंगा। उसके माता-पिता बहुत समझाते बेटे बाहर का खाना खाकर तुम बीमार पड़ सकते हो।लेकिन उस पर उनकी बातों का कोई असर नहीं होता था। अगर वह बात मानता था तो केवल अपनी दादी की।
उसके स्कूल में कुछ दिन की छुट्टियां आने वाली थी। उसके माता-पिता ने योजना बनाई कि इस बार गांव में ही चलते हैं। गांव के वातावरण में जाकर शायद वह सुधर जाए इसलिए उन्होंने कुछ छुट्टियां ले ली और गांव जाने की तैयारी करने लगे। टप्पू भी बहुत खुश था कि उसे अपनी दादी के पास जाने का मौका मिलेगा। कितना मज़ा आएगा। वह जल्दी जल्दी अपने कमरे में जा कर अपना सामान पैक करनें लगा।
गाड़ी में बैठ कर टटप्पू को बहुत ही अच्छा लग रहा था। गाड़ी बहुत ही तेज गति से चल रही थी। वह अपने पिता को कहने लगा कि पिताजी मुझे बहुत ही भूख लगी है। अगला स्टेशन कब आएगा? टटप्पू के पापा बोले अभी तो खाना खाया है हमने। मगर मैं तो तो आइसक्रीम खाना चाहता हूं मुझे चॉकलेट भी नहीं मिली मैं तो चॉकलेट ही खाऊंगा ।टप्पू ज़िद करने लगा। उसके पिता ने कहा कि बेटा यहां पर चॉकलेट नहीं मिलती। तुम्हारी मनपसंद चॉकलेट तो तुम्हें गाड़ी से नीचे उतर कर ही मिलेगी। उसकी मां बोली बेटा हमें बाहर की चीजें नहीं खानी चाहिए। बाहर की चीज़ें खाकर तुम बिमार पड़ सकते हो। बाहर की वस्तुएं में तेल भी बहुत मात्रा में होता है और ना जाने क्या क्या मिलावट होती है। टप्पू मुंह फुला कर बैठ गया।
एक दंम्पति परिवार उसकी बगल में बैठे हुए थे। उनके साथ उनका एक बच्चा भी था। सन्नी टप्पू की उम्र का ही था। बातों बातों में उन से परिचित हो गया। दोनों ने जल्दी ही मित्रता हो गई। सन्नी के पापा ने ने बताया कि अगला स्टेशन आने में 10 मिनट बाकी है।। सन्नी चुपके से टप्पू से बोला अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकेगी। तुम गाड़ी से उतर कर चौकलेट ले आना। टप्पू बोला मेरे माता-पिता मुझे नीचे उतरनें नहीं देंगें। फिर उसने सोचा जैसे ही गाड़ी रुकेगी वह बिना किसी को बताए चुपके से जाकर चॉकलेट ले आएगा। गाड़ी अपनी स्टेशन पर रुकी। वह चॉकलेट लेनें के चक्कर में जल्दी से गाड़ी से नीचे उतरने लगा अचानक उसका संतुलन बिगड़ गया और वह धड़ाम से नीचे गिर गया। सौभाग्य से उसे ज्यादा चोट नहीं लगी। देखते-देखते लोगों की भीड़ वहां इकट्ठा हो गई। वे बोले संभल कर क्यों नहीं चलते? रोते-रोते वह बोला मैं चॉकलेट लेनें उतर रहा था। उसके माता पिता उस की इस हरकत से बहुत ही दुःखी हो कर बोले कहना न मानने के कारण तुम्हारी यह दुर्गति हुई है। टप्पू पर इस बात का कोई असर नहीं हुआ था।
गांव पहुंचे तो सबसे पहले डाक्टर को दिखाया । डॉक्टर ने कहा कि थोड़ी मोच आई है कुछ दिन चलने से परहेज़ करना होगा। उसके पिता बोले मोच के कारण तुम कहीं बाहर भी नहीं जा सकते। तुम्हें सारी छुट्टियां घर में गांव के अंदर ही बितानी पड़ेगी। यह सुनकर टप्पू बहुत ही दुखी हो गया था। वह अपनी दादी के घर पहुंच गया था । जंगल में अकेला घर था। उसके आसपास कोई भी घर नहीं था। उसकी दादी का घर पुरानी हवेली से कुछ कम नज़र नहीं आ रहा था। गांव आ कर उसका मन खुश हो गया। घर के बाहर फुलवारियां देख कर उसका मन मंत्र मुग्ध हो गया। अपनी दादी को कहनें लगा दादी आपके घर में तो इतने सारे फूल है । यहां पर मुझे दौड़ना अच्छा लगेगा । क्या करूं?मैं अभी तो दौड़ नहीं सकता, मैं जब ठीक हो जाऊंगा तो मैं मैं यहां पर झूला झूल कर और पौधे लगा कर अपना समय बिताऊंगा।
उसकी दादी हंसते हुए बोली बेटा तुम्हारा जो मन में आए वह ‌करो,यहां तुम्हें रोकने टोकने वाला कोई नहीं है जहां तुम्हारा मन हो वहां जाओ, इस घर में बहुत सारे कमरे हैं जो चाहे करो। तुम्हारे पिता के बचपन के कमरे में जा सकते हो ।वहां खूब सारे खिलौने हैं पर अपने दादाजी के कमरे मैं मत जाना ।दादा जी का सामान मत छेड़ना वहां पर कुछ बहुत ही कीमती और पुरानी चीजें पड़ी है। तुम्हारे दादा जी की यादें हैं वहां पर। वहां किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ मुझे पसंद नहीं है जो चीज जैसी है जहां है वही रहे तो अच्छा है बाकी तुम हर जगह खेल सकते हो। टप्पू बहुत खुश हो गया था। पर पापा के कमरे में भी वह बैठा बैठा अकेले बहुत बोर हो रहा था ।उसे समझ नहीं आया कि वह किसके साथ खेलें यहां तो कोई बच्चा उसकी उम्र का नहीं था जिसके साथ वह खेल सकता था।कुछ देर अकेले ही खिलौनों के साथ खेलनें लग गया। जब बोर हो गया तो वहां से बाहर चला गया अचानक उसे याद आया कि दादी ने कहा था दादाजी के कमरे में नहीं जाना, ऐसा दादाजी के कमरे में क्या हो सकता है ?मुझे जाकर देखना चाहिए। कितना मज़ा आएगा?
मुझे यह काम चुपचाप करना होगा किसी को पता नहीं चलना चाहिए नहीं तो दादी को बहुत बुरा लगेगा। दिन में जब सब दोपहर का खाना खा कर सुस्ता रहे थे तब टप्पू चुपके से अपने कमरे से बाहर निकला और घूमते घूमते उसने अपने दादा जी का कमरा देखा। उसने सोचा आस पास कोई भी नहीं है चलो, चुपके से इसके अंदर घुस जाता हूं और दरवाजा अंदर से बंद कर लेता हूं वैसे भी यहां कौन आता है? किसे पता चलेगा कि मैं कहां हूं ?यहां तो बहुत सारे कमरे हैं।
दादा जी का कमरा बहुत बड़ा था । वहां मेज़ पर दादा-दादी की एक बड़ी सी तस्वीर थी । वह काफी पुरानी नज़र आ रही थी उस कमरे में बहुत सारी पुरानी चीजें भी शायद अंग्रेजों के जमाने की थीं। टप्पू सभी चीजों को बड़े ध्यान से देख रहा था। टप्पू वहां जाकर बहुत खुश था। उस कमरे के अंदर और छोटा कमरा था पर वह ताले से बंद था। इस कमरे के अंदर क्या हो सकता है? टप्पू ने सोचा और इस ताले की चाबी कहां है? तभी मां की आवाज आई तो टप्पू जल्दी से वहां से बाहर आ गया।
शाम हो गई थी मां रात के भोजन के लिए टप्पू को आवाज लगा रही थी । कितना समय बीत गया? टप्पू को तो पता ही नहीं चला समय का अंदाजा ही नहीं रहा। खाने में क्या बना है मां टप्पू ने पूछा, मां बोली आज हमने गांव की एक खास सब्जी बनाई है । तुम्हें कभी नहीं खाई है। खा कर बताना कैसी है? क्या है ?मुझे सब्जी रोटी नहीं खानी थी। मेरा मन तो केक खाने का कर रहा है।सब्जी तो हमेशा ही खाते हैं ।यह कह कर टप्पू ने मुंह बना लिया।
रात के खाने में मक्की की रोटी और सरसों का साग परोसा था बेहद स्वादिष्ट बना था। दादी नें ऊपर से मक्खन डाल दिया इससे उसका स्वाद तो और भी ज्यादा बढ़ गया।
आज तो टप्पू ने मज़े से खाना खा लिया क्योंकि वह बहुत स्वादिष्ट बना था । टप्पू अपनें पापा से बोला कल मैं सब्जी नहीं खाने वाला। कल तो मुझे केक ही चाहिए। अगर आप उसे नहीं लेकर आए तो मैं खाना ही नहीं खाऊंगा। एक तो मेरे पैर में चोट लगी है और मैं कहीं खेलने भी नहीं जा सकता। मैं तो बोर हो जाऊंगा, टप्पू गुस्से में बोला। दादी बोली बेटा यह गांव है जहां पर यह सब नहीं मिलता ।तुम्हें घर का बनाया हुआ खाना ही खाना पड़ेगा। घर का खाना भी बहुत स्वादिष्ट होता है बेटा। ज़िद नहीं करनी चाहिए। टप्पू को बहुत बुरा लगा था। उसकी दादी पर टप्पू को बहुत ही गुस्सा आ रहा था क्योंकि उसकी दादी ने उसे बाहर का खाना खाने से इनकार किया था।
ठीक है जब दादी भी मेरी बात नहीं मानती है तो मैं भी क्यों दादी की बात मानूं,? टप्पू ने गुस्से में सोचा। मैं भी अब से रोज़ दादाजी के कमरे में जाऊंगा और वहां पर चीजें उलट-पुलट कर देखूंगा सब चीजें छेडूंगा।मैं भी देखता हूं कौन मुझे रोकता है?

टप्पू अब अपना ज़्यादातर समय दादा जी के कमरे में बितानें लगा। वह अपने दादा की चीजों को उलट-पुलट कर देखता रहता था। एक दिन टप्पू ने इधर-उधर देखा सामने मेज पर उसकी दादा दादी जी की तस्वीर पड़ी थी, जैसे ही उसने उस तस्वीर को सीधा किया वैसे ही उसमें से एक दराज खुल गया और उसके अंदर से एक डिब्बी बाहर निकली । टप्पू ने बड़ी हैरानी से उस डिब्बे को देखा उसमें सोचा क्यों ना इसे खोल कर देखा जाए? इसमें क्या हो सकता है? जैसे ही टप्पू ने डिब्बी उठाई उसके अंदर से एक बड़ी सी चाबी निकली ।वह काफी पुरानी नज़र आ रही थी । टप्पू के दिमाग में एक विचार आया हो ना हो यह चाबी इसी ताली की हो सकती है । चलो देखते हैं। आज पता चल जाएगा कि दरवाजे के अंदर आखिर है क्या? टप्पू ने थोड़ा घबराते हुए दरवाजा खोला।

कमरे के अन्दर बहुत ही पुरानी और कीमती चीजें थीं। बहुत अनोखी दिखती थीं। टप्पू बहुत ही हैरान था। यह सब हैं क्या? ऐसी चीजें उसने पहले कभी नहीं दखी थीं। कुछ पुरानी तलवारें, मुकुट, मूर्तियां, तस्वीरें,संदूक, कुछ पुराने कपड़े कुछ पुरानी दूरबीन लेंस और कुछ बहुत ही पुरानी किताबें वहां पड़ी हुई थी।उसने एक शीशा उठा लिया। में वह अपनी शक्ल सूरत देखने लगा मैं कितना गंदा हूं ?क्या मैं ऐसा ही हूं? नहीं मैं ऐसा नहीं हूं आईने में धूल जमी हुई थी। वह एक कपड़े से उस आईनें को साफ करने लगा। जैसे ही उसने अपनी उंगली शीशे में घुमाई वह शीशे के आर पार चली गई। अरे यह क्या? फिर टप्पू ने अपना सिर उस में डाल कर देखने लगा और लुडक कर दूसरी तरफ जाकर गिर गया। वह जल्दी से उठ खड़ा हुआ वह सोचने लगा कि वह शीशा कहां गया? शीशा लुढ़क कर पता नहीं कहां जा लगा था । वह शीशा उसे नहीं मिला। उसका माथा चकरा गया। उसका ध्यान अपने पैर की तरफ गया उसके पैर की मोच ठीक हो चुकी थी। यह क्या मेरी टांग तो बिल्कुल ठीक हो गई है ?उस कमरे में उसे सब चीजें अलग अलग दिखाई दे रही थी ।उसे अपने कमरे की सारी चीजें दूसरी तरफ नजर आने लगी। वह अपने मन में सोचनें लगा मैं थक गया हूं इसी कारण शायद मुझे उल्टा उल्टा दिखाई दे रहा है।
वह जल्दी से वहां से भाग कर अपने कमरे में लौट आया। चलो थोड़ी देर सो जाता हूं और चुपचाप सोने की कोशिश करने लगा। थोड़ी ही देर में उसे नींद आ गई।उसकी आंख मां की आवाज़ से ही खुली। मां रात के खाने के लिए बुला रहीं थीं। जब वह बाहर आया तो उसने पाया कि वह तो अपने शहर वाले घर में पहुंच गया है।वह गांव से शहर कब आए? और वह सो कब गया ।उसे कुछ ध्यान नहीं था। उसके पिता खाने की मेज पर खाने के लिए बैठे थे ।वह सोचने लगा उसके पिता हमेशा तो दाएं हाथ से खाना खाते हैं लेकिन आज वह उल्टे हाथ से खाना क्यों खा रहे हैं? उसके पिता उसे बोले बेटा आओ बैठो, हमने तुम्हारे लिए बाजार से ना जाने कितनी सारी चीजें मंगवाई है तुम्हें जो अच्छा लगे वह खा लो ।
वह अपने मन में सोचनें लगा आज मेरे माता-पिता कितने अच्छे हो गए? मुझे बाजार का खाना खाने से रोक भी नहीं रहे हैं और कह रहे हैं कि जो खाना है जितना खाना है खा लो। उसको चुप देखकर उसकी मां बोली थी कि चलो मेरे साथ बाहर चलो जो कुछ तुम खाना चाहता हो, पेट भर कर खाओ। वह अपने माता-पिता के साथ एक रेस्टोरेंट में चला गया ।आज उसे अपने मनपसंद वस्तुएं खाकर बहुत ही अच्छा लग रहा था कि पिता कहने लगे कि बेटा खाना कैसे लगा? मैं आज आप दोनों को गले लगाना चाहता हूं । आप नें मुझे मेरे मन भारती चीजें खानें को दी।उसके माता-पिता बोले हम तो तुम्हें किसी चीज के लिए कभी भी नहीं रोकते। वह मन ही मन बहुत ही खुश हो रहा था और सोचने लगा कि कल मेरे माता-पिता मुझे स्कूल जाने को न कहें । मेरा स्कूल जाने का ज़रा भी मन नहीं है। सुबह उठकर मैं अपने माता-पिता से कह दूंगा कि मेरा स्कूल जाने का बिल्कुल भी मन नहीं है । खा पीकर और इतना थक चुका था कि उसे बिस्तर पर चढ़ते ही नींद आ गई। अगले दिन सुबह हुई स्कूल जाने का वक्त हो गया उसके माता-पिता ने उसे आवाज नहीं लगाई और ना ही उसे जगाया था।? वह अपने माता-पिता के पास आया और बोला आज आप ने मुझे सुबह उठाया भी नहीं । बाजार के गोलगप्पे खा कर उसके पेट में दर्द होने लगा था और उसे बुखार भी आ गया था अपनी मां से बोला कि मां मेरा पेट दर्द कर रहा है। मैं स्कूल नहीं जाना चाहता। उसकी मां बोली तो बेटा कोई बात नहीं। हम ने बाहर से पिज़्ज़ा और बर्गर चिप्स और बिस्किट्स मंगवा कर रसोई में रख दिया है जब भूख लगे तो खा लेना हम लोग कुछ काम से बाहर जा रहे हैं शाम तक लौटेंगे। यह कहकर उसके माता पिता उसे अकेला छोड़ कर चले गए वह अपने मन में सोचनें लगा आज तक उसके माता-पिता उसे अकेला छोड़कर कभी नहीं गए । उसके माता पिता बुखार आने पर उसके पास दिन रात खड़े हो जाते थे यह क्या मेरे मां-बाप इतने गैर कैसे हो गए? जो मुझे बीमार देखकर भी मेरी कोई परवाह नहीं कर रहे हैं और मुझे यह कहकर चले गए कि तुम अपने आप खाना खा लेना इसे अच्छा होता मैं स्कूल चले जाता। उसने पूरे दिन कुछ भी नहीं खाया ।शाम को जब उसके माता-पिता घर वापस आए तो उसने मां से कहा मां मुझे बहुत भूख लगी है कुछ खाने को दो ना ।उसकी मां ने कहा अरे बेटा हमने तो तुम्हारी मनपसंद चीजें ला कर रखी थी। तुमने वह क्यों नहीं खाई। उसने बोला मां मेरा बाहर का खाना खाने का बिल्कुल मन नहीं है। बाहर का खाना खा खाकर मैं बहुत थक गया हूं। मुझे सादा खाना खाना है। मां जैसे दाल सब्जी रोटी। मां ने कहा बेटा अभी तो हम बहुत थक गए हैं । बहुत देर हो गई है अभी तुम यही खाकर अपना पेट भर लो । यह कह कर मां वहां से चली गई। टप्पू को बहुत बुरा लगा। इच्छा न होते हुए उसने थोड़ा सा खाना ही खाया और वह जाकर सो गया।दूसरे दिन जब वह स्कूल गया तो वह सोचनें लगा कि मैडम मुझे डांट देगी कि कल तुम स्कूल क्यों नहीं आए ?मैडम नेंं उसे कुछ नहीं कहा। कक्षा में गणित के अध्यापक को देखकर बहुत ही डर गया पर गणित के अध्यापक ने भी उसे ज़रा भी नहीं डांटा। कभी-कभी तो अपने मन में सोचता कि इस बार उसके माता-पिता नें उसे पढ़ाई को लेकर जरा भी नहीं डांटा।उसकी परीक्षा पास आ गई थी उसनें कुछ भी पढ़ाई नहीं की। परीक्षा में उस ने कुछ भी नहीं लिखा। उसके साथ के सारे बच्चे अच्छे नंबरों से पास हो गए थे और वह फेल हो गया था। ऐसा पहली बार हुआ था ।
वह कक्षा में बैठा बैठा बहुत रोया। उसकी मैडम ने उसे एक बार भी नहीं कहा कि तुम फेल हो गए हो। अगर उसके टीचर उसकी शिकायत घर भिजवा देते तो शायद वह कुछ तो पढ़ाई करता।

जब वह घर आया तो उसके मम्मी पापा हंस हंस कर बातें कर रहे थे। उसे बहुत ही बुरा लगा उसके माता-पिता को यह क्या हो गया है बात-बात पर उसके माता-पिता उसे समझाते थे कि बेटा पढ़ाई करो पढ़ाई करो वरना फेल हो जाओगे। इस बार तो उन्होंने कुछ भी नहीं कहा अगर वह मुझे डांट देते तो शायद मैं कभी भी फेल नहीं होता। वह अपने माता-पिता के इस तरह के बदलाव को देखकर दंग रह गया था। उसकी मैडम ने उसे एक बार भी नहीं कहा कि तुम फेल हो गए हो। वह तो सब कुछ गंवा बैठा। अपना स्वास्थ्य भी ,विद्या भी और माता-पिता भी। सब कुछ उलट-पुलट हो चुका है।

मैं ऐसा ही चाहता था मगर अब उन सब चीजों के बावजूद भी मैं खुश क्यों नहीं? काश मेरे माता-पिता मुझे डांट कर कहते कि बेटा जल्दी उठा करो ।मुझे डांट फटकार कर या प्यार से समझा कर दीकहते तो मैं समझ जाता। आज सचमुच में मैं पागल हो जाऊंगा। स्कूल आकर भी उसे किसी के साथ खेलना अच्छा नहीं लग रहा था क्या करूं? अगले ही दिन वह चुपचाप बिना किसी को बताए अकेले ही अपनी दादी के घर जाने के लिए निकल पड़ा उसे दादी की बहुत याद आ रही थी एक दादी ही तो थी जो जिससे वह कुछ भी छुपाता नहीं था दादी की हर बात को मानता था ।दादी का लाडला जो था।मां बाबा तो मेरा बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखते उन्हें मेरी अब कोई ज़रूरत नहीं है । मैं दादी के पास ही चला जाऊंगा। वह चुपचाप जाकर गाड़ी में बैठ गया और सीधा दादी के घर पहुंच गया।दादी के पास जाकर रो-रो कर कहने लगा दादी दादी मैं अपने घर वापस नहीं जाऊंगा?
दादी की पूछने पर उसने दादी को रो-रो कर सब किस्सा सुना दिया कैसे उसके माता-पिता बदल गए हैं? कैसे उसके स्कूल के अध्यापक, उसके दोस्त सब कुछ बदल गया है। यहां तक कि उसका कमरा और दादी का घर ,हर चीज बदली बदली नज़र आ रही थी। जैसे सब कुछ उलट-पुलट हो गया हो। दादी ने उससे कहा कि तुम मुझे सब सच सच बताओ कि यह सब शुरू कहां से हुआ ?कब तुम्हें लगा कि सब कुछ उलट-पुलट हो गया है? अचानक टप्पू को याद आया कि मैं दादाजी की कमरे में चुपके से चला गया था ।कुछ लगा था और वही अजीबोगरीब शीशा मिला, जिसके अंदर वह घुस के गिर गया है। उसके बाद से ही सब कुछ बदल गया। अचानक दादी ने उसे बताया कि वह शीशे की दुनिया में चला आया है। उसकी असली दुनिया तो उस शीशे की दूसरी ओर है।
वह दौड़ा-दौड़ा अंदर आया वह शीसे को ढूंढने लगा ।वह किसी चीज से टकराया।मेज के नीचे की ओर शीशा पड़ा हुआ था।वह शीशा हां हां सच में यह शीसा जादू का ही था ,तभी तो मेरा हाथ उस में घुस गया था। यह मेरे माता-पिता नहीं और ना ही यह मेरी दादी है। यहां सब चीजें जैसे शीशे में उल्टी दिखाई देती है वैसी ही हो रहा है। यहां पर तो सब कुछ उल्टा हो रहा है ।जो मैं नहीं करना चाहता वह कर रहा हूं ।जो करना चाहता हूं वह नहीं कर सकता ।हे भगवान !क्या करूं?मुझे मार्ग दिखाओ। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं जल्दी से जल्दी अपने घर पहुंचना चाहता हूं। हे भगवान! उस शीसे को ढूंढने में मेरी मदद करो। अचानक उसका पैर मेज से टकराया । शीशा मेज के पास ही गिरा था ।उसकी जान में जान आई उसनें वह शीसा उठाया और उसे याद आने लगा कि उसने उस में अपना हाथ घुसाया था उसने जल्दी से उस नें अपने हाथ उस शीशे में घुसाया।वह उछलकर दूर जा गिरा ।उसे जब होश आया तो उसके चारों और उसके माता-पिता खड़े थे ।
उसके पिता गुस्से में बोले तुम बहुत शरारती हो गए हो टप्पू हमें तुम्हें कहां कहां नहीं ढडा ।हर कमरे में तुम्हें ढूंढा पर तुम कहीं नहीं थी। कितना समय बीत गया है ?पता है इतनी रात हो चुकी है। तुम्हें ढूंढते ढूंढते परेशानी से बुरा हाल हो गया था। दादी को कितनी चिंता हो रही थी? पता है। और तुम दादाजी के कमरे में कर क्या रहे हो? यहां आने के लिए तो दादी ने तुम्हें मना किया था ना।शुक्र है तुम ठीक हो‌ पर तुम्हें दादी और हमारा कहना ना मानने की और ज़िद करने की सजा तो जरूर मिलेगी। मां बोली अब कुछ दिन तुम्हें बाहर का खाना खाने को नहीं मिलेगा और ना ही कोई चॉकलेट मिलेगी। घर का ही खाना खाना पड़ेगा। तुम अपना होमवर्क अभी छुट्टियों में ही पूरा करोगे नहीं तो तुम्हें खेलने जाने नहीं दिया जाएगा।तुम्हें चौकलेट भी नहीं मिलेगी।
वह खुश होकर बोला मुझे चॉकलेट नहीं चाहिए।आप ठीक ही कहते हो बाहर की गंदी चीजें नहीं खानी चाहिए ।मैं आपकी सारी बातें मानूंगा।
मां आप ठीक ही कहती हैं मैंने आपको बहुत ही परेशान किया आगे से मैं आपको कभी परेशान नहीं करूंगा।अचानक उसने देखा उसके पांव में पट्टी बंधी थी । उसकी टांग भी अभी तक ठीक नहीं हुई थी। वह तो अचेतन अवस्था में बुखार में वह सपना देख रहा था । ना ही मैं फेल हुआ और ना ही मुझे कुछ हुआ। एक बुरा सपना था जिसको देख कर वह डर गया था।अगर सपना हकीकत में बदल जाता तो तो मैं अपने स्वास्थ्य से भी हाथ धो बैठता और माता पिता के प्यार से भी वंचित हो जाता। जो कुछ हुआ अच्छा ही हुआ। मुझे समझ आ गया है। जो कुछ होता है वह अच्छे के लिए ही होता है मैं अपने माता-पिता को कभी परेशान नहीं करूंगा और हमेशा उनकी बातों को माना करूंगा। अचानक ही टप्पू को वही शीशा मेज़ के नीचे गिरा हुआ दिखाई दिया।वह सब एक सपना था यह सच?? टप्पू यह सब सोच ही रहा था कि तभी वहां दादी आ जाती है। टप्पू दादी से माफी मांगता है। और कहता है कि अब वो कभी भी ज़िद और शरारत नहीं करेगा दादाजी के कमरे में भी कभी नहीं आएगा। दादी मुस्कुराते हुए उसी माफ कर देती है। उसके माता-पिता उस में आए हुए बदलाव को देखकर बहुत ही खुश थे ।

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