एक और एक ग्यारह

बहुत समय पहले की बात है एक राजा था वह बहुत ही घमंडी था अपनी प्रजा को सताने में उसे बहुत ही मजा आता था। प्रजा उस के डर से थर-थर कांपते थी। वह किसी को सताना नहीं छोड़ता था। जरा सी गलती पर लोगों को कोढे लगवाता था। एक बार प्रजा के लोग आपस में मशवरा कर रहे थे कि राजा के अन्याय के विरुद्ध कैसे आवाज उठाई जाए। उन्होंने एक मंदिर के सामने एक बहुत ही बड़े युवा नवयुवक को देखा। वे सारे के सारे लोग मंदिर में दुआ करने के लिए आए थे। हे भगवान हमारी पुकार सुन लो। इस दुष्ट राजा के अत्याचारों से हमें निजात दिलाओ। आप ही कुछ उपाय करो। उसकी आवाज को एक नवयुवक ने सुना। वह लोंगों के पास जा कर बोला। भगवान के पास माथा टेक कर भगवान को तो आपने सब कुछ कह दिया इसके लिए तुम्हें भी एक होना पड़ेगा। सभी लोगों को मिलकर राजा के विरुध्द आवाज उठानी पड़ेगी। उस नन्हे से बालक के मुंह से इस प्रकार की बातें सुनकर बोले बेटा तुमने बात सोलह आने सच कही है। हम सभी को एक होना पड़ेगा। वह बोले हम उस इंसान को सब कुछ देने के लिए तैयार हैं जो हमें उस दुष्ट राजा के चुंगल से बचाएगा। राजा की अकल ठिकाने लगा देगा।
दीनू बोला आप सभी मुझसे बड़े हैं ठीक है मैं तुम्हारी बात को राजा जी के सामने रखूंगा इसके लिए मुझे अपने प्राणों की बाजी भी लगानी पड़ेगी तो मैं तैयार हूं लेकिन आप लोगों को इसके बदले में एक खेत मुझे देना पड़ेगा क्योंकि मैं बहुत ही गरीब इंसान हूं। हमारे पास छोटी सी खोली है। जिसमें मैं अपने बूढ़े माता-पिता के साथ रहता हूं। प्रजा के सभी लोगों ने दीनू की बात मान ली। आगे-आगे दीनू और उसके पीछे सभी प्रजा के लोग।
राजा ने जब उन सभी को आते देखा तो वह नाराज होकर बोला क्या बात है।? तुम सब लोग एक साथ। सारे लोगों को राजा को देखते ही सांप सूंघ गया। दीनू बोला राजा जी प्रणाम। राजा ने नहीं सुना। दीनू नें कहा राजा जी इतना अहंकार राजा को शोभा नहीं देता। आप तो प्रणाम का भी उत्तर नहीं देते। मैं प्यार से आपका अभिनंदन कर रहा हूं मगर आप तो कुछ और ही करने में मस्त हैं। आपकी प्रजा के सारे लोग ठीक ही कहते हैं कि हमारा राजा बड़ा अभिमानी है। मैंने सोचा था अपनें राज्य के राजा के बारे में लोंगों की राय गलत है। मै पहले चलकर राजा से मिलकर देखता हूं। राजा के बारे में जो कह रहे हैं वह ठीक है या नहीं। आपसे मिलकर लगा कि यह सभी लोग आपके बारे में जो कह रहें हैं वह सच है। राजा बोला तुम्हारी साहस को देखकर लगता ही नहीं तुम छोटे से तुच्छ मनुष्य हो।

एक राजा के सामने बोलने का साहस रखते हो बोलो क्या कहना चाहते हो? दीनू बोला मैं जो बात करूंगा वह सभी प्रजाजनों के सामने करूंगा। यह सभी लोग तो आपके सामने बोलने का साहस नहीं रखते। दीनू नें सभी प्रजाजनों को अंदर बुलाया। राजा अपने सिंहासन पर बैठ कर बोला बोलो तुम क्या कहना चाहते हो? आज मैं आपको युद्ध के लिए ललकारता हूं। मैंने सोचा कोई बड़ी बात होगी। राजा जोर-जोर से हंसने लगा। दीनू बोला आप हंसे तो सही। भला आज से पहले आप ऐसी हंसी नहीं हंसें होंगें। आज जो बात मैं आप को कह रहा हूं वह सुनो। मैं आपके साथ युद्ध करना चाहता हूं मगर अकेले में। यहां तो अपने बचाव में आप किसी को भी बुलवा लोगे। मैं भी अकेला और राजा जी आप भी अकेले। आपको सहायता के लिए किसी को भी नहीं बुलाना होगा। राजा बोला ठीक है मैं तो तुम्हारे साथ युद्ध करने के लिए अकेला ही काफी हूं। दीनूं बोला मैं यहां युद्ध नहीं करूंगा इसके लिए तुम्हें जंगल में चलना होगा। जहां पर हम दोनों हो या बाहर के लोग। ठीक है। राजा अकेला उसके साथ चलने लगा।

रास्ते में जब राजा और दीनूं चल रहे थे तो रास्ते में चोर मिले वे चोरी करने जा रहे थे। चोर बोले हमने आपकी बातें सुन ली है। हम चोरी करने जा रहे थे मगर हम भी तुम्हारे साथ चलना चाहते हैं। हम भी अपनी आंखों से युद्ध देखना चाहते हैं। उन्होंने कहा ठीक है चलो। लेकिन चुपचाप चलना कुछ कहना मत। चोर भी उनके साथ चलने लगे। रास्ते में एक लंगड़ा आदमी चल रहा था। वह बोला क्या मैं भी तुम्हारा युद्ध देख सकता हूं? दीनू बोला ठीक है। लंगड़ा व्यक्ति भी उसके साथ चलने लगा। रास्ते में एक अंधा आदमी मिला मैंने आप लोगों की बातें सुन ली है। क्या मैं भी युद्ध देखने चल सकता हूं? दीनू बोला ठीक है। चुपचाप चलना।रास्ते में एक साधु मिला। साधु बोला दीनू बेटा तुम्हारा साहस देख कर मैं भी हैरान रह गया। क्या मैं भी तुम्हारे साथ चल कर युद्ध देखना चाहता हूं? दीनू नें कहा बाबा जी प्रणाम। आप हमारे साथ चल सकतें हैं। साधु चोर लंगड़ा और अंधा ये चारों साथ साथ चलनें लगे।

एक घने जंगल में पहुंच चुके थे जंगल में जानवरों की भयंकर आवाजें आ रही थी तभी एक गुफा में सब के सब घुस गए अंदर चले गए। दीनूं बोला चलो राजा जी युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। राजा बोला ठीक है। राजा युद्ध के लिए तैयार ही हुआ था। चारों व्यक्ति युद्ध देखने की इच्छा से बैठे हुए थे तभी एक भयंकर चांन्डालनी वहां उपस्थित हुई। उसको देखकर सभी थर-थर कांपने लगे। राजा भी उसको देखकर थर-थर कांपने लगा। सभी लोग चांडालिनी को देख कर डरने लग गए थे। दीनूं बोला हमें जिंदगी में किसी से भी डरना नहीं चाहिए। चाहे वह चंडाल हो या चांन्डालनी। हमें गलत काम करने पर ही डरना चाहिए। तुम डरो मत। मैं तुम सब की जान की जिम्मेवारी मैं लेता हूं। राजा भी डर के मारे थर थर कांप रहा था।

चांन्डालनी बोली तुम सब मरने के लिए यंहा पर आ चुके हो। मैनें के लिए तैयार हो जाओ पहले मैं किसे खांऊ? दीनू सबसे आगे आ गया बोला। चांन्डालनी जी प्रणाम। वह दीनूं को बोली तुम्हारे जज्बे को सलाम। दीनूं बोला पहले हमारी बात सुनो। तब तुम मुझे सबसे पहले खाना। वह बोली अच्छा क्या कहना चाहते हो? कहो दीनूं बोला मैं राजा के साथ यहां युद्ध करने आया हूं। सारी प्रजा के सामने मैंने कसम खाई है कि मैं राजा को हरा दूंगा। जब मैं राजा को हरा दूंगा तब राजा अपना घमंड भूल जाएगा और वह प्रजा को सताना छोड़ देगा। राजा ने कसम खाई है कि अगर वह मुझे हरा देगा तो है एक अच्छा राजा बन जाएगा इसके लिए मैं राजा के साथ युद्ध करना चाहता हूं। चांडालिनी बोली ठीक है अगर राजा हार गया तो मैं उसे खा जाऊंगी। दीनूं बोला तुम युद्ध देखो। चांन्डालनी भी युद्ध देखने बैठ गई। काफी देर तक राजा के साथ युद्ध चलता रहा। दीनू ने राजा को युद्ध में हरा दिया। राजा अपने आप को असहाय और लाचार महसूस कर रहा था। उसका सिर लज्जा के मारे झुक गया था।
चांडालिनी बोली पहले सबके सामने दीनू के आगे सिर झुकाए। राजा ने दीनूं के आगे सिर झुकाया। चांन्डालनी बोली मैं वादे के मुताबिक राजा को सबसे पहले खाऊंगी क्योंकि अब तो राजा हार भी गया है। वह राजा को खाने ही जा रही थी तभी दीनू आगे आ गया बोला नहीं तुम राजा को नहीं खा सकती। मैं राजा के साथ युद्ध करना चाहता था। मैं राजा को कोई नुकसान पहुंचाते हुए नहीं देख सकता। क्योंकि वह एक राजा है। राजा को अपनी प्रजा की बहुत जरूरत होती है। राजा को अपनी प्रजा को संभालना पड़ता है। दीनूं बोला मैं तो अकेला हूं। मेरे पूरे मां-बाप है। मैं अपने बूढ़े मां बाप को राजा जी के हवाले कर दूंगा। मैं मर भी जाऊंगा तो केवल मैं ही मारूंगा क्योंकि सब लोगों का भला हो जाएगा।दीनूं के इतने साहस भरे शब्दों को सुनकर चोर आगे आ गया बोला नहीं तुम मुझे खाओ। इतने दिनों तक चोरी करते मैंनें इतना बुरा काम किया है अगर मैं इस बहादुर नेक इंसान के लिए अपने आप को कुर्बान कर दूं तो मैं समझूंगा कि इतने दिनों तक जो मैं चोरी करता रहा उसके लिए अगर मैं एक नेक काम करते मर भी गया तो मैं खुशी-खुशी मरने के लिए तैयार हूं। उसकी बातों को सुनकर अंधा आगे आ गया और बोला। तुम सब पीछे हट जाओ मैं अंधा हूं मैं तो बिल्कुल बेकार इंसान हूं। अगर आज मैं भी मर गया तो अपने आप को महान समझूंगा। मैंने तुम सभी को बचाने के लिए मैं अपने प्राणों की बाजी लगा दूंगा। साधु बाबा आगे आकर बोले मैं तो इधर उधर भगवान को खोजते खोजते ढूंढ रहा थाह भगवान के रूप मे मुझे एक फरिश्ता मिल गया जो अपने प्रजाजनों की भलाई करनें के लिए अपनी जान न्योछावर करने को तैयार हो गया। और तो और लंगड़ा चोर यह सभी जान देने चले हैं। इन सभी की जगह मैं मरने के लिए तैयार हूं। चांन्डालनी बोली साधु बाबा को मैं नहीं खा सकती। एक अच्छे इंसान की जान मैं नहीं ले सकती। वह बोली अंधा लंगड़ा चोर तुम तीनों में से किसी एक को ही खाऊंगी। दीनू आगे आकर बोला नहीं यह सभी मेरे साथी हैं। तुम मुझे खाओ। अगर आज आप इन सभी को खाओगी तो मेरी अन्तरआत्मा मुझे धिक्कारती रहेगी। मैं इन सभी लोगों को यहां पर लाया हूं।

चांन्डालनी बोली दीनूं बेटा तुम बहुत ही दयालु इंसान हो। तुम्हारी इतनी बहादुरी देखकर और सबकी इतनी पक्की दोस्ती देख कर मैं हैरान हूं। तुम सब एक हो। तुम सब में एकता है। तुम्हारी दोस्ती को कोई नहीं तोड़ सकता।

मैं राजा को सचमुच ही खाना चाहती थी। तुमने सभी में एकता की मिसाल कायम कर दी है। जाओ मैं तुम सभी को छोड़ती हूं। यह कहकर चांन्डालनी वंहा से अदृश्य हो गई। राजा वापस नगर में अपने मोहल्ले में लौट चुका था। वह सब समझ चुका था। प्रजा के लोग अपने राजा को वापस आए देखकर मुस्कुराए। राजा बोला मैं इमानदारी का जीवन व्यतीत करूंगा। तुम्हारी समस्याओं को ठीक ढंग से सुना करुंगा। आज मैंने अंतरात्मा की गहराइयों से जान लिया है कि अगर हमें अपने प्रजा की भलाई के लिए अपने प्राणों की बाजी भी लगानी पड़े तो मैं कभी भी पीछे नहीं हटूंगा। इस नन्हे से फरिश्ते नें मुझे सच्चाई से अवगत कराया। आज से मैं हमेशा लोगों की भलाई के लिए कार्य करूंगा। राजा ने दीनूं से कहा जब तुम बड़े हो जाओगे तब मैं तुम्हें ही राजा बनाऊंगा। तुमने मेरा सही मार्गदर्शन किया है। आज से तुम्हारी पढ़ाई का सारा खर्चा मैं उठाऊंगा। राजा ने अंधे को आंखें दिलवा दी थी। लंगड़े को अस्पताल में भर्ती करवा कर उसकी टांगें ठीक करवा दी थी। चोर को कहा कि तुम भी सच्चाई के मार्ग पर चल पड़े हो। साधु तो अपना सब कुछ त्याग कर तपस्या करनें चले गए थे। दीनू ने सभी को सच्चा रास्ता दिखा दिया। प्रजा के लोगों ने अपने वादे के मुताबिक एक खेत दीनूं को दान में दिया। सभी खुशी खुशी से रहने लगे। चारों तरफ खुशी का वातावरण छा गया। सभी प्रजाजन खुशी खुशी रहने लगे।

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