करनी का फल

एक छोटे से कस्बे में एक व्यापारी रहा करता था।
व्यापार के सिलसिले में उसे दूर-दूर तक जाना पड़ता था।
सामान लाने-ले जाने के लिए उसके पास दो टट्टू थे—
एक का नाम था कालू और दूसरे का नाम था बालू।
दोनों व्यापारी के बहुत पुराने साथी थे।

कालू सीधा-सादा और मेहनती था,
जबकि बालू थोड़ा स्वार्थी स्वभाव का था।
व्यापारी दोनों को बहुत प्यार करता था,
उन्हें समय पर चारा देता और प्यार से सहलाता था।

एक दिन व्यापारी को व्यापार के लिए दूर जाना था।
उसने कालू और बालू को आवाज़ लगाई—

“कालू! बालू! जल्दी तैयार हो जाओ,
आज हमें दूर तक जाना है।”

आवाज़ सुनते ही दोनों टट्टू चौकन्ने होकर खड़े हो गए।

कालू अचानक बोला—
“भाई बालू! आज तो मुझे तेज़ बुखार है।
मुझसे चला भी नहीं जा रहा।
आज तू ही मेरी थोड़ी मदद कर देना।”

बालू बोला—
“भाई, तू चिंता मत कर।
हम धीरे-धीरे चलेंगे।”

कुछ देर बाद व्यापारी ने दोनों टट्टुओं पर सामान लादा और यात्रा पर निकल पड़ा।

रास्ता लंबा था।
व्यापारी चलता जा रहा था और दोनों टट्टू भी उसके साथ आगे बढ़ रहे थे।

कुछ दूर जाने के बाद कालू थककर बोला—

“भाई बालू, मुझसे अब यह बोझ नहीं उठाया जा रहा।
मेरी हालत बहुत खराब है।
अगर तू मेरा थोड़ा सामान उठा लेगा,
तो शायद मैं रास्ता पूरा कर पाऊँगा।
अपनी दोस्ती का फ़र्ज़ निभा दे भाई।”

बालू ने उसकी बात ध्यान से सुनी,
लेकिन उसकी मदद करने के बजाय बोला—

“नहीं भाई, मैं तुम्हारा सामान नहीं उठा सकता।
मुझे अपनी जान प्यारी है।
तुम्हारे बिना भी मैं ज़िंदा रह लूँगा।”

कालू को बालू की बात सुनकर बहुत दुख हुआ।
उसे अपने दोस्त से ऐसी उम्मीद नहीं थी।

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
बीमारी और भारी बोझ के कारण उसके कदम लड़खड़ाने लगे।
वह दर्द से कराहता हुआ चल रहा था।

अचानक उसका पैर फिसला और वह लुढ़कता हुआ नाले में जा गिरा।

व्यापारी ने पीछे मुड़कर देखा तो कालू वहाँ दिखाई नहीं दिया।
उसने बहुत खोजा, लेकिन कालू का कहीं पता नहीं चला।
आख़िर वह निराश होकर आगे बढ़ गया।

अब व्यापारी ने कालू का सारा सामान बालू पर लाद दिया।

भारी बोझ पड़ते ही बालू के कदम भी लड़खड़ाने लगे।
वह मन ही मन पछताने लगा—

“काश! मैंने कालू की थोड़ी मदद कर दी होती।
आज मुझे इतना भारी बोझ न उठाना पड़ता।
मैंने अपने दोस्त के साथ अच्छा नहीं किया।”

अब उसे अपने स्वार्थ पर बहुत शर्म आ रही थी।
उसे कालू की पीड़ा का एहसास होने लगा।

कुछ दूर चलने के बाद भारी बोझ के कारण बालू भी थककर धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ा।
उसकी एक टाँग में गंभीर चोट लग गई।

वह अपने दोस्त कालू को याद करके रोने लगा।

उसी रास्ते से व्यापारी का एक मित्र गुजर रहा था।
उसने नाले के पास कालू को घायल अवस्था में देखा।
उसने कालू को पहचान लिया और तुरंत उसे वहाँ से उठाकर अपने घर ले गया।

उसने कालू के घाव पर मरहम लगाया,
उसे पानी पिलाया और प्यार से उसकी देखभाल की।

कुछ दिनों बाद वह कालू को लेकर व्यापारी के पास पहुँचा।

अपने टट्टू को जीवित देखकर व्यापारी बहुत खुश हुआ।
उसने कालू को प्यार से सहलाया।

बालू ने कालू को देखा तो उसकी आँखों में आँसू आ गए।
वह बोला—

“भाई कालू, मुझे मेरी करनी का फल मिल गया।
जब तुमने मेरी मदद माँगी थी,
तब मैंने तुम्हारा साथ नहीं दिया।
आज मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया।”

कालू मुस्कुराकर बोला—

“भाई, गलती तो हुई है,
लेकिन गलती से सीख लेना ही समझदारी है।
हमें कभी अपने स्वार्थ के बारे में नहीं सोचना चाहिए।
मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देना ही सच्ची दोस्ती है।”

बालू ने सिर झुकाकर अपनी गलती स्वीकार की।

उस दिन से दोनों ने ठान लिया कि
वे कभी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे
और मुसीबत में हमेशा एक-दूसरे की मदद करेंगे।

🌸 सीख

जैसी करनी, वैसी भरनी।
हम जैसा कर्म करते हैं,
वैसा ही उसका फल हमें मिलता है।
इसलिए स्वार्थ छोड़कर हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए।