
बहुत समय पहले क बात सुनाऊं बच्चों एक असुर था बलवान।
गजमुखासुर था उसका नाम।
धन दौलत का था उसको अभमान।
मन में इच्छा था क उसके सबसे शिक्तशाली बन जाऊं ।
देवताओं को भी अपने वश में करके अपने पर इतराऊं ।
भगवान शव को प्रसन्न करने का मन में था ठान लया।
राजपाट छोड़ छाड़ कर वन को प्रस्थान कया।
भूखा प्यासा रह कर की वष तक तप कया।
भगवान शव को प्रसन्न करने का प्रण लया।
प्रसन्न हुए भोले बाबा उसके समीप आए।
मांगों क्या वरदान चाहए ,ये कह कर मुस्कु राए।
कर दो पूण मेरी अचना।
आप से है कर बद्ध प्राथना मेरा कोई भी बाल न बांका कर पाए।
मुझे कोई भी हरा न पाये,कोई भी शास्त्र मुझे छू न पाए।
शव जी ने उसकी पूण अभलाषा।
उसके जीने की जग गई थी आशा।
शिक्त पा कर वह फुला नहीं समाया।
घमंडी बन कर था अकड़ा कर चल्लाया।
बल पा कर वह सब का करने लगा अपमान।
भूल गया वह अपना रहा सहा धम ज्ञान।
देवी देवताओं पर लगा करने अत्याचार।
चाहता था सभी देवी-देवता उसको पूजे बार-बार।
डर कर सभी देवी-देवता शव जी की शरण में आए।
अपने जीवन की रक्षा क दुहाई लगाए।
शव ने गणपत को कहा , गजमुखासुर के चु ंगल से सभी का करो कल्याण।
उसके संग युद्ध कर चूर कर दो उसका अभमान।
गणेशजी और गजमुखासुर में युद्ध हुआ घमासान।
घायल हो कर भी गजमुखासुर नहीं हुआ परेशान।।
अंत में हार कर गजमुखासुर ने मूषक का रुप बनाया।
गणेशजी पर खुद कर दौड़ लगाता।
ज्यों ही गणेश जी र आक्रमण करने था आया।
गणेशजी ने कूद कर उस पर अपना आसन जमाया।
हार कर टूट चुका था उसका अभमान।
गणेशजी जी ने उसे बनाया अपना प्यारा वाहन।
नया रुप पा कर वह भी मन ही मन मुस्कराया।
अपनी करनी पर पछताया।
गणेशजी का वाहन बन कर खुशी से मुस्कु राया।
उनका वाहन बन आजीवन भर उनका साथ नभाया।
सीख।
बल पर कभी न करना मान।
नहीं तो मट्टी में मल जाएगा सम्मान।
जनहत में जब करोगे काम।
हर जगह बढ़ेगा तुम्हारा नाम।