नेक उदयसेन

राजा केतभानु के छोटे से राज्य में प्रजा बहुत ही खुशहाल थी। राजा का वज़ीर उदयसेन बहुत ही नेक दिल इंसान था। वह  हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता था।उसके पास जो कुछ भी बचता था वह सब गरीबों में बांट दिया करता था। राजा भी अपने वज़ीर पर बहुत विश्वास करता था। पर महल में कुछ मँत्रियोंं को उनकी दोस्ती नहीं भाई। राजा के छोटे भाई कुमार को बहला-फुसला कर उन्होंने  राजा और वज़ीर के बीच में दरार डलवा दी । 

कुछ कर्मचारियों नें राजा के भाई उदय सेनको अपनी तरफ मिला लिया और साज़िश कर के वज़ीर पर चोरी का आरोप लगा कर  उदय सेन को उसके पद से और महल से बाहर करवा दिया।

उदयसेन बहुत ही नेक था पर उसने कभी यह सोचा भी नहीं था कि राजा उसे अपने महल  से जाने के लिए कह देगा । उसने तो राजा के कोष से कभी भी रुपए चोरी नहीं किए। उसके खजानें में से उसके अपने ही भाई और मंत्री रुपए  चुरा लेते थे। जो राजा पहले उस पर इतना विश्वास करता था आज उसने ही अपने महल से बाहर फेंक दिया। उसने सोचा कोई बात नही एक दिन जब राजा के अपनें हीे उसे धोखा देंगे तब पता चलेगा।

उदय सेन अपनी  पत्नी और बच्चे को लेकर उसी राज्य के एक कस्बे में एक छोटे से मकान में रहने लगा। वह मेहनत करके अपनी पत्नी  रुचिका और बेटे अभय का पालन पोषण कर रहा था। उसके पास अपने गुज़ारे लायक़ भी रुपया नहीं बचा था। एक दिन उसने अपनी पत्नी रुची को कहा कि मैं कुछ कमा कर ही   लाऊंगा तुम चिन्ता मत करो। सब कुछ समय के अनुसार अवश्य ठीक हो जाएगा।अपने घर से निकलकर वह एक घनें जंगल में चला गया। 

पेड़ पर बहुत ही  मीठे मीठे फल लगे हुए थ। हरे-भरे अमरूदों को देखकर उसका मन अमरूद खाने के लिए ललचानें लगा। वह सोचनें लगा कि मैं इन अमरुदों को ले जाकर बाजार में बेच दूंगा ।मुझे कुछ रुपया तो मिलेगा अगर आज कुछ रुपया बचाया होता तो आज उसे यूं दर-दर नहीं भटकना पड़ता। जब  वह अमरूदों को तोड़ने ही जा रहा था उसने कुछ व्यक्तियों को बातें करते सुना। वे कुल मिलाकर 12 लोग थे। उनकी बातों से लगता था कि वे किसी खास जगह जा रहे थे। वह चुपचाप उनकी बातें सुनने लगा। वह आपस में कह रहे थे कि जल्दी ही यहां से चलो। वह भी पेड़ से उतरकर चुपके से उन सेे छिपते  छिपाते चलने लगा। उस नाव में बहुत से और लोग भी सवार थे।वे बारह लोग एक साथ बैठ कर आपस में बातें करनें लगे। उन्होंनें नाव में नदी पार की । मंत्री ने भी उनके साथ साथ चुपके चुपके पत्थर की ओट से छिपते छिपाते नदी पार कर ली। वह भी जल्दी से नदी के दूसरे छोर पर पहुंच गया था । वहां पर झाड़ियों के पीछे छिप गया। वहां पर बहुत घनी झाड़ियों के पीछे एक बहुत ही बड़ी चट्टान थी। उस चट्टान को देखकर लगता था कि वह बहुत ही खास  होगी। वह बहुमूल्य पत्थर से तराशी गई थी। कोई मामूली चट्टान नहीं थी। उसको हटानें की जितनी कोशिश कर लो वह वहां से खिसक भी नहीं सकती थी। वे सभी 12 आदमी उस चट्टान के पास पहुंच गए। उन्होंने संगीत के स्वर में ध्वनि निकाली। चट्टानों के बादशाह चट्टानों के बादशाह हम आए हैं तेरे द्वारे। हमें जल्दी शीश महल में पहुंचा। हमें शीश महल में पहुंचा। उन्होंने उस पथरीली चट्टान के चरण स्पर्श किए। वहां से उनके इतना कहते ही चट्टान हिल गई ।जल्द बाजी में उनकी चाबी नीचे  गिर गई। उस वजीर नें वह चाबी उठा ली। वह भी उनके पीछे-पीछे हो लिया। चुपचाप इनके पीछे-पीछे शीश महल में पहुंच गया। अंदर जाकर वे लोग एक बड़े कमरे में बैठकर बातें करनें लगे। 

उनके पास हीरे मोती जवाहरात थे। उदयसेन को पता चल चुका था कि वह सब के सब चोर हैं। उनमें से एक  बोला कि इतना माल इकट्ठा हो गया है इसे जल्दी से यहां से कहीं और रख देंगे। उन में से एक नें अपनें मुखिया को कहा कि एक चाबी तो आप के पास है।  आपनें हमें बारी बारी से चाबी रखने को दी थी। उन में से एक बोला जरा चाबी तो दे दो। मुखिया बोला मेरे पास तो अपनी चाबी है। मुखिया की ओर देख कर दूसरा व्यक्ति बोला शायद  मेरे हाथ से वह द्वार के बाहर गिर गई। उदय सेन डर के मारे कांपनें लगा। वह द्वार की ओट में ही छिपा था। हे भगवान‌ आज बचा ‌ले। मुसिबत की घड़ी में भगवान ही याद आतें है।

सभी के सभी उसकी तरफ गुस्सा भरी नज़रों से बोले। इस शीश महल की दो ही चाबीयां हैं। एक चाबी तो मेरे पास रहती है उनका मुखिया बोला । एक चाबी तुम बारी-बारी से रखते हो आज इस टपोरी की बारी थी। सबके सब बोले व्यर्थ की बातों में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए अगर हमें चाबी नहीं मिली तो हम शीश महल  से भी हाथ धो बैठेंगें। जिसके पास दो चाबी होती है उसकी ही सारी धन-दौलत होती है इससे पहले कि किसी को भी हमारी भनक भी लग जाए हमें वह चाबीयां जल्दी से जल्दी ढूंढ निकालनीं होगी।

 यह बात उदयसेन ने सुन ली थी । मुझे उस  संगीत की तरफ ध्यान देना होगा। मां से बचपन में सुना था कि चोर लुटेरे अक्सर किसी गुढ शब्दों का प्रयोग करतें हैं। शायद उस संगीत में ही  शीश महल कैसे खुलेगा यह राज छिपा होगा। ध्यान लगा कर उस ध्वनि को सुनता हूं। वह उस दिन किसी न किसी तरह गुफा से बाहर उन लटेरों के पीछे पीछे निकलने में सक्षम हो गया। अच्छा ही हुआ उन लुटेरों  की उस पर नजर नहीं पड़ी। । उसने तो आज उनकी आवाज भी सुन ली। वह कह रहे थे कि ना जाने चाबी कहां गई।

जिसको चाबी मिली होगी  वह उस गुफा मे छानबीन करनें  जरूर आएगा। हमें हर व्यक्ति पर नजर रखनी होगी।

राजा का भाई बहुत ही शातिर था। उसने  एक दिन चुपके से उदयसेन की बातें चोरी छिपे कर सुन ली । वह अपनी पत्नी से कहा रहा था तुम्हें चिन्ता करनें की कोई आवश्यकता नहीं। मुझे जंगल में कुछ खुफिया सुराग मिलें हैं। मैं उन का पता लगा कर ही रहूंगा। राजा का भाई भी छिप छिपकर कर उदयसेन का पीछा करता रहता था।

एक दिन राजा के  भाई ने उन चोरों का पीछा किया । वे जंगल में एक छोर पर  पंहुचा कर नदी के पास जाकर रुक गए। वहां पर बहुत ही सुंदर  बहूमुल्य चट्टान को देखकर हैरान हो गया। उसके मन में लालच उमड़ आया।यह तो बहुत किमती चट्टान होगी। यह पत्थर किनारे पर होता तो कितना सुन्दर लगता।यह तो राजा के महल में होना चाहिए। उसने  घर आ कर राजा को सारा किस्सा सुनाया। राजा नें अपनें महल में घोषणा कर कहा कि जो कोई भी उस पत्थर को वहां से हटा कर महल में लाएगा उसे राजा मुंह मांगा ईनाम देंगे।उसे पता चल गया था कि उस सरोवर में एक शीशमहल है।

उदयसेन ने भी  सोचा कि वह तो इस पत्थर को हटा सकता है उसके पास चाबी है . उस  चाबी के इस्तेमाल से यह चट्टान अपनी जगह से हट जाएगी लेकिन वहां पर शीश महल दिखाई देगा।  राजा के भाई ने सोचा क्यों न मैं ही इस चट्टान को यहां से हटा दूं। कहीं यह मेरे भाई का चहेता बाजी मार गया तो बना बनाया काम चौपट हो जाएगा। लोगों में बड़ी मुश्किल से  वजीर के प्रति कडुवाहट पैदा करनें के लिए उसनें ही तो सब को उकसाया था। मेरे भाई को तो यह सोची समझी चाल पता ही नहीं होगी।

 राजा का भाई  उस चट्टान को हटाने की  बहुत ही कोशिश कर रहा था। इतने में। उदयसेन जंगल से फल लेकर लौट रहा था। उस को चट्टान हटाता देख कर बोला इस चट्टान को हटाना बहुत ही जान जोखिम का काम है। तुम्हें कैसे पता चला कि इस पत्थर के पीछे एक शीश महल है । उदयसेन राजा के भाई कुमार से बोला। मैनें सुना है कि उस शीश महल का एक बड़ा राजा है। जिसके पास उस इस महल की चाबी होगी वह ही महल में पहुंच पाएगा । राजा का भाई बोला तो मैं शीश महल में अवश्य जाऊंगा और चाबियां लेकर आऊंगा। उदयसेन ने सोचा कि वह मजाक कर रहा होगा । उदयसेन को क्या पता था कि वह सचमुच में  ही उन डाकुओं का पता करते करते उनके पीछे लग गया ।एक दिन उसने उन डाकुओं की सारी बातचीत सुनी। डाकू आपस में कह रहे थे कि हम इस चट्टान को तब तक नहीं हटाएंगे पहले हम इस शीशमहल के मालिक कोषाध्यक्ष से जाकर चाबी ले आते हैं । यह सब राजा के भाई ने सुन लिया था। वह जैसे ही चाबी लेने के लिए बरगद के पेड़ के पास गए उन्होंने वंहा एक गड्ढे में कुछ दबाया हुआ था । राजा के भाई नरेंद्र ने उस गड्ढे में से चाबियां निकालते हुए उसे देख लिया। राजा का भाई बड़ा खुश हुआ कि आसानी से उसे शीश महल की चाबी मिल गई। वहां पर जाकर देखूंगा कि इस गड्ढे में क्या है? वह भी उन लोगों के  साथ शीश महल में घुस गया । वहां पर हीरे जवाहरात देकर उसकी मन में लालच आया उसने देखा वह गुफा से बाहर आते हुए कुछ लोग आपस में बोल रहे थे। वहाँ काफी अंधेरा था ,वह चुपचाप वहां छिप गया। उन में से एक बोला जल्दी से चाबी यहां दबा देते हैं। उन्होंने वहां चाबी रख दी । राजा के भाई ने यह सब देख लिया। वह समझ गया कि हो न हो चाबी इसी गड्ढे में होगी। उनके जाने के बाद जैसे ही उसने चाबी निकालने और के लिए गड्ढे में हाथ डाला उसे सांप ने काट खाया। वह नीचे गिर पड़ा। 

  राजा का बेटा जब टहलनें के लिए घर से निकला तो रास्ते में उसके की साथी मिले। वह राजा के बेटे को कहनें लगे हम हर रोज तुम्हारे चाचा को यहां से जाते हुए देखते हैं।वह हर रोज सुनसान रास्ते से शुरू जानें कहां जाते हैं। तुम्हें देख कर इसलिए पुंछ ही लिया।राजा का बेटा बोला ऐसी कोई बात नहीं वह तो एकदम कुशल हैं। राजा का बेटा सोचनें लगा चाचा ने  जानें कहां जायेंगे आज वक्त भी है चल कर स्वयं पता करता हूं।वह जल्दी कदम बढ़ाने और लगा।अचानक राजा का बेटा भी वहां से गुजर रहा था। उसने जब चाचा को सड़क पर बेहोश देखा। अचानक उसकी नज़र चाबी पर पड़ी। उसने अचानक चाबी उठाई।उसने समझा चाचा बेहोश हो कर गिर पडें हैं।

उनकी जेब से यह चाबी नीचे गिर गई होगी। उसने अपनी गाड़ी में चाचा को  लिटाया। राजा के पास जाकर उसका बेटा बोला मेरे सामने चाचा बेहोश होकर गिर पड़े ।वह कह रहे थे कि लुटेरे शीश महल चाबियां मुझे यह समझ में नहीं आया वह क्या कहना चाहतें हैं। राजा नें वैद्य को बुला कर पूछा इन्हें क्या हुआ है। वैद्य बोला  इन्हें जहरीले सांप ने काट खाया है 5 घंटे के अंदर अगर वह सांप नहीं मिला तो इनकी जान चली जाएगी। राजा अपने भाई को बहुत ही प्यार करता था। उसने अपने महल में घोषणा कर दी कि जो कोई मेरे भाई की जान को बचाएगा उसे मुंह मांगा इनाम दिया जाएगा। 

गाड़ी में किसी व्यक्ति को  ले जाते हुए लुटेरो नें देख लिया। उन  को पता चल गया था कि शीशमहल की चाबी उस लड़के के ही पास है। वह गाड़ी किसकी है। उन चोरों नें सब पता कर लिया।चाबी लेकर  जो गया है वह राजा का बेटा है ।यह सब नज़ारा उदयसेन देख रहा था। 

उदयसेन ने सोचा कि मैं ही  राजा के भाई की जान को बचाऊंगा ।राजा के पास जाकर बोला  भले ही आप मुझ से कितने भी नाराज हो मैं आप के भाई की जान अवश्य बचाऊंगा

संकट की घड़ी में आप का साथ अवश्य ही दूंगा भले ही आप के मन में मेरे प्रति कितनी भी कड़वाहट क्यो न हो,मैंनें आप का नमक खाया है। मैं आप के भाई की जान अवश्य बचाऊँगा। पहले मेरे पास उस चाबी को ला कर दो। राजा के बेटे ने उसे चाबी ला कर दे दी। राजा का बेटा बोला इस चाबी का क्या माजरा है? उदयसेन बोला तुम्हें यह सब मैं बाद में बताऊंगा।  वह गड्ढे के पास जाकर बोला इस महल के कोषाध्यक्ष आप को हाथ जोड़कर प्रणाम। मेरे इस दूत को क्षमा करो क्षमा करो। आप अपनी चाबी ग्रहण करो ग्रहण करो। 

 इस महल का मुखिया  कोषाध्यक्ष एक तक्षक नाग था।  वह मनुष्यों की भाषा में बोला तुम मुझे सच्चे इंसान लगते हो जो कोई भी  आज तक यहां आया उसने चाबी उठाने की ही कोशिश की।मुझे प्रणाम नहीं किया। बोलो क्या चाहते हो?। 

 उदयसेन बोला कि इस राजा के भाई की जान बख्श दो । वह तक्षक नाग बोला यह तो लालची है। वजीर बोला कि वह आपके सामने अपनी गलती स्वीकार करेगा। आप इसका जहर चूस लो। तक्षक नाग ने कहा कि चाबी आपके पास है। जिसके पास चाबी होती है उसकी सहायता मैं करता  हूं। चलो मैं इसका सारा जहर चूस लेता हूं। तक्षक नाग ने राजा के भाई का सारा जहर चूस लिया। उस को मालूम हो गया था कि जहरीले नाग नें उसे डसा था। जब उसे होश आया तो उसने हाथ जोड़कर तक्षक नाग से क्षमा मांगी। अपनी आंखों के सामने वजीर को देख कर चौंका अपनें भाई को बोला आप नें  इन्हें महल में क्यों आने दिया?राजा बोला कि इन्होंने ही तो तेरी जान बचाई है ।तुम तो जिंदा ही नहीं बच सकते थे इसकी वजह से ही तुम जिंदा हो वर्ना तुम तो मर गए होते।राजा ने सारी बात अपने भाई को सुना दी।

 यह सुन कर  उसके भाई को अपनी करनी पर बहुत  पछतावा हुआ। वह अपने भाई को बोला कि भाई मैंने आप दोनों में ग़लतफ़हमियाँ पैदा की थी । मेरी वजह से ही इन्हें महल से जाना पड़ा मुझे इन से ईर्ष्या हो रही थी कि आपने मुझे वज़ीर क्यों नहीं बनाया। आपने इनमें ऐसा क्या देखा जो मुझ में नहीं आज मैंने जाना आपने वज़ीर चुनने में कोई गलती नहीं की । मुझे माफ कर दो आप इनको वापस महल में बुला लो। मैं इस महल में इन्हें वापस लाने के लिए स्वयं इनके घर जाऊंगा मैं सोचता था कि आप मुझे ही राजा बनाओगे लेकिन एक दिन जब आप सभा में सब को संबोधित कर कह रहे थे कि मेरा वज़ीर उदयसेन बहुत नेक दिल इंसान हैं तब यह सुन कर मैं आग बबूला हो गया।मैनें आप से कुछ नहीं कहा मैनें  प्रजाजनों के साथ मिल कर उन्हें रुपयों का लालच दे कर उन्हें ऐसा करनें के लिए उन्हें विवश कर दिया।राजा को अपनी गलतियों का एहसास हुआ वह अपनें भाई को बोला पहले वजीर से क्षमा याचना करके उन्हें आदर सहित महल में वापिस नहीं बुलाओगे तब तक मैं भी तुम्हें क्षमा नहीं करूंगा।अभी जाओ और उस को समझा बुझाकर वापिस महल में ले कर आ।

राजा का भाई जब के घर पहुंचा उसके चरणों को पकड़कर क्षमा मांगते हुआ बोला कि आप भी मेरे बड़े भाई की तरह हो। आप मेरी गलतियों को जब तक क्षमा नहीं करेंगे तब तक मैं कभी भी अपने  आप को माफ नहीं करूंगा ।राजा नें वजीर को उसकी ईमानदारी पर मुंह-मांगा ईनाम दिया।

  उदयसेन चाबियां लेकर जा रहा था तो  उसे लुटेरों नें देख लिया वे उनका पीछा करने लगे उन्होंने सोचा की चाबियां राजा के बेटे के  पास है। राजा का बेटा जब महल की ओर जा रहा था तो लुटेरों ने उसे पकड़ लिया। उसे होश आ गया था। वे आपस में कहनें लगे कि अंदर चल कर इस से चाबियां  के बारे में पता करेंगे। वह उससे शीश महल ले गए। उस से पूछा कि जल्दी से बताओ की चाबियां कहां है? वह बोला मुझे किसी चाबी का पता नहीं है। उन्होंने उसकी खूब पिटाई की। उन लुटेरों नें उसे अंदर शीश महल में बंद कर दिया। उस से चाबी छीन ली। उसकी पैंट की जेब में चाबी मिल गई थी। वह उसे अंदर बंद करके चले गए। जब राजा का बेटा घर नहीं आया तो  राजा अपने बेटे के लिए बहुत परेशान हुआ। 

 उदयसेन  राजा से बोला  चाबी आपके बेटे के पास थी। उसे वह लुटेरे शीश महल के अंदर ले गए होंगे। राजा ने ऐलान किया कि जो मेरे  बेटे को शीश महल से छुड़ाकर लाएगा उसे में मंत्री पद पर नियुक्त कर दूंगा। वजीर ने सोचा कि मैं ही इस महल में जाने का  प्रयत्न करता हूं। वह पहले उस गुड्डे के पास पहुंच। गया। महल के कोषाध्यक्ष के पास जा कर बोला आप को शत शत प्रणाम। राजा को  बोला कि मैं इस शीश महल का कोषाध्यक्ष हूं। इस शीश महल के राजा को उन लुटेरों ने मार डाला। इस महल के राजा को उन लुटेरों ने मार डाला। यह सब खजाना मेरे राजा का है। एक ऐसा कमरा है जहां पर यह अपना चोरी किया हुआ माल रखते हैं। जल्दी से बेटा तुम इन चोरों को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दो और उस खजाने को  राजा को सौंप दो। इस महल को तुम संभाल लेना। उदयसेनबोला कि मैं कैसे उस गुफा में जाऊंगा।तक्षक नाग बोला तुम कहना चट्टानों के बादशाह चट्टानों के बादशाह हम आए हैं तेरे द्वारे तुझे हाथ जोड़कर विनती करने आए हैं। खजाने को सही व्यक्ति के पास पहुंचाने आए हैं। अपना कर्तव्य निभाना अपना कर्तव्य निभाना। तुम्हारे यह कहते ही दरवाजा खुल जाएगा। तुम अंदर चले जाना  राजा के बेटे को बचाने अंदर चला गया। उसने उस चाबी से वह शीश महल खोला। उदयसेन जब वहां पहुंचा राजा का बेटा खुशी खुशी से मंत्री के गले लिपट कर बोला, आप जल्दी जल्दी से यहां से मुझे निकाल कर ले चलो। यदि वह लुटेरे आ गए तो वह हमें जिंदा नहीं छोड़ेंगे। वह उदयसेन को कह ही रहा था इतने में वह गुंडे, वहां पर पहुंच गए थे। वह बोले कि हमें पता था कि इस महल की दूसरी चाबी तुम्हारे पास है। हमें हमें पता था कि तुम इस को बचाने अवश्य आओगे। उदयसेन बोला कि हां तुमने ठीक सुना। उन्होनें उन दोनों को रस्सी से बांध दिया। उदयसेन बहुत ही होशियार था। वह अपनें साथ छोटी सी  कांच की चूडीलाया था। उसने वह चूडी अपनी कमीज की जेब में डाली हुई थी। वह अपनें साथ नींद की गोलियां भी लाया हुआ था। लुटेरे उदयसेन को बोले चलो तुम्हारे चहेते को हमनें रस्सी से बांध दिया है। पहले तुम हमें शर्बत पेश करो। उदयसेन तो यही चाहता था कि कब उसे ऐसा मौका मिले उस की मुराद तो बिना कुछ किए ही समस्या हल हो गई। 

सब के सब डाकू जश्न मना रहे थे। उदयसेन ने   चुपके से नींद की गोलियां उन के शर्बत में डाल दी। वे जब मस्ती से झूम रहे थे तभी 

उदयसेन नें  राजा के बेटे की रस्सी  काच की चूडी से काट दी। उसने झूक कर अपनें मोजे में से कांच की चूड़ी निकाली। उसनें उस कांच की   चूड़ी से राजा के बेटे की रस्सी खोल दी। राजा के बेटे के हाथ खुलते ही वजीर नें उसे कहा कि तुम जल्दी   से उन सब के हाथ बांध देना। वे सभी बेहोश होकर जैसे ही गिर पड़े। राजा के बेटे ने सब के हाथ बांध दिए। राजा के बेटे नें वजीर के हाथ भी खोल दिए। वह दोनों जल्दी ही महल से बाहर निकल गए।  उन्होनें वहां ताला लगाया। राजा नें वजीर को अपनें महल में वापिस बुलवा लिया। वह महल में आकर रहने के लिए इस लिए माना कि राजा के भाई कुमार नें अपनें भाई से कहा आप उदयसेन को ही वजीर का पद सौंपे। 

राजा के सिपाहियों  ने उन बारह के बारह डाकुओं को पकड़ लिया और पकड़ कर कैदख़ाने  में बंद कर दिया। उन से सारा का रुपया राजा को ला कर सौंप दिया। उदयसेन महल में आकर रहने लगा।राजा के भाई नेंउदयसेन को कहा कि तुम ही  हमारे वज़ीर हो। राजा का भाई बोला कि मुझे वज़ीर के पद पर तैनात नहीं होना है।आप के बाद मैं ही राज्य की बागडोर सम्भालूंगा। उदयसेन बोला आज मैं बहुत खुश हूं। आपको पता चल गया है कि मैं गलत नहीं था। राजा ने  नें उसे मुंह मांगा ईनाम दिया।वह खुशी खुशी महल में रह कर काम करनें लगा। सभी के चेहरों पर खुशी की लहर उमड़ पड़ी। 

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