पंडिताइन की सूझबूझ

एक पंडित जी थे ।वह अपने मोहल्ले में पूजा-पाठ के लिए बहुत प्रसिद्ध थे ।उन्हें लोग दूर-दूर से पूजा पाठ के लिए अपने घर ले जाते थे। पंडित भी सभी घरों में पूजा पाठ के लिए जाते थे। जो कुछ मिलता था उसी से वह अपना तथा अपने परिवार का पालन पोषण करते थ।े अब की बार जब पूजा के लिए गये तो उसके गांव के जमींदार ने एक गाय भी दान में दी ।वह पंडित भोले-भाले थे वह चतुर नंही थे।जब वह सारा सामान लेकर घर को जा रहे थे जमीदार ने उन्हें गाय को देते हुए कहा कि मैं यह गाय तुम्हें दक्षिण़ा स्वरूप दे रहा हू।ं पंडित जी इस बार इन्कार नहीं कर सके गाय को लेकर रास्ते में वह काफी दूर जा चुके थे। बहुत थक भी बहुत चुके थे ।उन्होंने गाय पर अपना समान रख दिया जब वह रास्ते से जा रहे थे तब उनको तीन ठगों ने देख लिया ।वह आपस में विचार विमर्श करने लगे कि इस पंडित जी से गाय को कैसे हासिल किया जाए, इसके लिए उन्होंने एक योजना बना ली थी ।वह थोड़े थोड़े फासले में तीनों जाकर खड़े हो गए थे जैसे ही

वो रास्ते से गुजर रहे थे पहला ठग उनसे बोला पंडित जी राम-राम ।सुबह-सुबह गधे को कहां ले जा रहे हो ?पंडित जी को अपनी गलती का एहसास हुआ उन्होंने अपना सामान अपने कंधे पर रख दिया और धीरे-धीरे कदमों से आगे जाने लगे तभी उन पंडित जी को दूसरे ठग ने कहा तुम गधे को क्यों ले जा रहे हो ?पंडित जी ने कहा यह गधा नहीं है यह कहते हुए वह आगे निकल गए ।थोड़ा फासले पर एक दूसरा ठग मिला उसने पंडित जी को कहा पंडित जी आप गधे को कहां ले जा रहे हो ?तब पंडित जी ने गाय को ऊपर से नीचे की ओर देखा बोले भाई यह गधा नहीं है तुम्हारी मति क्या मारी गई है जो तुम गाय को गधा कह रहे हो थोड़ी दूर आगे जाने पर उसे तीसरा ठग दिखाई दिया तीसरे ठगने भी उससे वही बात कही परंतु तीसरे ठग की बात सुनकर पंडित जी हैरान रह गए और सोचने लगे हो ना हो जमीदार ने मुझे गधा ही दान में दिया है।मुझे उस जमीदार ने बेवकूफ बनाया और एक गधे को मेरे पल्ले मढ दिया परंतु अब क्या हो सकता था ?ःवह गाय को जैसे ही ले जाने लगे तो उसने पंडित जी से कहा कि इस गधे को तुम मुझे बेच दो ,अब तो पंडित जी ने सोचा मुझे इस गधे को बेच देने में ही भलाई है क्योंकि पहले दो लोगों ने भी उसे यही बात कही थी। वह लोग झूठ नहीं बोल सकते पंडित जी ने अपनी गाय को उसको ₹500 में बेच दिया ।वह पंडित जैसे ही घर जा रहा था उसे रास्ते में उसकी पत्नी मिल गई उसकी पत्नी ने पूछा कि तुम क्या लाए हो तब उसने अपनी पत्नी को सारी कहानी सुना दी ःउसको गांव के जमीदार न उसे एक गाय दान में दी थी उसने सोचा कि वह गाय है परंतु रास्ते में मुझे तीन लोगों ने एक ही बात कही कि पंडित जी तुम इस गधे को क्यों ले जा रहे हो ।मैंने सोचा कि वह झूठ बोल है जब तीन बार तीन व्यक्ति द्वारा एक ही बात कही गई तो मैंने सोचा कि तीनों व्यक्ति कभी झूठ नहीं बोल सकते इसलिए मैंने उस गधे को तीनों दोस्तों को बेच दिया। पंडित जी की पत्नी बहुत ही समझदार थी। वह बोली तुम ठहरे बेवकूफ के बेवकूफ गाय को भी नहीं पहचानते है ।वे तीन ठग नहीं थे बल्कि वे तीन चोर थे जो तुमसे तुम्हारी गाय चुराना चाहते थे इसलिए उन्होंने जब तुम्हें गाय को ले जाते देखा तो उन तीनों ने सोचा कि क्यों ना इस पंडित जी को बेवकूफ बना कर इसकी गाय को हासिल कर लिया जाए ।और तुम इन तीनों लोगों के बहकावे में आ गए अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा वह तीनों अभी भी तीनों ज्यादा दूर नहीं गए होंगे मैं पूरे दावे के साथ कह सकती हूं कि वह तीनों अभी बहुत ज्यादा दूर नहीं गए होंगे अगर तुम में थोड़ी सी भी अक्ल है तो तुम उस गाय को वापस लेकर आओ ।मैं तुम्हें बताती हूं कि क्या करना है उसकी पत्नी ने पंडित जी को अच्छे ढंग से समझा-बुझाकर कहा मैं तुम्हारे पीछे-पीछे आ रही ,हूं।ं जैसे ही पंडित आधे रास्ते में पहुंचा तब पंडित जी को वापस आते देखकर रास्ते में पहला ढंग बोला तुम वापिस क्यों आए हो ।पंडित जी ने कहा कि मेरा थैला रास्ते में ही रह गया था इसलिए मैं उसे लेने आया हूं पंडित जी अपना थैला ढूंढने लगे ।पंडित जी ने बातों ही बातों में कहा कि मैंने तुम्हें गाय ही दी थी यह बात मैं जानता थाूं तुमने कहा था कि ये गधा है परंतु मैंने यह जानबूझकर यह गाए तुम्हें दी थी क्योंकि मैं जानता था कि यह जो गाय मैं मैं दे रहा हूं यह मुझे दान में मिली थी उसको पागल कुत्ते ने काटा हुआ था चाहे उसकी टांग में निशान भी देख लो पागल कुत्ते के काटे का निशान है इसलिए मैंने उसकी टांग में पट्टी बांधी थी जब इस गाय को जमींदारार दान कर रहे थे तो यह बात मेरी पत्नी ने सुन ली थी उसने मुझे यह बात बताई थी इसलिए मैंने तुम्हें यह गाए दे दी थी तभी उसने अपने पंडित जी को कहा कि तुम तुम यहां पर अपना थैला ढूंढो मैं अभी गाय ले कर आता हूं ऐसी गाय मुझे भी नहीं चाहिए ठग दौड़ा दौड़ा अपने दोनों दोस्तों के पास पहुंचा और उन दोनों को यह सारी कहानी सुनाई वह दोनों व्यक्ति पंडित जी की होशियारी की दाद देने लगे उसने तो हम दोनों को बेवकूफ बनाया इतने में पंडित जी भी वहां पहुंच गए पंडित जी ने उन दोनों को कहा भाई राम राम अब मैं तो चला मुझे मेरा थैला मिल गया है तब दूसरा ठग बोला भाई मैं समझता हूं कि तुम गाय ही हथियाने के चक्कर में फिर से आए थे तब पंडित जी ने कहा मुझे गाय नहीं चाहिए पंडित जी ने कहा की जब मैं यहां से गुजर रहा था तब मैंने एक औरत को पशुओं को चरातेे देखा हम इस गाय को इस महिला को बेच देते हैं जो कीमत मिलेगी हम चारों बांट लेंगे परंतु होशियार रहना जैसे ही वह वापस जाने के लिए उसी रास्ते से मुड़े वहां पर एक महिला पशुओं को चरा रही थी उन ठगों ने उस महिला को कहा हम यह गाय बेचना चाहते हैं क्या तुम यह गाए लोगी वह महिला बोली तूम मुझे बेवकूफ क्यों बना रहे हो मुझे कोई गायनहीं लेनी मेरे पास तो पहले ही बहुत सारे पशु है इस गाय को लेकर मैं क्या करूंगी और मुझे तो यह गाय बहुत ही बीमार दिखाई देती है तुमने इस की टांग में पट्टी क्यों बांधी हुई है नहीं साहब मुझे कोई गाय नहीं चाहिए तुम किसी और को इस गाय को बेच देना तब तीनो ठग सोचने लगे की कि यह पंडित झूठ नहीं बोल रहा है सचमुच यह गाय बहुत बीमार लग रही है तभी तीसरा ठग बोला नहीं पंडित जी हम तीनों को माफ कर दीजिए हम तुमसे तुम्हारी गाय छिनना नंही चाहते थे परंतु अब हम आपसे माफी मांगते हैं भला हम तीनों इस पागल गाय का क्या करेंगे आप तो पंडित हो अगर आपने नहीं रखनी हो तो ना सही हम आपको इस गाय के 500रुपए देते हैं आप इस गाय को किसी को दान में दे देना या बेच देना अच्छा तब तीनों ठग मूर्ख बनकर वहां से अपने अपने घरों को चले गए पंडित जी ने अपनी पत्नी की सूझबूझ से गाय को उनके उसे फिर से प्राप्त कर लिया था।

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