बचपना

रघु और राघव दो दोस्त थे। रघु देखने में सुंदर चंचल स्वभाव और शरारतें करने में माहिर। राघव शांत और एकदम गंभीर। दोनों एक ही मोहल्ले में रहते थे। रघु अमीर परिवार का बेटा था। राघव एक मध्यमवर्गीय परिवार का। रघु के पिता जाने-माने प्रतिष्ठित व्यापारी थे। रघु और राघव दोनों एक ही स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। विद्यालय में रघु राघव की कॉपी से नकल करता और मैडम को काम दिखा देता था। रघु को विद्यालय में मैडम नें कुछ प्रश्न दिये और कहा जल्दी से इन प्रश्नों के उत्तर लिख कर दो। उसे तो एक भी प्रश्न याद नहीं थे। वह तो इंतजार कर रहा था कि जैसे ही राघव प्रश्नों के उत्तर लिख देगा उसकी कॉपी वह डैस्क में से उठा लेगा।

रघु प्रश्न को हल नहीं कर रहा था। दो बार रघु को मैडम ने टोका। राघव नें जैसे ही प्रश्न पत्र लिख दिए वह मैडम को बोला। मैडम क्या मैं पानी पीने बाहर जा सकता हूं? उसने कॉपी डैस्क पर रख दी और पानी पीने चला गया। वापस आया तो रघु ने अपनी कॉपी राघव की सीट पर रख दी। उसने राघव के नाम वाला पेज फाड़ दिया था। दोनों की कॉपियां एक जैसी थी। जब मैडम ने सभी बच्चों के प्रश्न जांचे तो राघव की कॉपी खाली थी। उसनें राघव की कॉपी पर रघु लिख दिया था। मैडम ने राघव को खड़ा किया बोली। आजकल तुम्हें क्या होता जा रहा है? तुमने प्रश्न क्यों हल नहीं किये। उसे सब कुछ समझ में आ गया था कि रघु ने उसकी कॉपी जल्दी से डैस्क से उठाकर उस पर अपना नाम लिख दिया था। वह कुछ नहीं बोला चुप रहा। उसे रघु पर गुस्सा भी आ रहा था।

रघु छोटी-छोटी बातों पर उससे गुस्सा होता जा रहा था। शाम को छुट्टी के समय राघव ने रघु को कहा कि तुमने मेरी कॉपी क्यों चुराई? वह बोला तो क्या हो गया? मैं भी तो तुम्हें अपनी चीजें खाने को देता हूं। कभी चॉकलेट बिस्किट। राघव सोचने लगा ठीक ही तो कहता है। वह उसे चॉकलेट टॉफी बिस्किट लाता है। मेरे पिता मुझे यह चीजें हर रोज लाकर नहीं दे सकते। वह तो हर रोज खाने को ना जाने क्या क्या लाता है। कल से मैं इससे कुछ भी नहीं मांगूगा। क्या करूं? खाने को मन कर ही जाता है। उस से पीछा छुड़ाने का यही तरीका है।

रघु हर रोज स्कूल राघव को दिखा दिखाकर चॉकलेट बिस्किट और , और पिज़्ज़ा ना जाने क्या-क्या खाने लगा। राघव ने तो उसकी तरफ देखना ही छोड़ दिया था उसके पिता ने उसे शिक्षा दी थी कि बेटा हमें दूसरों की देखा-देखी नहीं करनी चाहिए। अगर किसी बच्चे के पास तुमसे ज्यादा चीजें हैं तो तुम्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि मेरे पास भी काफी सारी चीज होती होती। हो सकता है उस बच्चे के पापा हमसे ज्यादा अमीर व्यक्ति हों। अमीर व्यक्ति के पास गाड़ी और बंगला होता है। मध्यम वर्गीय इंसान के पास थोड़ा कम होता है। जो अपने पास होता है उसी में खुशी ढूंढनी चाहिए। हो सकता है कल हमारे पास उससे ज्यादा रुपए हों। यह ख्याल अपने दिल से निकाल देना चाहिए। रूखा-सूखा जो भी हो उसे प्यार से खाना चाहिए। तुम अगर यह सोचो कि यह खाना कितना स्वादिष्ट है तो वह वस्तु तुम्हें स्वादिष्ट नजर आएगी।

राघव के पापा ने उसे अच्छी तरह समझा दिया था कि यह बड़े लोग अपनी चीज को तो छोड़ो दूसरों की वस्तु को भी हड़पने की कोशिश करते हैं। राघव के दिमाग में सारी बातें अच्छी तरह से आ गई थी। वह कभी भी रघु की वस्तु छीनने की कोशिश नहीं करता था। एक दिन बातों ही बातों में रघु नें राघव की पिटाई की। राघव को गुस्सा तो बहुत आया मगर एक बार उसने रघु को कहा कि एक बार तो मैं तुम्हें छोड़ रहा हूं। आगे से मैं तुम्हें नहीं छोड़ूंगा। राघव नें उसे छोड़ दिया था। घर आकर राघव नें अपने पिता को सारा किस्सा सुनाया। उसके पिता बोले बेटा कि तुम बच्चों को अपने छोटे बड़े झगड़े अपनें आप सुलझानें चाहिए। बच्चों के झगड़े में हम बड़ों को नहीं घसीटना चाहिए। राघव चुप रह गया।

एक दिन रघु ने स्कूल में अपने दोस्त के साथ लड़ाई कर ली। रघु ने आज फिर राघव की कॉपी लेकर अपने बैग में डाल दी थी। राघव को गुस्सा आ गया वह मैडम को बोला मैडम हर बार यह मेरे बस्ते से कॉपी ले लेता है। आज भी इस के बस्ते में मेरी कॉपी है। मैडम कहनें लगी चलो देखें। रघु ने अपने दोस्त अखिल को फोन करके कह दिया था अरे यार मेरे बस्ते में राघव की कॉपी है। उसकी कॉपी तू राघव के बस्ते में डाल दे। उसके दोस्त ने जल्दी से कॉपी राघव के बस्ते में डाल दी।

मैडम कक्षा में आई उसने रघु के बस्ते की तलाशी ली। राघव के बैग में ही कॉपी थी। वह बोला मैं सच कह रहा हूं मैडम उसने न जानें मेरे बस्ते में कैसे वापिस कौपी डाल दी। मैडम ने राघव को ही दोषी ठहरा दिया।

रघु ने एक बार फिर बाजी मार ली थी। शाम को राघव ने सोचा कितना चुप्पी साधे बैठा रहूं? मेरे सब्र का बांध टूट चुका है। यह तो और भी शातिर होता जा रहा है। इसका असली चेहरा मेरे सामने आ चुका है। अगर इसे अभी सजा नहीं दी गई तो वह कभी भी जिंदगी में सुधर नहीं सकता। पापा ने भी कहा है कि अपना झगड़ा अपने आप ही सुलझाना चाहिए। इसको बहुत माफ किया। आज तो इसको सजा देख कर ही रहूंगा। उसने रघु को कहा कि आज तो मैं तुम्हें घर नहीं जाने दूंगा जब तक तू अपनी सच्चाई सबके सामने जाहिर नहीं करेगा। जल्दी से मैडम के पास चलकर अपनी करनी बता दे। तूने फोन करके अखिल को कहा था कि जल्दी से कॉफी राघव के बैग में रख दे अगर तू मैडम के पास सच्चाई नहीं बताएगा तो मैं तुझे घर नहीं जाने दूंगा। उसने रघु को बालों से पकड़ा। उन दोनों को लड़ता देखकर सारे अध्यापक अध्यापिकाएं बाहर आ गए थे। राघव का गुस्सा तो आज फूट ही पड़ा। रघु ने भी उसको कौलर से पकड़ लिया था। उसकी टांग से खून निकल चुका था। अचानक अखिल दौड़ता दौड़ता आया बोला मैडम राघव ठीक कह रहा है। रघु नें ही राघव की कॉपी अपने बैग में डाल दी थी। मुझे फोन करके कहा था कि राघव की कॉपी मेरे बैग में से लेकर राघव के बैग में रख दे।

सभी बच्चे राघव को कह रहे थे कि यह तो कभी भी किसी से लड़ाई नहीं करता है। सच्चाई सामने आ गई थी। मैडम नें उन दोनों को छुड़ा लिया। लंगड़ा लंगड़ा कर रघु घर पहुंचा। उसके पापा बोले कि बेटा क्या हुआ। रघु बोला मेरे मोहल्ले में एक लड़का है पापा वह अपने आप को बहुत होशियार समझता है। उसने आज मेरी पिटाई की। उसके पापा को गुस्सा आ गया वह बोले वह कौन लड़का है? जो मेरे बेटे को परेशान कर रहा है। उन्होंनें राघव के घर का पता कर लिया। रघु के पिता राघव के पिता के पास आकर बोले अपने बेटे को समझाएं। उसने आज मेरे बेटे की पिटाई की। राघव के पिता ने राघव को बुलाया और कहा कि क्या तुमने रघु की पिटाई की? उसने सारे का सारा वृत्तांत कह सुनाया कि वह हर रोज मुझे परेशान करता है। मेरे बस्ते में से मेरी कॉपी निकाल कर नकल करता है और हर बार मुझ से लड़ता है।

एक बार तो मैंने उसे माफ कर दिया आज तो मैडम के सामने उसने मुझे झूठा साबित कर दिया तो मुझे गुस्सा आ गया। मैंने रघु की बहुत पिटाई की। राघव के पिता रघु के पापा को बोले कि देखो दोस्त हम बड़ों को बच्चों की बातों में दखल नहीं देना चाहिए। बच्चे हैं आज लड़ झगड़ कर कल फिर एक हो जाएंगे। आपसी मनमुटाव से कुछ समस्या हल नहीं होती। रघु के पिता नाराज होकर वहां से चले गए।

रघु के पिता के मन में बदले की भावना बढ़ गई। उसने अपने गुन्डों को आज्ञा दी कि राघव को मार मारकर उसकी हड्डियां तोड़ दो।गुन्डे राघव को ढूंढते-ढूंढते स्कूल के पास पहुंच गए थे। जैसे ही छुट्टी हुई उन्होंने राघव को पकड़ लिया। उसे पकड़कर एक खंडहर में ले गए। वह गुंडों से बोला अंकल आप पहले मेरी बात सुनो फिर मुझे मार देना। आप लोगों का भी परिवार होगा। आपके भी बेटे होंगे। मैं भी अपने परिवार में एक इकलौता बेटा हूं। मेरे पापा एक गरीब इंसान है। आप पहले मेरी बात सुनो। बिगड़ी औलाद को सजा देना कोई जुर्म है तो यह जुर्म मैंने किया। मैंने आज रघु को उसकी गलती की सजा दी अगर उसे आज सुधारा नहीं जाता तो उसकी हिम्मत और बढ़ जाती। उसको मैंनें ना जाने कितने मौके दिए। मेरे पापा ने तो मुझे सिखाया है कि बच्चों के झगड़ों में बड़ों को नहीं पड़ना चाहिए। आज मुझे मरवाने के लिए वह आप लोगों को ले आये। उसके पिता के पास बहुत सारे रुपए होंगे उन्हीं रुपयों पर वह बहुत गर्व कर रहे हैं अगर बच्चों को गलती की सजा ना दी जाए तो वह बहुत बड़े गुन्डे बन जाते हैं। वह गुंडे उस बच्चे की बात सुन रहे थे। उनके माता-पिता ने भी उन्हें जुर्म करते नहीं रोका था। इतने छोटे से बच्चे से यह कहते सुना अंकल अगर आपके बच्चे की किसी साथी से लड़ाई हुई तो क्या आप उस को मरवाने के लिए गुंडे भेजेंगे? या उनको अपनी समस्या खुद सुलझाने के लिए कहेंगे। आप यह बताओ कि आपको इन गुंडों ने मुझे मारने के लिए कितने रुपए दिए? वह गुंडे बोले ₹10000 दिए हैं। रघु बोला तो ठीक है आप मुझे छोड़ दो। मुझे झूठ मूठ मार दो। मैं प्लीज पच्चीस दिन तक स्कूल नहीं जाऊंगा। मेरे पटिया बंधवा दो उनको क्या पता लगेगा कि मुझे कितनी चोट आई है? जब मैं उनके सामने नहीं जाऊंगा मुझे भी नुकसान नहीं होगा। आपको ₹10000 भी मिल जाएंगे। मैं आपको ₹5000 दूंगा। सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी।

छोटे बच्चे की बात सुनकर वह गुन्डे दंग रह गये। आप मेरा साथ क्या दोगे? आप तो अमीर लोगों का साथ दोगे। मैं गरीब घर का बच्चा हूं। उसकी बातें सुनकर उन्होंने उसे छोड़ दिया।

सच्चाई सामने आ गई थी। उन गुंडों ने रघु के पापा को कहा कि हमने राघव को मार-मार कर उठने लायक भी नहीं रखा है। आगे से वह कभी भी रघु से लड़ाई नहीं करेगा।

इस बात को काफी दिन बीत गए थे। राघव भी स्कूल जाने लग गया था। विद्यालय में रघु से कोई भी बच्चा बात करना पसंद नहीं करता था। रघु कक्षा में चुपचाप बैठा रहता था। मैडम भी रघु से नाराज थी उसने राघव से अभी तक माफी नहीं मांगी थी। कोई भी बच्चा रघु की तरफ नहीं था। सभी बच्चे राघव के साथ अच्छे ढंग से व्यवहार करते थे। एक दिन रघु ने सोचा कि चलो मैं भी राघव से माफी मांग लेता हूं। रघु नें चॉकलेट राघव को देते हुए कहा दोस्त मुझे माफ कर दे। मैं कभी भी आगे से तुम से लड़ाई नहीं करूंगा। मेरी गलती थी मुझे तुमसे लड़ाई नहीं करनी चाहिए थी। मुझे अपनी गलती का एहसास हो चुका है। मुझे माफ कर दे मेरे दोस्त। मैं ही नालायक हूं। सब के साथ लड़ता रहता हूं। जब रघु ने राघव को इस प्रकार कहा तो राघव नें रघु को गले से लगा लिया। अब हम कभी नहीं लड़ेंगे।

कुछ दिनों के राघव ने रघु को बताया कि तुम्हारे पापा ने मुझे मारने के लिए गुंडे भेजे थे। रघु को यह बात सुनकर बड़ा दुख हुआ। हम बच्चों की लड़ाई में पापा कैसे बीच में आ गए? मैंने तुम्हारे बारे में पापा को बताया था कि राघव नें मेरी पिटाई की लेकिन इसका यह मतलब नहीं था कि तुम्हें गुन्डों से पिटवाते। यह तो पापा ने बहुत ही गलत किया। मुझे अपने पापा को सबक सिखाना ही होगा।

राघव के पापा के पुलिस इंस्पेक्टर दोस्त थे। राघव की मम्मी को पुलिस इंस्पेक्टर ने अपना भाई बनाया हुआ था। एक दिन जब वह दोनों स्कूल से आ रहे थे तो पुलिस इंस्पेक्टर उन्हें रास्ते में मिले। तब राघव ने रघु को बताया कि यह मेरे मामा है । रघु ने अपने दोस्त राघव को कहा कि तुम मुझे इन पुलिस इंस्पेक्टर के घर में कुछ दिनों के लिए छुपा दो। जब दो-तीन दिन तक मैं घर नहीं आऊंगा तब मेरे पापा को पता चलेगा कि बेटे के विरह का क्या अंजाम होता है तब उन्हें अपनी गलती का एहसास होगा।

राघव रघु को अपने मामा के घर में छोड़ आया। दो-तीन दिन तक जब रघु घर नहीं आया तो रघु के पापा परेशान हो गए। राघव को स्कूल जाते देखते तब उन्हें अपने बेटे की याद आती। राघव के पापा को देखकर सोचते कहीं इसी नें ही तो मेरे बेटे को तो नहीं छुपा दिया। अपने मन को समझाते हुए कहते मैंने भी तो इनके बेटे के साथ बुरा व्यवहार किया।

एक दिन रघु के पापा राघव के पापा के पास आकर बोले यार मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारे साथ भी बहुत अन्याय किया। भगवान मेरा बेटा मुझे जल्दी मिल जाए। राघव ने अपने पापा को यह नहीं बताया था कि रघु पुलिस इंस्पेक्टर अंकल के घर में छिपा हुआ है। उन्हें तो इस बात की जानकारी भी नहीं थी। एक दिन राघव के पापा और मम्मी जब अपने भाई के घर गए हुए थे वहां रघु को देख कर हैरान हो गए उन्होंने रघु को लाकर रघु के पापा के पास सौंप दिया। जैसे ही रघु को वे ले कर आए तो रघु के पापा बोले तुमने ही मेरे बेटे को वहां छुपाया होगा। मुझे पहले ही पता था कि यह चाल तुम्हारी है।

रघु आकर बोला नहीं पापा राघव के पापा को तो इस बात की भी खबर नहीं थी। मैंनें ही राघव को कहा था कि मेरे पापा ने तुम्हारी गुंडो से पिटवाई कर बड़ी गलती की है। उन्हें सबक सिखाना ही पड़ेगा तब मैंने पुलिस अंकल को कहा कि मुझे आप दो-तीन दिन तक अपने घर पर रख लो। मेरे पापा को तब अपनी गल्ती का एहसास होगा कि बेटी की जुदाई का दर्द कैसा होता है। राघव के पापा का कोई कसूर नहीं है। आप इनसे क्षमा मांगो।

रघु के पापा बोले कि मैं बेटे के मोह में अंधा हो गया था। ना जाने आपको क्या-क्या भला बुरा कह दिया। मुझे माफ कर दो । मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है । बच्चों की लड़ाई में हम बड़ों को कभी नहीं पड़ना चाहिए। रघु अपनें पापा को बोला कि पापा बचपना बच्चों को ही शोभा देता है। वे दोनों फिर से दोस्त बन जातें हैं।

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