मासूम

शेरभ अपने मम्मी पापा के साथ शिमला की वादियों में घूमने गया था। वह केवल 10 साल का मासूम सा, प्यारा सा बच्चा था। बड़ी बड़ी आंखें, गोल मटोल, भोला-भाला चेहरा, अपने माता-पिता का हाथ थामे कुफरी की बर्फीली वादियों का लुत्फ उठा रहा था। वह गर्म इलाके का रहने वाला था। ठंडी ठंडी हवा के झौकों को देख कर और प्रकृति के हरे भरे मनोहर दृश्यों को देख कर मन ही मन मुस्कुरा रहा था। ऐसे अद्भूत दृश्य उसनें कभी भी नहीं देखे थे। चारों तरफ लोंगों की भीड़ थी। कुछ लोग पैदल चल रहे थे। बच्चे बूढे और सभी घूम घूम कर प्रकृति के उन नजारों का आन्नद उठा रहे थे।। कुछ लोग याक को देख कर डर गए। शेरभ ने भी याक पहली बार देखा था। गाईड नें उन्हें बताया कि यह एक पशु है जो तिब्बत के ठंडे तथा वीरान पठार, नेपाल और भारत के उतरी क्षेत्रों में पाया जाता है। यह घने लम्बे बालों वाला एक प्रकार की गाय जाति का पशु है। लोग इसका दूध पीनें के लिए इस्तेमाल करतें हैं। जैसे गाय का दूध पीनें के लिए प्रयोग में लाया जाता है। याक के लम्बे लम्बे बाल देख कर वह हैरान हो गया। वहां से खूब सारी खरीददारी करनें के बाद पापा नें स्केटिंग करनें के लिए बुलाया

स्केटिंग करनें के लिए अलग स्थान था, शाम का वक्त था। उसके मम्मी पापा ने उसे सख्त हिदायत दी थी कि बेटा हमारा हाथ मत छोड़ना मगर उसे तो स्केटिंग में इतना आनंद आ रहा था उसने अपने मम्मी पापा की उंगली छुड़ा ली। वह स्केटिंग करते अपनें ममी पापा से काफी दूर निकल गया। उसनें जैसे ही पीछे मुड़कर देखा उसका संतुलन बिगड़ा और वह एक गहरी खाई में गिर गया। उसनें अपनें चारों ओर देखा वहां आसपास कोई नहीं था। वह एक सुनसान स्थान पर पहुंच चुका था। अंधेरा होनें ही वाला था। उसे अंधेरे से बहुत ही डर लगता था। वह अपनें मन में सोचने लगा वो कहां आ गया। डर के कारण वह कांप रहा था। उसके पैर में भी थोड़ी सी चोट लग गई थी। उसनें अपनें मम्मी पापा को जोर जोर से आवाज लगाई पर वंहा उसे कोई नजर नहीं आया। उसे वहां एक छोटी सी गुफा दिखाई दी। उसनें देखा कि उस गुफा में कोई जानवर तो नहीं है। किसी को भी वहां न देख कर वह उस गुफा में चल कर एक कोने में बैठ गया। वह ठंड से कांप रहा था। उसे ध्यान आया कि उसके पास अपने पापा का लाइटर था। उसने वह लाइटर जलाया। थोड़ी सी रोशनी से उसका डर कुछ कम हुआ उसने अपने सामने देखा उसके पास किसी की बड़ी-बड़ी आंखें चमक रही थी। वहां से जोर जोर की सांस लेंनें की आवाज़ आ रही थी। उसे मालूम पड़ गया था कि उसके समीप ही कोई जानवर है। उसने अपने मन में सोचा कि अगर शेर हुआ तो वह तो उसे कच्चा ही निगल जाएगा। डर के मारे उसके दिल की धड़कन और भी तेज हो गई। अपनी मैडम की आवाज उसके कानों में गूंजने लगी। बहादुर बच्चे डरते नहीं। इंसान का सबसे बड़ा शत्रु होता है उसका डर। वह डर गया तो सचमुच ही वह उसे खा जाएगा। वह आईस्ता आईस्ता वहां से चलने लगा पर वह लंगड़ा कर चल रहा था। वह जानवर भी उसके पीछे पीछे चलनें लगा। डर के मारे उसका बुरा हाल था। हिम्मत जुटा कर के शेरभ नें पीछे मुड़कर देखा। वहां बहुत अंधेरा था। उसने लाइटर जलाया। अरे! कोई शेर नहीं यह तो एक मासूम सा कुते का पिल्ला था जो अपनी प्यारी प्यारी आंखों से उसे निहार रहा था। वह काले घने बालों वाला छोटा सा कुते का पिल्ला था। उसने उसे अपने पास बुला लिया और प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा। उसका डर कुछ कम हो गया था। शेरभ उसके साथ चिपक कर एक जगह बैठ गया।शायद वह भी अपनें परिवार से बिछुड़ गया हो। उसने कहा कि तुम्हें मैं बघिरा बुलाऊंगा। शेरभ को भूख प्यास भी बड़े जोरों की लग रही थी। वह गले को बार-बार साफ कर रहा था। कुत्ते बड़े ही समझदार होते हैं। वह समझ गया कि इसको प्यास लगी है।
उसनें शेरभ की कमीज को खींचा। वह बघिरा के साथ चलने लगा। वह उसे एक पानी के झरनें के पास ले गया। उसने झरनें से पानी पिया और अपनी प्यास बुझाई। वह उसका दोस्त बन गया था।। बघिरा के साथ सारी रात चिपक कर सोया रहा। सुबह के वक्त उसकी आंख खुली। वह आईस्ता आईस्ता चलने लगा। वह उस जगह पहुंच गया जिस स्थान से वह नीचे गिरा था। उस ने पुकारा मम्मी पापा। वहां पर खड़े लोगों में से एक आदमी आकर बोला वह पुलिस स्टेशन गए हैं। मेरे पास उनका नंबर है। उस आदमी ने शेरभ के पापा को फोन कर दिया शेरभ के मम्मी पापा दौड़े-दौड़े अपने बेटे के पास पहुंचे। उस आदमी ने शेरभ को वही ठहरा दिया था। उसके मम्मी पापा दौड़े दौड़े आए उन्होंनें उसे गले से लगा लिया।। बेटा हमने तुम्हें कितना समझाया था? हमारा हाथ मत छोड़ो! मगर तुमने हमारी बात की ओर ध्यान ही नहीं दिया। अच्छा हुआ तुम सही सलामत हो। बेटा बताओ, तुम सारी रात कहां थे? तुम नें तो हमारी जान ही निकाल ली थी। हमनें तुम्हें सारी जगह ढूंढा मगर निराशा ही हाथ लगी। वह बोला मैं सारी रात अपने दोस्त बघिरा के साथ था। उसने बघिरा को पुकारा। वह दौडता दौडता उसके पास आ गया। उसने रात की सारी घटना अपनें मम्मी पापा को सुना दी। उसके मम्मी पापा हैरान हो गए। वह बोला यह मेरी जान है यह मेरा पक्का दोस्त है। मैं इसे यहां से ले चलूंगा। उसके पापा बोले बेटे इस का भी किराया लगेगा। उसके साथ इतनी परेशानियां होगी सो अलग। तुम बच्चे हो तुम इस बात को नहीं समझोगे। वह बोला पापा आप इस की चिंता मत करो। मैंने अपनी गुल्लक में इतनें सारे नोट किस दिन के लिए जमा किए हैं? मेरे प्यारे दोस्त के लिए, मैं आपको इसका ट्रेन का किराया दे दूंगा। उसनें अपने पापा को कहा कि आप मुझे जो खाना देंगे उस खाने में से आधा मैं बघिरा को दे दिया करूंगा। उसके पापा के पास कोई जवाब नहीं था। शेरभ की जिद के आगे उसके मम्मी पापा की भी नहीं चली। उन्होंने बघिरा का भी टिकेट ले लिया। वह बघिरा को पा कर बहुत ही खुश था। इतना खुश तो उसके पापा ने उसे कभी नहीं देखा था। गाड़ी स्टेशन से चल रही थी। रात का समय था। शेरभ के पापा ने उसे खाना खाने बुलाया। वह बोला पापा मेरा खाना दे दो। उसके पापा ने अनजानें में उसे दो ही चपाती दी। अपने आप खाना खाने में मस्त हो गए। उसके बघिरा की ओर किसी का भी ध्यान नहीं गया। शेरभ नें दोनों रोटियां उसे दे दी। उसके मम्मी पापा को ध्यान तब आया जब रात को बघिरा अपने दोस्त को चाट रहा था। उसके पिता को याद आया उसने तो शेरभ को दो ही रोटियां दी थी। उन्होंने एक रोटी वंहा पर पड़ी देखी। बघिरा नें एक रोटी शेरभ को बचा दी थी। उनकी आंखों से आंसू छलक आए। अपने बेटे को जगाते हुए बोले बेटा तुम तो भूखे ही रह गए। तुमने दोनों रोटियां अपनें दोस्त को डाल दी। वह तो तुम से भी ज्यादा समझदार है। उसने केवल एक ही रोटी खाई वह तुम्हारी रोटी कैसे खा सकता था? उन्होंनें शेरभ को उठाकर अपने हाथ से खाना खिलाया।

वे महाराष्ट्र के रहने वाले थे। उसके मम्मी पापा ने कहा था कि अपने दोस्त का ध्यान तुम्हें स्वयं ही रखना होगा। शेरभ अपने दोस्त को अपने कमरे में ही रखता था। वह दोनों खाते, खेलते सारे काम एक साथ करते थे। ।वह अपनें दोस्त को अपनें बिस्तर पर ही सुलाता था। बघिरा बहुत ही समझदार कुता था। वह बहुत सारे काम जल्दी सीख जाता था। छुट्टी वाले दिन उसके साथ खूब सारी मस्ती करता। वह अपने दोस्त बघिरा को काफी दूर तक घुमाने ले जाता। इस तरह अपने दोस्त के साथ रहते-रहते अधिक समय बीत गया।
शेरभ एक बड़ा समझदार इन्सान बन चुका था। उसके घर में उसकी शादी की चर्चा हो रही थी। उसने सबसे पहले यही शर्त रखी कि अगर उस के दोस्त को साथ रखने में उस की होनें वाली पत्नी को कोई ऐतराज नहीं होगा तभी वह खुशी-खुशी शादी करेगा। वह उसका सच्चा दोस्त ही नहीं उसका एक पक्का साथी था। जहां भी जाता वह बघिरा को भी अपने साथ ले जाता। बघिरा उसके बहुत सारे काम करता। रात को जब शेरभ देर से घर आता वह तब तक सोता नहीं था। वह उसे टकटकी लगाकर एकटक नजरों से दरवाजे की ओर देखता रहता। वह तब तक सोता नहीं था जब तक कि अपने दोस्त को देख ना ले।
उसके कार्यलय में काम करनें वाली सहकर्मी स्मृति से उसकी मुलाकात हुई। वह उसे मन ही मन में चाहने लगी। एक बार डरते डरते उसने शेरभ से कह दिया कि मैं तुम से शादी करना चाहती हूं। शेरभ ने कहा मैं तुम्हे अपने सबसे खास दोस्त से मिलाना चाहता हूं। वह बोली तुम्हारा दोस्त है कौन? वह जब शेरभ के घर आई तो सामने बघिरा को देख कर डर कर पीछे हट गई। शेरभ नें अपने दोस्त का परिचय स्मृति से करवाया।शेरभ नें कहा मैं भी तुम से शादी करना चाहता हूं लेकिन तुम्हें मेरे दोस्त को भी अपनाना होगा।
वह बोली मुझे इस को साथ रखनें में कोई ऐतराज नहीं है।थोड़ा डर लगता है। शेरभ बोला वह तुम से बहुत जल्दी ही घुलमिल जाएगा।
घर वाले भी शादी के लिए मान गए। शेरभ का तबादला दूर हो गया था।उन दोनों की शादी धूमधाम से हो गई। वह अपनी जिंदगी में खुश थे। धीरे-धीरे समय बीतने लगा। वह दिन भी आ गया जब उनके घर में बच्चे की किलकारियां गूंजनें लगी। उनके घर में नन्हे से सदस्य ने जगह ले ली थी। *
छोटा सा अंशुल उनकी गोद में आ चुका था। वह केवल एक ही महीने का था। स्मृति की सहेलियां उसे बार-बार कहती कि अगर तुम्हारे बच्चे को कुत्ते नें कोई नुकसान पहुंचाया तब क्या होगा? उसे भी लगने लगा कि मेरी सहेलियां ठीक ही कहती है। एक दिन जब बघिरा को शेरभ अपने हाथों से खाना खिलानें लगा उसकी पत्नी को अपने पति की यह बात बहुत ही बुरी लगी। वह बोली मानती हूं तुम अपने दोस्त के साथ बहुत ज्यादा प्यार करते हो। इतना प्यार ठीक नहीं होता। वह बोला यह मेरा सबसे अच्छा दोस्त ही नहीं मेरा भाई भी है। मैं तो इसे अपने हाथों से ही खाना खिलाऊंगा। तुम चाहे जो भी कहो। मैंने तुम्हें पहले ही सारी बातें समझाई थी। उसकी पत्नी गुस्से में तिलमिला कर बोली मुझे तुम से शादी ही नहीं करनी चाहिए थी।

बघिरा को शेरभ ए-सी वाले कमरे में सुलाता था। वह एक ठंडे स्थान पर रहने वाला प्राणी था क्यों कि उसे वहां पर बहुत ही गर्मी लगती थी। जब शेरभ ऑफिस चला जाता तो शेरभ की पत्नी बघिरा को कभी भी अपने हाथ से खाना नहीं खिलाती थी। वह बघिरा को ए-सी वाले कमरे से बाहर कर देती थी। अपने बच्चे को भी उससे दूर ही रखती थी कि कहीं वह उस को नुकसान ना पहुंचाए। वह कभी कभी बघिरा को एक कमरे में बंद कर देती। वह उस का खास ध्यान नहीं रखती थी। वह कभी कभी उसे समय से खाना देना भी भूल जाती थी। उसकी सहेलियां उसे कहती थी कि कुत्ते से तुम्हारे बच्चे को बहुत सारी भयानक बीमारियां लग सकती हैं इसलिए वह हमेशा उसको छूने से डरती थी।

एक दिन उसकी सहेली विभा उसके घर आई हुई थी। वह उसके बच्चे को पालने से उठाने लगी। पालने से उठाते वक्त उसका बच्चा नीचे गिर गया। वह जोर जोर से रोने लगा। यह देख कर बघिरा दौड़ा दौड़ा आया और उसकी सहेली पर बुरी तरह से भौंकने लगा तभी वहां पर अचानक स्मृति आ गई। स्मृति को देख कर उसकी सहेली अचानक से घबरा गई और डर के मारे उसने झूठमूठ कह दिया मैं तो तुम्हारे बच्चे को पकड़ रही थी। बघिरा ने ही आ कर इस बच्चे को गिराया। ऐसे कुत्तों को अपने घर में नहीं रखना चाहिए। वह तुम्हारे बच्चे को एक दिन नुकसान पहुंचा सकता है। स्मृति और भी डर गई और उसने सोचा कि आज जैसे-तैसे करके वह शेरभ को मना ही लेगी। शेरभ यदि उस कुत्ते को कहीं छोड़ने पर राजी नहीं हुआ तो इस घर को छोड़कर वह हमेशा हमेंशा के लिए चली जाएगी।
शेरभ जैसे ही घर पहुंचा तो स्मृति उदास होकर बैठी हुई थी। उसने अपने पति को कहा कि बघिरा को सदा के लिए यहां से ले जाओ वर्ना मैं अपने मायके चली जाऊंगी। बघिरा नें आज मेरे बेटे को गिरा दिया। शुक्र करो भगवान का आज मेरी सहेली वहां थी। नहीं, तो यह बघिरा मेंरे बच्चे को मार ही डालता। यह बातें बघिरा सुन रहा था। वह मूक प्राणी कैसे उसे विश्वास दिलाता कि यह सब कुछ किया धरा तो उसकी सहेली विभा का है। उस का पति शेरभ बोला मैं कभी भी मान नहीं सकता कि मेरा बघिरा हमारे बच्चे को नुकसान पंहूंचानें की सोच भी सकता है। यह तुम्हारी गलत धारणा है। जब उसकी पत्नी नें उसे खूब परेशान किया और वह मायके जाने को तैयार हो गई तो उस के सब्र का बांध टूट गया। बघिरा भौंक भौक कर बताना चाहता था कि उसनें कुछ नहीं किया है।स्मृति का रोना चिल्लाना, बघिरा का भौंकना, बच्चे का रोना और औफिस की थकान सब के सब के कारण वह अपना आपा खो बैठा। वह गुस्से में एक दम तिलमिला उठा और बिना सोचे समझे बघिरा को ले कर गाड़ी में बिठा कर ले गया।
वह दोनों बहुत ही दूर निकल आए थे।उस दिन बहुत ही तेज वर्षा हो रही थी। शेरभ नें एक सूनसान जगह पर गाड़ी रोक दी। दोनों गाड़ी से बाहर निकले। उसने बघिरा की गेंद निकाल कर दूर फेंक दी। बघिरा खुश हो रहा था कि मेरा मित्र मुझे अपनें साथ खेल खेलने के लिए यहां ले कर आया है। वह गेंद को पकड़ने के लिए जैसे ही दौड़ा शेरभ जल्दी से गाड़ी में बैठ कर वहां से निकल गया। बघिरा जैसे गेंद मुंह में पकड़ कर लाया उसनें गाड़ी को दूर जाते हुए देखा। उसके मूंह से गेंद छूट गई और वह गाड़ी के पीछे तेजी से भागनें लगा। कुछ ही देर में गाड़ी उसकी आंखों से ओझल हो चुकी थी।वह थक हार कर एक कोनें में बैठ कर अपनें दोस्त का इन्तजार करनें लगा। बघिरा के मन में एक बार भी ख्याल ही नहीं आया कि उसका दोस्त कभी उस ऐसे अकेला छोड़ कर भी जा सकता है। यही सोच कर कि शेरभ अभी लौट आएगा वह अपने दोस्त का वहीं बैठ कर इन्तजार करनें लगा।
शेरभ बघिरा से बहुत दूर निकल आया था। अचानक ही उसे एहसास हुआ कि यह मैंनें गस्से में आ कर क्या अनर्थ कर डाला? मैंने अपने दोस्त को इतनी बड़ी सजा कैसे दे डाली? वह तो बचपन से ही मेरे साथ है। मेरा भाई है। मैं उसे कैसे छोड़ सकता हूं? मुझ से एसी गल्ती कैसे हो गई? मैं उसे अभी वापिस ले कर आता हूं। यही सोचते सोचते शेरभ नें जल्दी से गाड़ी वापिस मोड़ दी। वह जल्द से जल्द अपनें दोस्त के पास पहुंचना चाहता था। वह अपनें आप को कोस रहा था वह कैसी मनहूस घड़ी थी वह क्यों अपनी बीवी की बातों में आ गया? वह इतनी निष्ठुर कैसे हो गई? मेरी पत्नी इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती है? वह यही सब सोचता हुआ वह बघिरा की ओर तेजी से गाड़ी चलाता हुआ जा रहा था तभी अचानक एक खतरनाक मोड़ की तरफ उसका ध्यान ही नहीं गया। उसकी गाड़ी तेजी से आ रहे एक ट्रक से जा टकराई। वह लहूलुहान हो कर गाड़ी से बाहर गिर पड़ा। लोगों की भीड़ वहां इकट्ठी हो गई थी। उसे बहुत गहरी चोटें आई थी। ट्रक ड्राइवर नें उसे जल्दी से अस्पताल पहुंचाया। खबर मिलते ही उसकी पत्नी पास के सिटी अस्पताल पहुंच गई। वह बेहोशी की अवस्था में भी वह बघिरा बघिरा पुकार रहा था।
एक महीने तक उसे होश ही नहीं आया। होश में आते ही उसने बघिरा को ही पुकारा। उसनें और किसी का भी नाम नहीं पुकारा। डाक्टर नें स्मृति से पूछा कि वह बेहोशी की अवस्था में भी बघिरा का नाम ही पुकार रहे थे। लगता है इनका बघिरा से काफी गहरा रिश्ता है। आप के पति के ठीक होनें के लिए बघिरा का यहां होना जरूरी है।

—-—_–———– कहानी का शेष भाग अगले अंक में ।

लेखिका की कलम से
मीना शर्मा

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