वाटिका मेरा स्कूल

रमेश के परिवार में उनका एक बेटा था श्याम। बहुत ही चंचल स्वभाव का था पढ़ाई तो जरा भी नहीं करता था।  उसके पापा जब उसे कहते पढ़ाई करो, पढ़ाई के नाम पर बहुत ही डरता था। जब कभी उसकी मम्मी अपनी सहेली के साथ बड़े से लौन में बैठकर अपनी सहेलियों के साथ गप्पे मारती वह चुपचाप आकर धमाचौकड़ी करता था। उसकी नजरें हर तरफ होती थी कौन क्या कर रहा है? यह आंटियां क्या बोल रही है? प्रेस वाला क्या कह गया? किचन में जब उसकी मम्मी चाय बनाती उन से कुछ किचन में गिर जाता वह भी उसे पता चल जाता।  पढ़ाई के नाम पर उसे सांप सूंघ जाता था ऐसा था श्याम। पढ़ाई में निम्न स्तर तथा होमवर्क कभी नहीं करता था। स्कूल में जो कुछ सुनता  उसे चुटकियों में याद हो जाता मगर वह पढ़ाई को कभी भी गंभीरता से नहीं लेता था। उसकी मम्मी जब उसे पढ़ाई के लिए अपने पास लेकर बैठती तो इधर उधर की बातों में समय नष्ट कर देता था। उसकी मम्मी भी उसकी पढ़ाई को लेकर बहुत ही चिंतित थी। पढ़ाई को लेकर उसके पापा उसे डांट दिया करते थे। कभी-कभी मार भी पड़ जाती थी। उसकी होमवर्क ना करने की उसके अध्यापकों द्वारा शिकायत घर पहुंचती तो वह बहुत ही डर जाता। उसके पापा उस दिन उसकी  खूब पिटाई  करते। तुमने क्या समझ रखा है? फेल होने का इरादा है।तुम्हें  क्या हमारी नाक कटवानें का इतना  ही शौक है। उसकी मम्मी उस से कहती बेटा इस बार भी तुम अच्छे अंक लेकर नहीं आए तो तुम्हारा बाहर घूमना फिरना बंद। तुम्हें खाना भी नहीं मिलेगा। डर के मारे किताब लेकर बैठ जाता। मगर पढ़ाई कहां करता। उसका तो पढ़ाई में जरा भी मन नहीं लगता था। उसके पापा ने अध्यापकों को कह दिया था कि अगर वह होमवर्क ना करके लाए तो उसे सजा अवश्य देना। रमेश की पत्नी निर्मला पढ़ी लिख सभ्य और नेक दिल वाली औरत थी। अपने बेटे की हरकतों के कारण वह बहुत ही परेशान हो जाती थी। जिस स्कूल में उसे डाला गया था वह अच्छा स्कूल था। बच्चों की फीस तो ज्यादा थी मगर पढ़ाई अच्छी होती परंतु काफी दिन से अध्यापकों के तबादले  होनें के कारण उनके स्कूल के अध्यापक  बच्चों के बारे में कभी पूछते तक नहीं थे।।

 

निर्मला मन में सोच रही थी कि इस बार श्याम सुधर ही गया होगा। उसके स्कूल से कुछ भी लिखा हुआ नहीं आया। हर बार स्कूल के अध्यापक हर रोज श्याम को नोट लिख देते थे आपका बच्चा होमवर्क करके नहीं लाता। उस को समझाएं। कुछ दिन से उसके स्कूल वाले कोई भी लेटर वगैरा नहीं भेज रहे थे। उसके मां मन ही मन खुश हो रही थी कि श्याम अब सुधर चुका है। कोई बात नहीं इस बार स्कूल की परीक्षा में नहीं निकलेगा तो भी कुछ नहीं धीरे-धीरे समझ जाएगा। बच्चा है मारने से तो और भी ढीठ बन जाएगा। उसकी मां ने अपने आप को समझा लिया था। श्याम तो एक कदम आगे ही था।  उसकी मां ने जब उस  से कहा कि इस बार तुम्हारे अध्यापक तुम्हें कुछ भी नोट नहीं दे रहे हैं। लगता है तुमनें होमवर्क करना शुरू कर दिया है। वह बोला हां मां मैं अब अच्छा लड़का बन गया हूं। निर्मला नें श्याम

को आवाज लगाई बेटा, जल्दी से स्कूल को तैयार हो जाओ। वह बोला मां आज स्कूल देर से जाना है। आज हमारी आधी छुट्टी के बाद पढ़ाई होगी। उसकी मां बोली ये कैसी पढाई है? आजकल स्कूल में ऐसे ही चलता है। वह जल्दी से बस्ता लेकर स्कूल के लिए रवाना हो गया।

चलते चलते बहुत दूर निकल आया। उसका स्कूल उसके घर से काफी दूर था। रास्ते में चलते-चलते वह सोच रहा था कि मां को मैंने झूठ कह दिया क्या करूं? यह स्कूल वाले हर रोज बेंच पर खड़ा कर देते हैं काम करके नहीं लाओ पहले तो हर रोज मार पड़ती थी अब तो मैडम डांटकर बेंच पर खड़ा कर देती है मैं भी सारा दिन बैठा रहता हूं क्या करूं? स्कूल में गुरु जी का डंडा और घर में माता-पिता का डंडा। मैं तो परेशान आ चुका हूं। मैडम जो प्रश्न पूछती है उसके उत्तर तो ठीक देता हूं तब भी मैडम कह देती है कि नकल कर लाए होंगे. उस दिन टेस्ट में 20 अंक आए तो कहने लगी चीटिंग करके आए हो। करुं तो क्या करू। अध्यापक लोग बच्चों की मनो भावनाओं को भी नहीं समझते। सारे दिन काम काम काम क्या करूं। कभी-कभी तो डर लगता  है। अरे,! मैं तो भूल ही गया, मेरा दोस्त राम मुझे बाग में मिलने वाला था। उसे सामने से राम आता दिखा दिया। राम  बोला  वाह! तुम तो समय के बड़े पाबंद हो। श्याम बोला राम क्या तुम्हारे घर में भी पता चल चुका है कि हम स्कूल नहीं जाते? चार चार दिन वाटिका में खेलते रहते हैं। रामू बोला मेरे माता-पिता को क्या पता चलेगा। मेरी मां तो जबरदस्ती मुझ से पीछा छुड़ाने के लिए मुझे स्कूल भेजती है। घर में आया के भरोसे और स्कूल में अध्यापक अध्यापिकाओं के। मेरी मां विमला को तो यह भी नहीं पता होता कि लंच में मुझे क्या देना है।? वह सब कुछ आया संभालती है। मेरे घर में एक बूढ़ी आया है।

वह मुझे इतना प्यार करती है। वह मुझे प्यार से बाबा बुलाती है। बाबा तुमने खाना खाया या नहीं। खाने में क्या बनाऊं? मेरी पसंद का नाश्ता बनाती है। मेरी मां तो रसोई में कदम तक भी नहीं रखती है। सहेलियों के साथ जमघट लगा कर किटी पार्टी का आनंद लेती रहती है। पापा के दोस्तों का सारी सारी रात तक कॉल आता रहता है। घर में एक मेज पर हम खनकाने इकट्ठे बैठकर भी नहीं खाते। मेरा अलग से कमरा है। मेरे कुत्ते का अलग से कमरा है। मम्मी पापा के अलग-अलग कमरे हैं चार चार नौकर है। गाड़ी हैं बंगला है, सब कुछ नौकर  चाकर  सम्भालतें हैं। मैं तो अलग से कमरे में TV चलाता रहता हूं। क्या करूं? जैसे हीे पढ़ने की सोचता हूं कानों में फोन की घंटियों की कर्कश आवाजें रात रात तक सुनाई देती हैं। स्कूल में मेरे पापा ने कह दिया है कि हमारे बेटे को पास कर देना। इस बार तो जो गणित के और अंग्रेजी के अध्यापक आए हैं वह बहुत ही सख्त है। वह तो किसी भी बच्चे की नहीं सुनते।  हम दोनों  भी बेंच पर खड़े हो जाते हैं। कल तो उन सर ने इतनी पिटाई की यह देख कर मेरा तो कभी भी स्कूल जाने को मन ही नहीं करता।

हम दोनों दोस्त एक दूसरे के मित्र हैं। हमने निर्णय कर लिया है कि हफ्ते में चार दिन यही पर रह कर पढ़ाई करेंगे और 2 दिन स्कूल जाया करेंगे। हमारा प्लान कामयाब रहा। मेरे घर में भी किसी को पता नहीं चला कि मैं स्कूल नहीं जाता। श्याम बोला मेरी मां को शक हो गया है कहीं वह हमारे स्कूल में ना पहुंच जाए। मैडम हर बार नोट भेजती है। तुम्हारा बच्चा काम करके नहीं लाता है। तुम्हारा दोस्त है ना बाबू, जो स्कूल में चपरासी का काम करता है जिसको मैडम ने काम करने के लिए रखा है। मैंने उसे पटा लिया है। उसे कहा है कि हमारे घर  मैडम जो लैटरभेजेगी  उसे  तू पोस्ट ही मत किया कर। फोन का नंबर भी मैंने हैडमास्टर जी का नोट कर लिया है। वह सुबह 9:00 बजे  और शाम 7:00 बजे फोन करती है। मैं 9:00 बजे के समय वही रहता हूं। 7:00 बजे के समय भी मैं आवाज बदलकर  कह देता हूं कि मैं अपने बेटे को समझा दूंगी। मैं अपनी मम्मी की आवाज की नकल कर लेता हूं। राम श्याम  से बोला यार इस बार तो हम बच गए मगर रोज-रोज ऐसा नहीं चलेगा या तो हम घर से भाग जाएंगे या कुछ और जुगाड़ करते हैं।

 

स्कूल की मार से तो हम तंग आ गए  हैं। स्कूल में विज्ञान के अध्यापक प्रकाश बच्चों की हाजिरी लगा रहे थे। उन्होंने बच्चों की हाजिरी के लिए नाम पुकारा। उन्होंने देखा कि श्याम और राम  स्कूल नहीं आए हैं। वह सब बच्चों से बोले बेटा मैं तो स्कूल में नया नया आया हूं। दो बच्चे तीन-चार दिन से स्कूल नहीं आ रहे हैं। क्या कारण है? बच्चे बोले सर हमें नहीं पता। वह बोले देखो बच्चों मैं तुमसे प्यार भी बहुत करता हूं। मगर जो बच्चा झूठ बोलता है उसकी पिटाई भी बहुत होती है। बच्चे कुछ नहीं बोले। प्रकाश  सर नें अंग्रेजी की मैडम से पूछा राम और श्याम पढ़ने में कैसे हैं? मैडम बोली दोनों ही बहुत ही शरारती है। उनके मां-बाप को लैटर भेज भेज कर थक गए। पता नहीं उनके माता-पिता को उन दोनों के भविष्य की चिंता है या नहीं। दोनों  नालायक हैं। पढ़ाई  वगैरह कुछ नहीं करते हैं। सारा दिन बैठकर मटरगस्ती करते रहते हैं ना जाने दोनों को कब अक्ल आएगी। पांचवी के बाद इनको कोई भी दाखिल नहीं करेगा। जब नींव ही कमजोर होगी तथा आगे कैसे बढ़ पाएंगे? रामप्रकाश जी बोले ठीक है मेरी नजर में अब यह दोनों बच्चे आ गए हैं मैंने अपने तरीके से  इन्हें हैंडल कर लूंगा।

दूसरे दिन जब  विज्ञान के अध्यापक राम प्रकाश  जी स्कूल आए तो उन्होंने रामऔर श्याम को बुलाया और कहा तुम दोनों इतनें दिनों तक स्कूल क्यों नहीं आए? श्याम बोला मेरे पिताजी की तबीयत बिगड़ गई थी। मेरी मां नानी के पास चली गई थी। मैं घर में अकेला था मैं घर से कैसे आता? और श्याम तुम बताओ तुम स्कूल क्यों नहीं आए? वह बोला सर वर्षा के कारण स्कूल नहीं आ सका। रामप्रकाश जी बोले यह तो कोई बहाना नहीं है। तुम दोनों के घर आज ही शिकायत पत्र  भेजता हूं। तुम दोनों अपने अपने विषय में फेल हो। पढ़ाई क्यों नहीं करते? दोनों चुप रहे पाठ पढ़ाने के बाद जैसे उन्होंने बच्चों से प्रश्न पूछा तो श्याम ने जल्दी से गणित का सवाल हल कर दिया। वह बहुत ही खुश होते हुए बोले तुम तो होशियार हो।

अंग्रेजी की  मैडम जैसे ही घन्टे बजी कक्षा में  आई। मैडम ने आकर उन्हें होमवर्क  न करनें के लिए बेंच पर खड़ा कर दिया और उनके घर चपरासी के हाथ लेटर भेज दिया कि आपका बच्चा पढ़ाई नहीं करता है। जैसे ही उन्होंने लैटर  चपरासी के हाथ में थमाया  तो श्याम दौड़ा दौड़ा बाबू के पास जाकर बोला रुको।  यह सब राम प्रकाश सर छुप कर देख रहे थे। उन्होंने देखा श्याम बाबू को कह रहा था देख भाई हमें हमारे मां-बाप से मार नही खानी  है हमारी लैटर घर नहीं पहुंचनी चाहिए। आज तो मेरे पास रुपए नहीं है। हम दोनों दोस्त मिलकर ₹50 तुम्हें दे देंगे इस पत्र को फैंक दो। दूसरी लेटर लिख देता हूं। यह बच्चे पढ़ाई में अच्छे चल रहे हैं। श्याम को उन्होंने कागज पर कुछ लिखते हुए देख लिया था। बाबू को उन्होंनें दूसरी  लैटर पकड़ा दी थी। राम और श्याम इतने शातिर थे उन दोनों को अपनी मुख्याध्यापिका के हस्ताक्षर करना भी आता था। वह नकली  लैटर बनवाकर बाबू के हाथ घर भिजवा देते थे। जिसमें लिखा होता था कि आपका बच्चा पढ़ाई में ठीक है। इस तरह से घर में दोनों पिटाई होने से बच जाते थे।

श्याम जैसे ही बाबू को लेटर थमाकर गया राम प्रकाश ने बाबू को बुलाया और कहा यह श्याम और राम तुमसे क्या कह रहे थे। दाल में कुछ काला तो अवश्य है। वह बोला कुछ नहीं साहब रामप्रकाश भी कच्ची गोलियां नहीं खेले थे। वह बोले जल्दी से बताओ वर्ना तुम्हें स्कूल से निकाल दिया जाएगा। बाबू डर के मारे कांपने लगा। वह रोने लगा। अध्यापक ने उसके हाथ से लैटर ले ली थी। उन्होंने पढ कर देखा  तो मैडम ने लिखा था कि आपके बच्चे पढाई में ठीक चल रहे हैं। चिंता की कोई बात नहीं है। रामप्रकाश चौंके अभी-अभी अंग्रेजी की मैडम ने बताया था कि यह दोनों बच्चे पता नहीं कहां रहते हैं? स्कूल भी नहीं आते हैं। हफ्ते में मुश्किल से 1 या 2 दिन स्कूल आते हैं। घर में ना जाने कितने फोन लगाए? मगर कोई फोन सुनता ही नहीं है। इन बच्चों को अगले साल स्कूल में दाखिल ही नहीं कराया जाएगा।

 

रामप्रकाश ने सोचा ठीक है अभी इनकी शिकायत मैडम से नहीं करता हूं। बच्चे हैं मासूम है। ना जाने क्या कर बैठे। अभी मैं प्रिंसिपल से कुछ नहीं कहूंगा। मैं इन्हें अपने तरीके से हैंडल कर लूंगा। प्रकाश सर नें रामू और श्यामू को कहा कि काम कर के लाए हो रामू बोला नहीं। श्याम बोला नहीं। उन्होंने अंग्रेजी की मैडम को बुलाया। बारी-बारी से सभी अध्यापकों को बुलाया। उन सब ने कहा कि यह दोनों बच्चे बड़े उदंड है। राम प्रकाश जी ने उन्हें बेंच पर खड़ा कर दिया। तीन चार डंडे लगा डाले। उन दोनों के बैन्त लगनें के कारण हाथ सूज गए थे। उन्होंने कहा तुमने अपने मुख्याध्यापक के हस्ताक्षर कैसे किए? तुम्हारे माता-पिता को तुम्हारी खबर तक नहीं कि तुम स्कूल में आते हो। एक और गलत काम।  तुमने झूठे हस्ताक्षर करना कहां से सीखा? कल तो तुम्हारे मामा पापा मम्मी को बुलाना ही पड़ेगा। श्याम बोला मेरे पापा तो काम के सिलसिले में बाहर गए हैं। मेरी मम्मी तो छुटकी के साथ ही रहती है। उन्हें तो वह काम करने ही नहीं देती।  राम बोला मेरे घर में बोलने से कोई फायदा नहीं।  मेरे पापा आप को रुपया दे कर  कह देंगे कि अपने तरीके से संभालो। इतने छोटे बच्चे के जबाब सुन रहा अध्यापक स्तब्ध रह गए। इनका भविष्य धूमल हो जाएगा। इन दोनों को तो मैं सुधार कर ही रहूंगा। कुछ डांट कर, कुछ फटकार कर, और कभी प्यार से।  यह दोनों अपने मार्ग से भटक रहें हैं। अभी इन्हें नहीं संभाला  गया तो इन दोनों का भविष्य धूमिल हो जाएगा।

श्याम और राम स्कूल के पास ही थोड़ी दूरी पर एक वाटिका थी। वहां पर हर रोज चले जाते थे

वह वाटिका में पहुंचकर एक दूसरे से बोले। हम तो कल से स्कूल नहीं जाएंगे। परीक्षा के बाद घर से भागने के बारे में सोचेंगे। प्रकाश जी नें  पता लगानें की कोशिश की। प्रकाश जी दिन के समय राम और श्याम के घर पहुंचे। जब श्याम की मां को पता चला कि श्याम स्कूल नहीं जाता है वह तो  यह सुन कर हैरान हो गई कि उनका बेटा स्कूल नहीं जाता है।  वह कहां जाता है? जब राम प्रकाश जी ने बताया कि आपके बच्चे नकली हस्ताक्षर कर लैटर घर भिजवा रहे हैं कि आपका बच्चा पढ़ाई में ठीक चल रहा है। वह हस्ताक्षर मैडम के नहीं आपके बच्चे के होते हैं। चपरासी को भी पटा कर झूठा हस्ताक्षर करवा देते हैं। जब उन्होंने बताया कि आपके पति के बारे में  आप के बच्चे से पूछा तो श्यामू ने कहा कि वह काम के सिलसिले में बाहर गए हैं। निर्मला बोली मेरे पति तो दुकान पर काम करते हैं। वह तो बाहर कभी भी नहीं जाते।

निर्मला को पता चल चुका था कि उनका बेटा बिगड़ चुका है। वह बोली सर आप मेरे बेटे को कृपया करके सुधार दें। उसके पिता को पता नहीं चलना चाहिए। वह तो उसकी खाल उधेड़   देंगें। मैं अपने बेटे की हरकतों पर नजर रखूंगी

 

राम के घर जाकर राम प्रकाश जी जब पहुंचे तो दंग रह गए।  राम जो कह रहा था वह शत-प्रतिशत सही था। उसकी मां भी घर पर नहीं थी।  उसके पिता भी घर पर नहीं थे। आया ही घर पर थी। आया बोली सर आप मेरे राम के गुरु हैं। गुरु तो वह होता है जो अपने ज्ञान से बच्चों को प्रकाशित कर उसका भविष्य उज्जवल करता है। बच्चों से भूल  हो  भी जाए तो  गुरु उन्हें माफ कर देता है। मेरा राम तो मासूम है। भोला है। उस की हरकतों के कारण आप उसे दंड देंगे तो चलता है मगर, उसके मां-बाप को यह बातें कौन समझाए? मैं तो यहां काम करती हूं। छोटे से बच्चे का इसमें कोई कसूर नहीं है। उसे प्यार से आप समझाएंगे कि घर से बाहर रहना ठीक नहीं तो वह अपने आप समझ जाएगा।

राम प्रकाश जी जब उन दोनों बच्चों के घर से आए तो उनका सिर चकरा रहा था। वह तो आज तक बच्चों के मां पिता से कभी नहीं मिले। थे आज उन्हें महसूस हो रहा था कि अगर आप सफल शिक्षक बनना चाहते हो तो बच्चों के माता-पिता से कभी कभार मिलना अवश्य चाहिए। बच्चों की इस हरकत के बाद तो वह एकदम हैरान रह गए थे।

घर जा ही रहे थे तो उनके जहन में अपने बेटे का चेहरा घूम गया। उनका बच्चा भी तो पांचवी कक्षा में पढ़ता है। मैं भी कभी अपने बच्चे की तरफ ध्यान ही नहीं देता हूं। कहने को तो मैं अध्यापक हूं। दूसरों के बच्चों को सुधारने चला हूं लेकिन क्या कभी मैंने अपने बेटे से कभी प्यार से यह पूछा है कि तुमने आज क्या पढ़ा? सब कुछ स्कूल के अध्यापकों के हवाले कर दिया। आजकल वह भी स्कूल जाने से कतरा रहा है। आज चलो उसके स्कूल ही चलता हूं । वैसे भी अभी स्कूल बंद होने में देर है। वह अपने बेटे भानु के स्कूल पहुंच गए।  हेड मास्टर जी के कमरे में गए उन्हें नमस्ते किया फिर अपने बच्चे की प्रगति रिपोर्ट के बारे में जानना चाहा। मुख्याध्यापक ने चपरासी को बुलाकर कहा कि भानु को बुलाकर लाओ चपरासी आकर बोला इनका बेटा तो आज स्कूल ही नहीं आया है। वह तो कभी-कभी ही स्कूल आता है। राम प्रकाश जी यह सुनकर हैरान रह गए वह क्यों स्कूल नहीं आ रहा है? हम तो उसे हर रोज स्कूल भेजते हैं। वह ना जाने कहां रहता है। अध्यापक से मिलकर चले गए। घर आकर उन्होंने अपने बेटे भानु को कहा कि बेटा तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? वह बोला ठीक है। उन्होंनें अपनें बेटे को कुछ नहीं कहा। दूसरे दिन रामप्रकाश जी ने स्कूल से छुट्टी ले ली थी वह देखना चाहते थे कि उनका बेटा कहां जाता है और क्या करता है? जैसे ही उनका बेटा स्कूल के लिए निकला वह अपने बेटे के पीछे पीछे चल पड़े। चुपचाप एक सधारण आदमी का भेष बदलकर उसके पीछे पीछे चलने लगे। उनका बच्चा एक  उद्यान में पहुंच गया था। वह  फूलों की वाटिका थी। थोड़ी देर बाद उन्होंने देखा दो और बच्चे अपना स्कूल बैग लेकर वहां पहुंच गए। तीनों आपस में बातें कर रहे थे। श्याम और राम को देख कर  रामप्रकाश चौकें वह तो उनके स्कूल के  ही बच्चे हैं। वह भी मेरे बेटे के साथ। वह उनकी हरकतों को नोट करने लगे।

श्याम भानु से बोला तुम्हारे पापा को पता चला तो वह भी तुम्हें मारेंगे। अध्यापक का बेटा होकर यहां। तुम यहां से चले जाओ। भानू बोला मेरा भी पढ़ाई में मन नहीं लगता। मुझे गणित में बहुत ही डर लगता है। राम बोला मुझे भी गणित से बहुत ही डर लगता है। हम बच्चे हैं। मार से हम डरते हैं। श्याम बोला मुझे तो वाटिका में रहना बहुत अच्छा लगता है। श्याम बोला क्यों ना हम  वाटिका को ही  अपना स्कूल बनाएं। यहीं बैठ कर पढ़ाई किया करेंगे।

राम  बोला कैसे? मैं तुम्हें यहां गणित करवाऊंगा मैं तुम्हारा अध्यापक और तुम मेरे शिष्य। तुम्हें गणित में क्या नहीं आता है? राम और भानू

बोले + घटा गुणा भाग का चक्कर समझ में नहीं आता है कभी 9+9 =18कैसे। पहाड़े याद ही नहीं होते हैं। जमा और घटा भी समझ में नहीं आते हैं। गणित में जीरो आता है । प्रकाश उनके सामने ही खड़े हुए थे।  सब सुन रहे थे श्यामू बोला आज मैं तुम्हें + – गुणा भाग सब सिखाऊंगा। ध्यान से देखो श्याम ने  सब बच्चों को गमलों के माध्यम से गणित के सवाल सिखा दिये। राम ने उन्हें  पतियां फल और फूल की जानकारी दी। अध्यापक यह देखकर हैरान रह गए कि यह बच्चे अब बहुत ही खुश नजर आ रहे थे। खेल-खेल में ही वह एक दूसरे से सब कुछ सीख गए थे। उनके पास कोई भी किताब नहीं थी। फूलों और गमलों के माध्यम से वह सब कुछ समझ गए थे।  भानू बोला अब हमें जमा घटा गुणा भाग से डर नहीं लगेगा। रामप्रकाश श्याम के तरीके को सुनकर और उसे ऐसे पढाता देख जैसे एक अध्यापक बच्चे को पढा रहा हो बहुत ही खुश हुए। वह अपनें मन में खुश हो रहे थे।। क्यों न मैं बच्चों की सी डी बना लेता हूं? उन्होंनें  अपनें फोन से बच्चों की सीडी बना दी।

राम बोला मैं तुमसे विज्ञान के प्रश्न तुम्हें वाटिका के माध्यम से सिखाऊंगा। रामप्रकाश जी यह देख कर हैरान हो गये चलो कोई बात नहीं इन का टेस्ट स्कूल में लिया जाएगा।

दूसरे दिन जब स्कूल में मैडम ने बच्चों से पूछा कि आज तुम्हारा टेस्ट लिया जाएगा। वह भी हमारे सामने। तुम नकल करके पास हो जाते हो। राम बोला मैडम मैं  वाटिका में बैठकर पहाड़े जमा घटा गुणा करना चाहता हूं। रामप्रसाद जी ने उसे वाटिका में जाने की इजाजत दे दी। जब दोनों के इतने अच्छे अंक आए तो मैडम जल भुनकर हैेड-मास्टर के पास चली गई।  इन दोनों बच्चों ने चीटिंग की है। ना जाने किसकी। राम- प्रकाश जी बोले इन दोनों बच्चों ने कोई चीटिंग नहीं कि आज हमें भी इन बच्चों ने एहसास करवा दिया है कि बच्चे एक दूसरे से या व्यवहारिक ज्ञान के रूप में कहीं भी कुछ भी सीख सकते हैं। किताबी ज्ञान कुछ नहीं होता। मैं इन दोनों को समझता था यह दोनों होनहार छात्र नहीं है। यह दोनों ही तो स्कूल के होनहार छात्र हैं। अन्तर इतना है कि वह दोनों पढ़ाई को गंभीरता से नहीं लेते। इन दोनों में ज्ञान की कमी नहीं है। हेडमास्टर मास्टर को और अध्यापकों को जब उन दोनों के बारे में बताया कि एक दूसरे को गणित और विज्ञान  ये दोंनों स्कूल के बाहर वाटिका में एक दूसरे को सिखा रहे थे। मैं भी उनके ज्ञान को देखकर चौंक गया। मैंने उन दोनों की cd भी बनाई है। जब उन्होंने यह सीडी स्कूल में चला कर दिखाई जहां पर श्यामू और रामू को + -गुणा  भाग का ज्ञान वाटिका में दे रहा था। आज रामू के 40 मार्क्स आए  थे। जिस बच्चे को गुना से डर लगता था। उसके  गणित  के सारे सवाल ठीक थे।  मैडम  नें कहा  कि हमें भी अब बच्चों को किताबी ज्ञान न दे कर उन्हें व्यवहारिक तौर से समझाना चाहिए। बच्चे एक दूसरे को ज्यादा सिखा सकते हैं। एक बच्चे को ट्रेन्ड कर दो तो वह सभी बच्चों को ट्रेन्ड कर देगा। उन्होंने बच्चों को मारना पीटना छोड़ दिया और बच्चों को बाहर खुले मैदान में ले जाकर पढ़ाने लगे। बच्चों ने स्कूल से भागने का प्रोग्राम कैंसिल कर दिया था। वह भी पढ़ाई में आनंद लेने लग गए थे। अध्यापक जो भी  प्रश्न पूछते उनके हल वह सबसे पहले करते। इस कहानी को लिखनें का उदेश्य  यह है कि हमें अपनें बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए। बच्चों को प्यार से समझाना चाहिए। अगर स्कूल जानें से बच्चा कतराता है तो खोजें आप का बच्चा ऎसा क्यों कर रहा है? आप अपनें बच्चे को डांटे नहीं उसे प्यार से पूछे वह आप को सब कुछ बताएगा। आप उसे डराएंगे तो वह इधर उधर भटकेगा।

Posted in Uncategorized

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *