विचारधारा

रूपेश का तबादला एक छोटे से गांव में हुआ था। वह पेशे से एक अध्यापक था। उसके सहकर्मियों ने उससे शादी की बात चलाई कि हमने तुम्हारे लिए एक लड़की देखी है। वह लड़की इसी शहर अहमदाबाद में रहती है। तुम्हें विन्नी से शादी करने में कोई एतराज तो नहीं। उस लड़की के पिताजी भी पहले गांव में रहते थे। काफी वर्षों के पश्चात वह दिल्ली में ही बस गए थे। सुमन का जन्म भी दिल्ली में ही हुआ। उसमें संस्कार तो अपने माता-पिता के ही थे। तुम कहते हो तो हम उस लड़की के साथ तुम्हारी बात चलाएं। रुपेश ने हां में सर हिला दिया। वह दिन भी आ गया जब सात फेरों के पश्चात बिन्नी उसकी पत्नी बन गई। विनी को भी उसके माता-पिता ने दसवीं तक पढ़ाया। वह जैसे ही घर में दुल्हन बनकर आई सारी औरतों ने उसे घेर लिया था। वह गांव के माहौल से बिल्कुल अनभिज्ञ थी। गांव की औरतों ने उससे कहा बेटा एक बात का हमेशा ध्यान रखना बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेना। वह जब पैर छूने लगी तो उसे कहा कि इस तरह पैरों को नहीं छूते। वह शहरी वातावरण में पली बढी। अपनी पढाई के पश्चात्उसकी शादी गांव में हो रही थी। उसके माता पिता थे तो गांव के। वह औरते बोली बेटा कंहा खो गई। अपनी चुन्नी के पल्लू को लगाकर पैरों को छूते हैं। शादी के 2 दिन हो चुके थे। घर में अभी भी लोगों का आना-जाना चल रहा था। विनी की चुन्नी सिर से नीचे सरक गई। एक वृद्ध महिला ने उसे देख लिया बोली बहू हमारे यहां तो हमेशा सिर पर चुन्नी रखनी पड़ती है। अभी से अभ्यास कर लो वरना तुम्हें बहुत कुछ सुनना पड़ जाएगा।

रुपेश ने विनी को बताया कि मेरे घरवाले रूढ़िवादी विचार के हैं। तुम्हें इनकी बात का मान तो रखना ही पड़ेगा। कहीं ना कहीं मैं भी यही समझता हूं कि तुम्हें हमारे रीति रिवाजों ख्याल रात को तो समझना ही चाहिए। विन्नी ने कहा ठीक है। वह अपने साथ विन्नी को गांव लेकर लेकर आ गया था।
शादी के बाद ससुराल में आई तो सबसे पहले कहा गया कि घूंघट डालकर खाना बनाओ। पहले दिन तो जैसे तैसे घुंघट डालकर खाना बनाया। जब पैर फिसला और गिर गई तब कहीं ससुराल वालों ने कहा बेटा घुंघट थोड़ा निकालो पर निकालो जरूर। खाना बनाते-बनाते चूल्हे में फूंक मारते मारते आंखें ऐसी बन्द हो गई मानो ना जाने कितने दिनों से रोई हो। शादी के दो-तीन दिन बाद गांव की औरतों ने मिलकर कहा कि हमें कुछ बनाकर खिलाओ। उसनें जैसे-तैसे करके हलवा बनाना तो कोई कहता इसमें मीठा ज्यादा है कोई कहता बहुत ज्यादा घी है। कोई कहता जला हुआ हुआ हलवा बनाया है। सारा दिन कोल्हू के बैल की तरह रसोई में काम करते-करते सबको खाना बनाते-बनाते शाम हो गई। आराम करने का और अपनी ओर ध्यान देने का वक्त ही नहीं मिला। 4:00 बजे सुबह उठ कर पहले रसोई की लिपाई करो। फिर नहाने के बाद खाना तैयार करो। फिर अपने सास-ससुर के पैर छूकर आशीर्वाद लेने के बाद घर का सारा काम करो।

गांव की बड़ी-बूढी कहने लगी कि तुम यहां पर बहू बनकर आ गई हो तो हमारे रीति रिवाज भी तुम्हें समझने पड़ेंगे। सबसे पहले औरों के बारे में सोचो फिर अपने बारे में। जब श्वेता होने वाली थी तो कहा गया कि काम करो तब भी जरूरत से ज्यादा काम लिया गया। एक दिन जब सीढ़ियों पर से पैर फिसला और डॉक्टर ने कहा कि तुम देख कर नहीं चल सकती तब भी गांव वाली जेठानी और सास नें कहा डॉक्टर लोग तो ऐसे ही कहते रहते हैं। तुम्हें कुछ नहीं होगा हम भी तो तुम्हारी अवस्था से गुजरे हैं। तुम ही एक अनोखी औरत नहीं हो जो बच्चे को जन्म देने जा रही हो।

उसकी पत्नी विन्नी बोली मुझे भी नौकरी करनी है। वह बोला नहीं तुम नौकरी नहीं करोगी। वह चुप हो गई। उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि कहीं उसनें अपनी शादी गांव में करके अपनें पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली हो।

वह नौकरी अवश्य ही करेगी। अपने पैरों पर खड़ी होकर अपने परिवार का साथ देगी। उसका पति बोला नहीं हमारे यहां घर की बेटियों से काम नहीं करवाया जाता। अगर घर की बेटी किसी पराये पुरष से बात भी कर ले तो भी हीन भावना की दृष्टि से देखा जाता है। उस पर बहुत ही गंदा लांछन लगाया जाता है। विन्नी अपने आप से कहने लगी कि उसके माता-पिता ने उसकी शादी ऐसे व्यक्ति से कर दी परंतु अब तो वह इस व्यक्ति से सदा के लिए शादी के बंधन में फंस गई। यह तो पुराने ख्यालात का है। धीरे-धीरे समय आने पर वह इन में परिवर्तन ला कर ही रहेगी। वह अपने आपको भाग्य के भरोसे छोड़ देगी। धीरे-धीरे समय पंख लगा के उड़ गया। पता ही नहीं चला उसके घर में एक छोटे से मेहमान का आगाज होने वाला है। उनके साथ ही शहर मे आ गई।

रुपेश जल्दी से ही घर आने को तत्पर था आज तो उसको बहुत ही बड़ा खजाना हाथ आने वाला था। वह जल्दी जल्दी अपना काम समाप्त करके घर की ओर रवाना हुआ और मन ही मन सोचने लगा की लड़की होगी या लड़का होगा। लडका होगा तो वह मेरे बुढ़ापे का सहारा होगा। उसे लड़की पैदा हुई तो क्या होगा? उस के सपनों पर पानी फिर जाएगा। जैसे ही वह घर की ओर कदम बढ़ा रहा था रास्ते में उसे बड़ी जोर की ठोकर लगी। वह नीचे गिर कर संभल कर खड़ा हो गया। नहीं मुझे जल्दी से घर पहुंचना है। जैसे उसने अपने घर की घंटी बजाई उसे अपने घर से बच्चे की रोने की आवाज सुनाई दी नर्स ने दरवाजा खोला उसने पूछा कि सिस्टर बताओ क्या हुआ। वह खुश हो कर बोली तुम्हारी पत्नी ने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया है। वह सुन्न सा हो गया। उसकी आंखों में खुशी नाममात्र को भी नहीं थी। वह अंदर गया और बिन्नी की तरफ देख कर कहा तुम ठीक हो ना। उसने एक बार भी अपनी बिटिया को गोद में लेकर प्यार नहीं किया। उसके दोस्तों ने तो उसे कहा ओह बेटी हुई है। चलो कोई बात नहीं तुम्हारे भाग्य में शायद बिटिया ही लिखी थी। वह अपने आप को कोसनें लगा कि मैंने क्यों शादी की? बेटे की जगह बेटी पैदा हो गई। बेटे को लेकर उसने ना जाने कितने सपने देखे थे। वह सब मिल कर खाक हो गए।

बिन्नी ने अपने पति को कहा क्या बात है? तुमने अपनी बिटिया को गोद में भी नहीं लिया। क्या बात है? वह रुंधे गले से बोला उसके यहां बेटी का जन्म लेना बहुत ही बुरा माना जाता है। बेटी को पैदा होते ही या तो मार दिया जाता है या उसकी जल्दी ही शादी कर दी जाती है। ताकि वह अपने घर से जितनी जल्दी से जल्दी विदा हो जाए। उसने अगर कोई गलत कदम उठा लिया तो सारे परिवार के दामन में कलंक लग जाता है। विन्नी बोली नहीं मैं ऐसा नहीं मानती। मुझे तुम पर भी दुःख होता है और तुम्हारी सोच पर भी। कहने को तो आप एक अध्यापक हो।आप जब गांव वालो के मन से इस कुरीति को नही निकाल सके तो आप विद्यालय में बच्चों को क्या सिखाओगे। मैं तो अपनी बेटी को आगे अवश्य पढाऊंगी अगर तुम मेरे रास्ते में आए तो मैं तुम्हें भी सदा के लिए छोड़ कर चली जाऊंगी। आज मेरी बात कान खोलकर सुन लो मैं भी नौकरी करूंगी। मैं भी पढ़ी लिखी हूं अपनी बेटी को अच्छी शिक्षा देना मेरा फर्ज है। अपने पति को समझा-बुझाकर अपने बच्ची को पढ़ाने का निश्चय कर लिया। धीरे धीरे वक्त गुजरता गया। उसकी बेटी पांचवी कक्षा में पढ़नें लगी थी

रुपेश सचमुच में हीअपनी बेटी को प्यार नहीं करता था। वह उसे हर समय काम में लगा कर रखता था। वह उसे कहता बेटा चलो बर्तन साफ करो। सफाई करो। झाड़ू लगाते सोच रही थी पापा तो मुझे कहीं भी नहीं ले जाते। उनकी बेटी अपने आप को बिल्कुल अकेला महसूस करती थी। मेरे पापा मुझसे इतना काम करवाते हैं। अपनी सहेलियों को देखती उसके पापा उन्हें छोड़ने स्कूल जाते हैं। उन्हें तरह-तरह के कपड़े दिलवाते हैं। उन्हें ढेर सारी मिठाइयां लेकर आते हैं। सचमुच में ही उसके पापा उससे प्यार ही नहीं करते उसे कुछ भी नहीं समझते। वह तो उसे एक बोझ समझते हैं।

वह आठवीं की परीक्षा पास कर चुकी थी तब उसे सब कुछ समझ आ चुका था कि उसके यहां बेटी का जन्म लेना बहुत ही बुरा माना जाता है। बेटी को पढ़ाना भी पाप समझा जाता है उसे तो बस शादी करके दूसरे घर जाना होता है ताकि उस को विदा कर के अपने घर से सदा के लिए छुटकारा पाए।

एक दिन श्वेता मैडम बच्चों को पढ़ा रही थी कि हमारे समाज में लड़की का पैदा होना अभिशाप है। जिस घर में अभी भी बेटियों को शिक्षा नहीं दी जाती। उनसे बुरा व्यवहार किया जाता है। माता पिता के मन में पुराने संस्कार भरे हुएं है उन सभी के मन से तुम बेटियां हीं अपने माता पिता को रूढ़िवादी संस्कारों मान्यता से बाहर निकाल सकती हो तो मैं समझूंगी कि मेरा लड़कियों को शिक्षा देना व्यर्थ नहीं गया। इस बुराई ने हमारे समाज की व्यवस्था चरमरा दिया है।

जब हमारी नवयुवतियां और नवयुवक अपने मां बाप को अपने बुजुर्गों से इस दकियानूसी संस्कारों को और नकारात्मक विचारों को बाहर नहीं निकालेंगे तब तक हमारी समाज की आधी से ज्यादा लड़कियां पढ़ाई से वंचित रह जाएगी। जब वह पढ़ाई से वंचित रह जाएंगी वह अपने ससुराल जाकर अपने बच्चों को नहीं पढ़ाएंगे। उनमें अच्छे संस्कार नहीं दे पाएंगे। तुमने ही तो अपने माता-पिता के मन से इन कुरीतियों को जड़ से बाहर फेंक कर उन्हें उजाले की किरण दिखानी है।

श्वेता ने अपनी मैडम की बातों को गौर से सुना उन्हें अपने मैडम की बातों में सच्चाई नजर आई क्योंकि वह ही तो सच्चाई का जीता जागता उदाहरण थी। उसके पिता अभी तक उसे वह प्यार नहीं दे पाए जो एक पिता अपनी बेटी को देना चाहता था।

श्वेता ने भी कसम खा ली कि वह अपने पिता को इस बुराई से निकलवाने में उनकी मदद करेगी। वह खूब मेहनत करके पढ़ने लगी। वह कक्षा में प्रथम आई। उसके पिता उसका परिणाम देखकर खुश नहीं हुए। उसे तो यह सब पता ही था कि उसके पिता उसका परीक्षा परिणाम जान कर भी खुशी नहीं मनाने वाले।

श्वेता के पिता के दो दोस्त अंकल थे। वह हमेशा उनके घर आते जाते रहते थे। जब उन्होंने सविता का परिणाम देखा तो भी हक्के-बक्के रह गए। श्वेता ने तो प्रथम स्थान प्राप्त किया था। वह श्वेता के घर आकर बोले कि मिठाई खिलाओ। आपकी बेटी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। साथ ही साथ उन पर व्यंग करते हुए बोले अगर आज आप के बेटा होता तो आपकी खुशी दुगनी होती। चलो कोई बात नहीं दसवीं तक तो उसे पढ़ा ही देना। उसकी शादी जल्दी से जल्दी कर देना। तुमने उस से नौकरी थोड़ी करवानी है। दूसरे दोस्त भी बोले। रुपेश दोस्त प्रथम आने से क्या होता है? नकल करके भी प्रथम आ जाते हैं। तुमने अपनी बेटी को पढ़ लिखकर डॉक्टर थोड़े ही बनाना है। रुपेश उनकी बातों में आ गए। अरे यार तुम दोनों ठीक ही कहते हो। अगर आज बेटा होता तो मेरा सिर गर्व से ऊंचा हो जाता।

बिन्नी आकर बोली हमारी श्वेता क्या किसी बेटे से कम है? मैं तो इसे बेटे की तरह ही देखती हूं। रुपेश ने अपनी पत्नी को चुप कर दिया। जब हम दोस्त बात कर रहे होते हैं तब तुम बीच में मत बोला करो। श्वेता को अपने पिता की बात बुरी लगी। श्वेता बोली नहीं पापा, आप बिल्कुल गलत सोचते हैं। मैं तो खूब पढ़ूंगी

रुपेश ने अपनी बेटी को डांटकर चुप करवा दिया। श्वेता को दोनों अंकल पर गुस्सा आ रहा था। वह दोनों ही मेरे पापा को भड़का रहे हैं। वैभव और विनय अंकल की बात उस नन्ही सी श्वेता को चुभ गई। वैभव और विनय अंकल की बेटे भी उनके साथ स्कूल में पढ़ते थे। वैभव का बेटा भी उनके साथ स्कूल में पढ़ता था। श्वेता ने सोचा क्यों ना मैं विनय और वैभवअंकल के घर जा कर पता करुं कि वह बेटियों के बारें में इतनी नकारात्मक सोच क्यों रखतें हैं। श्वेता अपने दोस्त अभिषेक के घर गई। वह घर में आते ही बोली आंटी जी नमस्ते। अभिषेक कंहा है। आंटी बोली बाहर खेल रहा है। वह बोली आंटी शाम को मैं उस से मिलने आऊंगी।

वह अपनें घर आकर सोचने लगी कि इन दोनों अंकल ने उसके पापा को क्यों बेवकूफ बनाया? वह कहते हैं कि बेटियों को पढ़ाना नहीं चाहिए मगर वे दोंनो अपने बेटों के बारें में कैसी सोच रखते हैं यह तो उनके घर चल कर पता करना पडेगा। एक मेरे पापा हैं जो दोस्तों के बहकावे में आकर मुझसे नफरत से पेश आते हैं। मुझे आगे पढ़ाना नहीं चाहते। मैं अपने पिता के सिर से झूठ के इस नकाब को जल्दी ही निकाल दूंगी।श्वेता अपने माता पिता को विनय और वैभव अंकल के घर ले कर गई। दोंनो परिवार इकट्ठे रहते थे। वैभव और विनय भाई भाई थे। श्वेता अपने पापा से बोली पापा मै आज आप को अपनें दोस्तों के घर ले कर आई हूं ताकि आप को बता संकूं कि वे लडकियों के बारे में इतनी गल्त सोच क्यों रखते है? उसके ममी पापा उसके साथ चल पडे जैसे ही उन्होंने दरवाजा खटखटाया लाईट गई हुई थी। अन्दर की आवाज साफ बाहर आ रही थी। रुपेश के दोस्त कह रहे थे कि हम तुम दोंनो को बोल बोल कर थक गए पढा करो मगर लगता है तुम दोनों तो मेरी नाक कटा कर ही छोडोगे। तुम दोंनो से अच्छी तो मेरे दोस्त की बेटी है जो इतनी होशियार है। वह तुम से ज्यादा बाजी न मार जाए इसलिए तुम्हे समझाना चाहते है पढा करो। हम अपने दोस्त को उकसाते रहतें हैं कि अपनी बेटी को मत पढाओ।
हमें बहुत दुःख होता है। तुम बेटा होकर हमारा नाम डूबा दोगे। हमारा दोस्त तो गौ है वह क्या जानें हमारी पैंतराबाजी। उनकी लडकी बहुत ही होशियार है। देखना वह डाक्टर बन कर ही रहेगी। रुपेश को अपने दोस्तो की छल कपट की बात समझ में आ गई थी। वह अपनी बेटी को बोला बेटी मै गल्त था जो अपने दोस्तो के बहकावें में आ कर तुम पर न जाने क्या क्या अत्याचार करता रहा। बेटी अब मैंज्यादा देर यहां खड़ा रहा तो मैं अपनें गुस्से को काबू नहीं कर पाऊंगा। ऐसे भी लाईट नही है बैल बजी नहीं होगी।
जल्दी घर चलते हैं। वह अपने ममी पापा के साथ घर वापिस आ गई। आपको तो यह कहकर आपके मन में जहर भर दिया कि आप अपनी बेटी को ना पढ़ाएं। उनकी अपने बच्चों के प्रति क्या राय है? यह तो अब आपने देख ही लिया और सुन भी लिया।

वैभव और विनय की सच्चाई का खुलासा रुपेश को हो चुका था। रुपेश सोचने लगा कि मेरे दोनों दोस्त घर पर आये होते तो उनसे अवश्य पूछता कि तुमने मुझे बेवकूफ बनाया। मैं भी कितना मूर्ख था। सच्चाई बिना जाने ही अपने दोस्तों की बातों में आकर अपनी बेटी के साथ बुरा बर्ताव कर रहा था। मैंने तो उस बेचारी के साथ बहुत ही अन्याय किया। मैं उसे
शिक्षा से वंचित रखना चाहता था। मेरी पत्नी ने पहल नहीं की होती तो मैं अपनी बेटी को जरा भी नहीं पढ़ाता। अपने दोस्तों को तो मैंने देख लिया सामने तो मेरे हितैषी बनते हैं पीठ पीछे वार करते हैं। आज मुझे समझ आ चुका है। वह चुपचाप अपनी बेटी के पास आकर बोला बेटा मुझे माफ कर दो।।

वह बोली जब अंकल एक दिन हमारे घर आए हुए थे तो मैंने छिप कर उन दोनों की बातें सुन ली थी। मैं बाहर बाल्कनी में थी। वे कह रहे थे इस को भड़काने ही पडेगा। अगर वह अपनी लडकी को बाहर पढने भेज देगा तो इस की लडकी तो डाक्टर बन जाएगी। हमारे बेटे तो नालायक हैं ऐसे बेटों से तो बेटियां ही अच्छी है। आपके सामनें कुछ और पीठ पीछे क्या खिचड़ी पका रहे थे। वह तो अब आप को समझ आ ही गया होगा। इसलिए मैं आप दोनों को उनके घर ले कर गई थी। मेरे कहनें से तो आपको ये ही लगता कि मैं झूठ बोल रही हूं।

मैं एक अध्यापक हूं। मैंनें तुम्हें पढ़ने के लिए समय दिया होता तो तुम और भी आगे बढती। तुम तो बहुत ही होनहार हो। तुमने मुझ में परिवर्तन लाकर मुझे एक नई दिशा प्रदान की है। बेटी मैं तुम्हारा गुनहगार हूं। तुम अपनी पढ़ाई की तरफ ध्यान दो।

रुपेश ने अपनी पत्नी को कहा कि मैं भी अपने दोस्तों को कुछ भी नहीं बताऊंगा। उनकी हां में हां मिला लूंगा। श्वेता ने डॉक्टर की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। PMT में सिलेक्ट हो गई। मुकेश ने अपनी बेटी को डॉक्टर की पढ़ाई के लिए भेज दिया। उसके दोस्तों ने रुपए को कहा कि आप अपनी अपनी बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए बाहर क्यों भेज रहे हो?उसे डाक्टरी क्यों करवा रहे हो? आप तो कहते थे कि हम अपनी बेटी को नहीं पढ़ाएंगे।

वह बोला कि मेरी बेटी ही मेरी शान है
मैं उसे अवश्य डॉक्टर बनाऊंगा। मैंने अपनी इस परिवर्तन शीलता का असली श्रेय अपनी बेटी को देता हूं ताकि मेरे दिमाग से झूठ की परत खुल सके। मैं अब अपनी बेटी को डॉक्टर बना कर ही रहूंगा। मैं आप दोनों के बहकावे में आ कर अपनी बेटी के साथ बुरा करता रहा। अब मेरी आंखें खुल चुकी है उसकी बेटी डॉक्टर बन चुकी थी। वैभव के पिता ने अपने बेटे की शादी एक रईस बेटी से कर दी वह भी डॉक्टर थी।

अपने दोस्त की बेटी को डॉक्टर बनते देखकर उनसे इच्छा होती थी कि वह अपनी बेटी के लिए डॉक्टर पत्नी ही लाएंगे। जिस लड़की के साथ वैभव के पिता ने अपने बेटे की शादी की वह श्वेता की सहेली थी। वह अपनी बेटी को तो डाक्टर बना नही पाये मगर अपनी डाक्टर बहु ला कर फूला नंही समाए,।

उनके घर में भी खुशियों ने दस्तक दे दी थी। घर में छोटा मुन्ना आ गया था। डॉ सुनीता अपने बेटे की देखभाल नहीं कर सकती थी। वह अपने बेटे को उनके दादाजी के पास छोड़कर जाती थी। एक दिन डॉक्टर सुनीता का बेटा बहुत ही बीमार पड़ गया। डॉक्टर ने कहा कि इसको बच्चों के स्पेशलिस्ट डॉक्टर के पास ले जाना पड़ेगा। इसको हार्ट की बीमारी है। दिल की बीमारी है। हमारे छोटे से शहर में तो एक ही बच्चों की स्पेशलिस्ट डॉक्टर है। वह है डॉक्टर श्वेता। अगर आप अपने बच्चे को डॉक्टर श्वेता के पास नहीं ले गए तो वह नहीं बच सकता। डॉक्टर श्वेता ही हार्ट की स्पेशलिस्ट हैं। इतना छोटा सा बच्चा।

डॉक्टर सुनीता भी घर पर नहीं थी वह कुछ दिनों के लिए अपने मायके गई हुई थी। डाक्टर सुनीता का बेटा आशु अपने दादाजी के पास था। उसके दादाजी और वैभव दौड़ते-दौड़ते डॉक्टर श्वेता के क्लीनिक का पता करते-करते उनके घर पहुंचे। परंतु वह भी उन्हें घर पर नहीं मिले घर पर ताला लगा था। वह सीधे डॉक्टर श्वेता के क्लिनिक पर अपने पोते को लेकर गए। वैभव के पिता सोचने लगे कि श्वेता ने हम लोगों से बदला लिया और उसे पता चल गया कि यह वैभव अंकल का पोता है तो वह अपना सारा बदला मेरे पोते से निकालेगी। उनके पिता वैभव से बोले हमें यहां इलाज नहीं करवाना है। हम कहीं और चलते हैं। वैभव बोला नहीं हम यही चलते हैं। और क्लीनिक ढूंढते-ढूंढते अगर मेरे बेटे को कुछ हो गया तो मैं जिंदगी भर अपने को माफ नहीं कर पाऊंगा। आप रहने दो पापा। वैभव का बेटा अनुराग जल्दी-जल्दी श्वेता के क्लीनिक पहुंचा उसने कहा डॉक्टर साहब के मेरे बेटे को जल्दी देखिए। डॉकटरश्वेता बोली आप घबराइए मत आपके बेटे को कुछ नहीं होगा। उसने जल्दी से उसे अस्पताल में दाखिल कर दिया और इंजेक्शन भी लगा दिया। धीरे-धीरे शाम तक उसमें सुधार आ गया। वैभव की ओरदेख कर बोली बाबा आप कहां से आए हैं। श्वेता नें उन्हें नही पहचाना। सविता के पैरों पर पड़ कर बोला बेटा तूने हमें नहीं पहचाना। यह मेरा बेटा अभिषेक और यह उसका बेटा आशु है। मेरा पोता है तुमने मुझे इसलिए नहीं पहचाना मैं बहुत ही बूढा हो चुका हूं। तू तो मेरे दोस्त रुपेश की बेटी है। और अभिषेक भी तुम्हारी सहेली सविता के साथ ही पढता था। वह बोली हां अंकल अब पहचान लिया है। वह डॉक्टर श्वेता के पैर पकड़कर बोला

बेटी हमें माफ कर दो। हमने तेरे साथ बहुत ही अन्याय किया। तुझे हमने बहुत ही गलत समझा। आज तू ने दिखा दिया कि जो काम एक बेटा कर सकता है वह एक बेटी भी कर सकती है बल्कि उससे ज्यादा ही अच्छा कर सकती है। हम तेरे पिता को हमेशा उकसाते रहे अपनी बेटी को मत पढा। बाहर पढ़ने मत भेज। मगर हम गलत हैं। हमारी सोच में नकारात्मकता की बात थी। हम अपने दोस्त की कामयाबी नहीं देखना चाहते थे। हम चाहते थे कि हम ही उससे आगे बढ़े। हमारे अंदर एक अहंकार की भावना थी। अभी भी अपनें मन में यही सोच रहा था हम वंहा नहीं दिखाएंगे। कहीं तुम्हें पता चल गया कि यह वैभव अंकल का पोता है तो कहीं तुम इसके साथ बदला न ले लो। मगर मैं तो बहुत ही गलत था। मेरे मन में तुम्हारे प्रति जो गलत धारणा पनप गई थी वह सब आज समाप्त हो गई।

तुमने मुझे रुढ़िवादी विचारों को जड़ से फेंकने की सलाह दी है। तुम अपनी जांच की कसौटी में खरी उतरी। मेरी बेटी आज मैं भी अपनी बुरी दकियानूसी विचारधारा को जड़ से फेंक दूंगा। मैंने अभी बुरी रीति-रिवाजों को अभी से बाहर फेंक दिया। मैं अपने आने वाली पीढ़ियों को भी यही शिक्षा दूंगा कि बेटे और बेटी में कोई अंतर नहीं होता। अंतर होता है तो बस एक सोच का। अगर हम इस सोच को बदल दे तो हम पूर्वज नई पीढ़ी वाले बच्चों की जिंदगी को स्वर्ग बना सकते हैं। यह हमारे हाथ में है। उनकी विचारधारा अपनानी है या पुरानी दकियानूसी विचारधारा।, डॉ सुनीता भी क्लीनिक में पहुंच गई थी। वह अपनी सहेली श्वेता से मिलकर बहुत खुशी हुई। श्वेता के पापा रुपेश भी वहां क्लीनिक पर पहुंच गए थे। वह अपने पुराने दोस्तों के गले लगकर बोले जाओ हमने तुम्हें माफ किया।, वैभव ने अपने दोस्त से भी क्षमा मांगी और कहा कि यार मुझे माफ कर दे। मैं बहुत ही गलत था। मुझ में समझ की कमी थी। अब मैंने इस विचारधारा को अपना लिया है। श्वेता बोली अगर आप मेरे अंकल भी नहीं होते तो भी मैं एक बच्चे की जान बचाती। डाक्टर का काम होता है रोगी की जान बचाना। मैंनें अपना कर्तव्य निभा दिया है। वह बोले तुम्हारे जैसी बेटियों पर सबको नाज होना चाहिए।

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