होनहार मेताली

मेंताली एक सीधी-साधी और होनहार बालिका थी। दसवीं कक्षा में वह प्रथम आई। गणित में तो उसके 100 में से 98 अंक आए। उसके पिता एक मध्यमवर्गीय परिवार के थे। उनके पिता के पास अपनी बेटी को पढानें के लिए रुपए नहीं थे। उन्होंने कहा बेटा मैं तुम्हें आगे नहीं पढ़ा सकता क्योंकि घर में तुम्हारी बूढ़ी दादी है। तुम्हारी मां है। सब की जिम्मेदारी मुझ पर है। वह बोली कोई बात नहीं पिता जी अगर आप मुझे पढ़ा नहीं सकते तो मुझे एक साल सिलाई अवश्य दिखा देना। वह बोला बेटा सिलाई की शिक्षा में तुम्हें दिला ही सकता हूं। उसके बाद ही तुम्हारे हाथ पीले कर दूंगा।

 

मेताली शर्मा कर चली गई। उसे सिलाई का बहुत शौक था। वह पढ़ाई के साथ-साथ अपना शौक पूरा नहीं कर सकती थी। उसके पड़ोस में एक आंटी थी। उसका नाम था श्रुति। वह सिलाई की शिक्षिका थी। कभी-कभी मेताली श्रुति आंटी के घर चली जाती। वह कहती आंटी मुझे भी सिलाई करना सिखा दिया करो मैं आपकी  किचन के कामों में हाथ बंटा दिया करूंगी। श्रुति उसको हर बार टाल ही दिया करती कहती तुम्हें तो मैं किसी दिन सिखा दूंगी। मेताली को कभी  कभी  लगता कि यह कैसी शिक्षिका है जो दूसरों को ज्ञान देना ही नहीं चाहती। वह कुछ कहती नहीं थी।श्रुती बहुत ही घमंडी थी।

वह दसवीं की परीक्षा में निकल गई थी। मेताली श्रुति के घर गई बोली अब तो मैं दसवीं कक्षा पास कर चुकी हूं। मैं भी सिलाई सीखना चाहती हूं। आप घर पर ही मुझे सिखा दिया करें। अगले साल से मैं आपका कोर्स अटेंड कर लूंगी। श्रुति बोली मेरी फीस ₹200 है। क्या तुम्हारे पिता मेरी फीस दे पाएंगे? मेताली ने जब यह सुना तो वह हैरान रह गई। उसने कहा आंटी आप ऐसा क्यों बोलती है? मेरे पिता ₹200 दे दिया करेंगे। थोड़े दिनों के लिए तो आप मुझे घर पर सिखा ही सकती हैं। वह बोली घर पर भी ₹200 देने पड़ेंगे। मेताली ने मन में संकल्प कर लिया कि वह तो सिलाई सीख कर ही दम लेगी।

 

श्रुति के एक बेटा था। वह गणित में कमजोर था उसके स्कूल में गणित में सबसे कम अंक आए थे। उस को ट्यूशन पढ़ाने वाला कोई नहीं मिल रहा था।  उसका घर गांव के बीच में था घर आकर उसे  मेताली के पास आना ही पड़ा वह हाथ जोड़कर मेताली से बोली मेरे बेटे को गणित में बहुत ही कम आता है। क्या तू मेरे बेटे को गणित पढ़ा देगी? इसके लिए मैं तुम्हें फीस भी दे दूंगी।

 

मेताली बोली आंटी जी आप अपने बेटे को मेरे पास भेज दिया करो। मैं उसे पढ़ा दिया करूंगी ज्ञान को तो जितना बांटो उतना ही बढ़ता है। मैं उससे कोई फीस नहीं लूंगी। आप मुझे शर्मिंदा कर रही है। पड़ोसी होने के नाते मैं उससे कोई फीस नहीं लूंगी। उस श्रुती का बेटा गणित में सबसे अच्छे अंक लाया। बच्चों ने उससे पूछा तुम किससे ट्यूशन पढी। श्रुति के बेटे ने सब बच्चों को मेताली का नाम बता दिया। बहुत सारे बच्चे मेताली के पास घर पर ट्यूशन पढ़ने आने लगे। वह सिलाई के लिए रुपये इकट्ठे कर रही थी। स्कूल में गणित का वार्षिक परिणाम सौ प्रतिशत रहा। सभी बच्चों ने कहा हम मेताली दीदी के पास पढ़ते हैं। स्कूल में प्राइवेट शिक्षिका का पद रिक्त था। मैडम ने उसे स्कूल में बुला लिया। वह स्कूल में शिक्षिका के पद पर नियुक्त हो गई। उसे स्कूल में प्राइवेट नौकरी मिल गई। उसकी स्कूल में बहुत सारी अध्यापक अध्यापिकाएं सहेलियां बन गई।

 

इस तरह अपने मेहनत के दम पर उसने बहुत सारे रुपए इकट्ठे कर लिए। एक दिन उसके चाचा जी उसके घर पर आए उन्होंने उसे बताया कि हम इंटरनेट के माध्यम से सभी जानकारियां हासिल कर सकते हैं। जो व्यक्ति पढ़ा लिखा होगा वह तो बहुत ही जल्दी सब कुछ ज्ञान हासिल कर सकता है। उसके चाचा ने उसे एक मोबाइल ला कर दिया। उसमें उसमें इंटरनेट का कनेक्शन भी लगवा लिया। एक दिन उसने सिलाई से संबंधित वीडियो देखें। उसकी सहेली ने बताया कि हम सिलाई के बारे में भी इस मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से जानकारी हासिल कर सकते हैं। मोबाइल से सलवार कमीज और अपने हाथ का बनाया हुआ सूट पहनकर आंटी के घर गई।  श्रुति ने पूछा तुमने सूट तो बहुत बढ़िया डाला है इसका डिजाइन किसने बनाया। वह बोली आंटी मैंने खुद बनाया है।  श्रुति हैरान रह गई।

 

मेताली के डिजाइन दार सूट देखकर लड़कियां भी उसके पास सूट देने आने लगी। दीदी आप ही हमारा सूट स्टिच करेंगे। यह देखकर श्रुति का खून खौल उठा। सारे के सारे ग्राहकों की लाइन मिताली के पास लग गई। वह उन्हें कहती मैं तो छुट्टी वाले दिन ही तुम्हारी ड्रेस सिल सकती हूं मगर वह कहती नहीं आप ही से हमने अपनी ड्रेस सिलवानी है।

 

श्रुति मन-ही-मन पछता रही थी। मेताली ठीक ही कहती है ज्ञान तो बांटने से बढ़ता है। मगर मैंने तो विद्या के बल पर घमंड कर डाला। धीरे-धीरे श्रुति में सुधार आने लग गया। श्रुति को समझ आ गया कि हमें अपने पास जो ज्ञान होता है जितना हम दूसरों की मदद करेंगे उससे अधिक हमारे ज्ञान में बढ़ोतरी होगी। श्रुति भी अब गरीब औरतों को मुफ्त सिलाई सिखाने लगी। उन्हें सिखा कर उसे जो खुशी हासिल हो रही थी  जितनी कि जिंदगी में उसे कभी खुशी नहीं मिली थी। उसके नए-नए दोस्त भी बन गए थे। उसके मन से ईर्ष्या का  गुबार हट चुका था  एक बार फिर वह  मिताली की सहेली बन गई थी ं।

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