अंधा और कुबड़ा

दो मित्र एक अंधा और कुबड़ा दोनों एक मोहल्ले में थे रहते।
मिल बांट कर खाते तथा इकट्ठे जीवन यापन करते।।
अंधे को लोग ज्यादा भीख थे दे दिया करते।
कूबडे को लोग कम थे पसंद किया करते।।

अंधे और कुबडे दोनों में ईर्ष्या की आग भड़की ।
एक दिन वह आग शोला बनकर थी पनपी।।
कूबडे ने अंधे से कहा कि भाई तुम तो बहुत ही होशियार।
मैं तुम्हारी तरह होशियार तो नहीं बल्कि हूं समझदार।।
कुबड़े को अंधा बोला भाई मैं भी तुम्हारे साथ ही रहा करूंगा।
तुम्हारे घर के सारे काम कर दिया करूंगा ।।
अंधे ने कुंबडे पर दया दिखलाई।
कुंबडे की चाल उसे समझ ना आई।।
दोनों खुशी खुशी एक साथ रहनें लगे।
मिल बांट और कमा कर खानें लगे।।
कुबड़ा घर के सारे काम था कर दिया करता।
अंधे को पका कर खिला दिया करता।।
कुबडे के मन में एक दिन फिर ईर्ष्या का आवेश था आया।
वह मन ही मन अंधे को मारने की योजना का विचार मन में लाया।।
एक दिन रात के समय वापिस आते वक्त पहाड़ी के पास से चलते वक्त कुबडे नें अंधे को जानबूझकर नीचे था गिराया।
अंधा नीचे गिर कर एक कंटीली झाड़ी से था जा टकराया।।
झाड़ी को पकड़ कर अंधा सहायता के लिए जोर से चिल्लाया।
कुंबडे ने न चाहते हुए भी अंधे को बाहों से खींच कर ऊपर उठाया।।
अंधे ने कुबडे पर आक्रोष जताया।
तुम नें मुझे जानबूझ कर नीचे था गिराया।।
कुबड़ा बोला भला मैंने ऐसा क्यों करूंगा?
अपने दोस्त से भला छल क्यों करूंगा?
कुबड़े ने अपनें दोस्त को प्यार से सहलाया।
अपने पैर में कांटा चुभ जानें का नाटक रचाया।।
मेरे पैर में कांटा था चुभ गया।
जिस कारण तुम्हारा हाथ था छूट गया।।
अंधा मौन रह कर सारी बात था समझ जाता।
वह कुंबडे से बच कर काम पर था निकला करता।।
एक दिन कुबड़ा बोला भाई तुम्हारे जन्मदिन का तोहफा लाया हूं।
एक स्वादिष्ट मछली पकड़ कर तुम्हारे लिए लाया हूं।।
इसे तुम्हें मैं अपनें हाथों से पका कर खिलाऊंगा।
तुम्हारे प्रति अपना प्यार जाहिर कर पाऊंगा।।
तुम केवल इसको बार बार कड़छी से हिलाते रहना।
हम दोनों को तुम ही अपनें हाथों से पेश करना।।
अंधे नें बार बार कढ़ाई में कड़छी चलाई।
कुंबडे की चाल उसे समझ न आई।।

उसकी आंखों से लगातार पानी था बहार आया।
पानी अंधे की आंखों की रौशनी ठीक कर पाया।।
अंधे नें कढ़ाई में सांप के मरे टूकडे देख कर हैरानी जताई।
उसे तब कुबडे की सारी चाल समझ में आई।।
कुबड़ा जैसे ही घर के अन्दर आया।
अपनें क्रोध का बाण उस पर चलाया।।
अंधे नें उस पर डंडे का प्रहार कर उसे मार गिराया।
डंडे के प्रहार से कुबड़ा ऊपर उठ कर अंधे पर जोर जोर से चिल्लाया।।
वह उसको मारनें के लिए नहीं बल्कि उसकी आंखें ठीक करनें के लिए ही सांप था लाया।
अंधा भी मुस्करा कर बोला म़ैंनें भी तुम्हारा कुबड़ ठीक करनें के लिए ही तो डंडा था उठाया।।
मैंने भी तुम्हारा कुबड़ ठीक कर डाला।
कुबड़ा बोला मैंने भी तो तुम्हारी आंखों में अंधेरे से उजाला कर डाला।।
कुबड़ा भी सीधा चल कर खुश हो कर बोला।
आओ भाई एक दुसरे के गले लग जाएं।।
अंधा बोला हां एक दूसरे से वैर भाव मिटा कर इस कहानी से कुछ सीख लें पांए।
अंधा बोला हम दोनों हैं नहले पर दहला।
आओ एक दूसरे की गलतियों से सीख लें कर मन न करें मैला।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *