उन्मुक्त गगन के पंछी

  उन मुक्त गगन के हम पंछी

 नभ में विचरण करने वाले।

हम खग , नभचर , और विहग हैं कहलाते।

दिखनें में हैं हम अति सुन्दर,मनभाते।

,तभी तो अपनी जान हैं गंवाते।।

कभी शिकारी पकड़ कर हमें ले जातें हैं। 

हमें कठपूतली बना कर अपनें इशारों पे नचातें हैं।

पक्षी विक्रेता को बेच कर हमें पिंजरों में कैद करवाते हैं।।

हमारी वेदना  की चित्कार कहां कोई सुनने वाला?

हमारी व्यथा का दुखड़ा कहां कोई सुनने वाला?

वही विक्रेता तो हमारे भाग्य का फैंसला करने वाला होता।

हमें न जाने कैसे कैसे नाच है  नचवाता।

हमें बेच कर ग्राहकों को  अच्छा दाम है कमाता ।।

हमें पिंजरों में कैद करवा के  हमारे सुख चैन खोता है।

हमारे सुखों में आग लगा कर खुद चैन की नींद लेता है।।

 अपनों से बिछुडने का ग़म हमें हर पल सताता है।

अपनों की वेदना का अनुमान कौन लगा सकता है?

परिवार का दर्द हमें तडफाता है। हम उन्मुक्त गगन के पंछी।।

हम अपनी उड़ान भूल चुके।हम अपनी व्यथा भूल चुके। 

हम बंद  पिंजरे के पंछी हो कर अपना घर बार भूल चुके। 

हम बंद पिंजरे को ही अपना परिवार समझ बैठे।।

हम उन्मुक्त गगन के थे पंछी।

हम सुख चैन से थे जीनें वाले पक्षी।।

अपनें उड़ान की क्षमता को हम खो बैठे।

हम खुशी  के वातावरण में विचरना खो बैठै।

गगन में उड़ना हम भूल चुके। 

साथियों के संग चहकना भूल चुके।।

पिंजरे में कैद हो कर ही रह गए। 

हम पिंजरें में रहने को ही विवश हो गए।

हम इस पिंजरे को ही अपना घर समझ बैठे।

घर के परिवार वालों के साथ ही नाता लगा बैठे।

हम उन्मुक्त गगन के थे पंछी।। 

हम स्वच्छ्न्द वातावरण में थे विचरण करने वाले।

हम नभ में थे विचरण करनें वाले।

अपनें अधरों की मुस्कान भूल गए।

हम चहचहाट की सुखद अनूभूति  भूल गए।   

हम अपना घर बार भूल चुके।। 

पिंजरे को ही अपना घर मान चुके।

इससे ही है नाता हमारा ।

अब इसको हम पहचान चुके।।

हम इन के साथ ही जीना सीख चुके।

हम बंद पिंजरों में रह कर दिल लगाना सीख चुके।। 

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