कृषक कविता

त्याग तपस्या और श्रम की साक्षात मूर्ति है किसान।

नगरवासियों  के अन्न्दाता सृष्टि पालक हैं किसान।।

धूप गर्मी सर्दी वर्षा सब सहन करता  रहता।

भगवान विष्णु के समान जग का पालन करता रहता।

घास फूस की झोंपड़ीयों में रह कर दिन रात कोल्हू के बैल की तरह पिस्ता रहता हर दम  किसान।

सेवा और परिश्रम की जीती जागती मिसाल है इसकी पहचाना।।

स्वयं को मिट्टी में मिला कर फसल उगाता रहता।

फसलों को नष्ट होता देख देख कर खून के घूंट  पी कर भी  चुप्पी साधे रहता।

मन ही मन भाग्य का लेखा समझ कर मौन रहता ।

अपनें लहू की बूंदों को अन्न के दानों में बदल कर दिखलाता रहता।

सूर्योदय से पहृले उठता,शोचालय से निवृत हो जाता।

नहा धो कर अपनें बैलों को ले कर खेत की ओर अरुणोदय से पहले ही निकल जाता।।

किसान तो हैं सेवा और परिश्रम  का एक अनौखा वरदान।

हे प्रभु तुल्य,  इस जंहा में तेरी किमत कौन आंके ,इस बात से सब के सब है अनजान।।

हे कृषक तुझे हमारा शत शत प्रणाम।

हे धरती के बादशाह ,तुझे हमारा कोटि-कोटि सलाम।

तू तो है अपने ग्राम वासियों की एक अनौखी अमिट पहचान।।

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