दहेज(कविता)

दहेज है एक घोर अभिशाप।
कुरीतियों के विकसित होने से बन गया यह महापाप।।
दहेज रूपी नकाब नें समाज के मस्तक पर कलंक पोत डाला।
बेटियों के जीवन को अंधकारमय बना कर,
कितनी अबोध बालिकाओं को
खिलने से पहले ही रौंद डाला।।

न जाने कितनी और मसली जाएंगी।
इस कुरीति का शिकार हो फांसी लगा कर बेमौत मारी जाएंगी।।
बचपन में माता-पिता की दहलीज पर पली बढ़ी।
अनमोल हीरा समझकर पालन पोषण कर ढली।।
अश्रुपूर्ण धारा से विवाह कर ससुराल में आई।
अपने मधुर व्यवहार से ससुराल में अपनी एक पहचान बनाई।।
जहां लक्ष्मी बन पूजी थी जानी,
अब रुपया उगलनें वाली मशीन समझ बहला फुसला कर उस से कि मनमानी।
दहेज के नाम पर बेटी की कर डाली सौदेबाजी।
लड़की के शील गुण और सौन्दर्य की परख दहेज रूपी कलंक ने कर डाली।।
वर पक्ष की झोली नोटों से भर कर की गई सगाई।
दहेज न होने पर बेटी की नहीं की गई विदाई।।

दहेज रूपी जहर आपदाओं का है असीम सागर।
चिंता की है घोर छलकती गागर।।
घर के माता पिता की सुख-शांति को है छीना।
परिवार जनों पर बोझ बन कर उनका मुश्किल किया जीना।।
दहेज रूपी कुंडली भयानक बन, समाज की गिरफ्त में जोर पकड़ने लगी।
निम्न और मध्यम वर्गीय परिवार की छटपटाहट भी सुनाई देने लगी।।
समाज को इस कलंक से मुक्ति तभी मिल पाएगी।
जब दहेज प्रथा के उन्मूलन के लिए आगे आकर आवाज उठाई जाएगी।।
समाज की दूषित मनोवृति में बदलाव लाकर इस से छुटकारा पाना होगा।
दहेज लेनें और देने वालों को कड़े से कड़ा सबक सिखाना होगा।।

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